स्तंभ
राज्य ध्वज की मांग अनुचित, अनैतिक और अखंडता पर आंच
कर्नाटक के मुख्य मंत्री ने केंद्र सरकार के पास अपने राज्य के लिए अलग ध्वज को मान्यता देने की मांग भेजी है। यह ध्वज पीले, लाल और श्वेत पट्टियों का है जिसमें राज्य के प्रतीक चिह्न को इसके मध्य में उकेरा गया है। कन्नड़ अस्मिता के प्रतीक "गंडा भेरुन्दी" ( दो सिरों वाली मिथकीय मछली ) का यह चिह्न हिंदी को तथाकथित रूप से जबरन लादे जाने के विरोध में वर्षों से आन्दोलन के रूप में प्रदर्शित किया जाता रहा है। राज्य के कतिपय राजनीतिक दलों ने श्वेत पट्टी को हटाने तथा पीली-लाल पट्टियों को ही राज्य ध्वज के रूप...
अप्रतिरोधी मृत्यु-वरण की वैधता के निहितार्थ
कॉमन कॉज बनाम भारत संघ की जनहित याचिका पर निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने गरिमा के साथ मृत्यु को एक मौलिक अधिकार मानते हुए अनिवारक/अप्रतिरोधी इच्छा मृत्यु को संविधान के अनुच्छेद 21 में शामिल माना है और इसको वैध बताया है। अपनी आसन्न मृत्यु की स्थिति में जिन्दगी को अनावश्यक रूप से लंबा करने के लिए कृत्रिम चिकित्सकीय सहायता को मना करने वाली वसीयत को भी इस फैसले में वैधता प्रदान की गयी है। इस संबंध में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित मैनेजमेंट ऑफ़ पेशेंट विद टर्मिनल इलनेस, विड्रावल ऑफ़...
व्यक्ति की गरिमा से जुड़ा है प्रजनन का अधिकार
अभी हाल में मद्रास हाईकोर्ट ने हत्या के जुर्म में आजीवन कारावास की सजा काट रहे 40 वर्षीय एक कैदी को पंद्रह दिन के लिए अपने घर जाने हेतु अवकाश स्वीकृत किया ताकि वह पत्नी के साथ रहकर संतान पैदा कर सके। उसकी 32 वर्षीया पत्नी की याचिका पर निर्णय सुनाते हुए न्यायमूर्ति एस बिमला तथा न्यायमूर्ति टी कृष्णा वल्ली की खण्डपीठ ने कहा कि पत्नी को कैद नहीं किया गया है, लेकिन प्रजनन की उसकी वैध अपेक्षा को अस्वीकार नहीं जा सकता है। यह कैदी पिछले 18 वर्ष से जेल में है तथा उसकी पत्नी में कुछ शारीरिक कमियाँ हैं...
एक देश-एक चुनाव : सरकार इसके लिए पहले जनमत बनाए और पूरा होमवर्क करके ही इस पर कोई निर्णय ले
बजट सत्र की शुरुआत के मौके पर संसद के संयुक्त अधिवेशन में राष्ट्रपति ने अपने अभिभाषण में एक बार पुनः लोकसभा तथा विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की आवश्यकता पर बल दिया. प्रधानमंत्री ने भी पिछले कई मौकों पर “एक देश-एक चुनाव” के लिए जनमत बनाने की अपील की है. कहा जा रहा है कि 28 राज्यों वाले देश में हमेशा कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं,जिससे दैनिक कार्यों में रुकावट आती है और विकास बाधित होता है. सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों एलेक्शन मोड में रहते हैं, आरोपों-प्रत्यारोपों का सतत दौर चला करता है तथा...
यह सुप्रीम कोर्ट का आतंरिक मामला नहीं, न्यायालय की अस्मिता, स्वतंत्रता और स्वायत्तता का प्रश्न है
बारह जनवरी को सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों द्वारा प्रेस कांफ्रेंस करने की घटना जितनी अप्रत्याशित है उतनी ही विस्मयकारक और दुर्भाग्यपूर्ण। वरिष्ठ जज जब विकल्पहीन हो गए तो उन्हें अपना चैम्बर छोड़, जनता की अदालत में गुहार लगानी पड़ी। गनीमत रही कि उन्होंने मर्यादा बनाये रखी और आरोप-प्रत्यारोप की बजाय व्हिस्ल-ब्लोअर तक ही अपने को सीमित रखा।वरिष्ठ जजों के इस कदम पर विभिन्न प्रतिक्रियाएं आई हैं-आ रही हैं । कुछ ने सराहा, कुछ ने इसी बहाने न्यायपालिका में कथित मनमानेपन पर रोष-क्षोभ व्यक्त किया और...
जज लोया केस में तथाकथित 'ट्विस्ट' पर टाइम्स नाऊ रिपोर्ट पूरी तरह से गुमराह करने वाली
'टाइम्स नाउ' ने कैप्शन # जेजे लोया ट्विस्ट साथ एक कहानी चलायी है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने तहसीन पूनावाला पर मामला वापस लेने के लिए दबाव डाला था। समाचार चैनल द्वारा एक 'सनसनीखेज मोड़' के रूप में प्रस्तुत किया गया और इस तरह कहानी को स्पिन दिया गया कि विशेष परिणाम प्राप्त करने के लिए पर्दे के पीछे एक लॉबी काम कर रही है। जज लोया मामले को इससे प्रासंगिक माना जा रहा है क्योंकि यह व्यापक रूप से माना जाता है कि इस मामले के आवंटन के संबंध में शिकायत...
2G घोटाला : वैधता बनाम अपराधिता
2 जी "घोटाले" के फैसले ने टेक्नोक्रेटों का वर्चस्व रखने वाले भारतीय मध्यमवर्ग को चौंका दिया है। इसका उत्तर वैधता और अपराधीकरण के बीच के बीच के अंतर को समझने में उनकी असफलता में छिपा है।सुप्रीम कोर्ट ने अपने रिट क्षेत्राधिकार के तहत 2 जी लाइसेंस आवंटन की वैधता का परीक्षण किया और अंत में 2012 में इस आधार पर आवंटन को रद्द कर दिया कि उक्त आवंटन मनमाना था क्योंकि इसमें सार्वजनिक कार्रवाई की पारदर्शी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था। दूसरी ओर, अपराध एक अलग प्रक्रिया है जिसके तहत दंड कानून के...
भारत के लोग आजादी के 70 वर्ष बाद भी अपनी भाषा में न्याय पाने से क्यों हैं वंचित ?
भारत दुनिया का अनोखा देश है इस बात को आप ऐसे समझ सकते हैं कि आज़ादी के 70 वर्ष बाद भी भारतीय अपनी भाषा में न्याय पाने से वंचित हैं। क्यों? आज भी भारत के सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी ही है।पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने दो बड़े फैसले दिए हैं जिनमे से एक है ‘तीन तलाक’ के मुद्दे पर और दूसरा ‘निजता के अधिकार’ पर। दोनों ही फैसले भारत के सामाजिक और राजनीतिक चिंतन पर महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव डालेंगे। लेकिन जिस तरह से इन फैसलों को अकादमिक क्षेत्रों में लिया जायेगा, क्या...
राजीव गाँधी हत्याकांड के कुछ सवाल जिनके उत्तर आज तक नहीं मिल पाए हैं
मैं न्यायमूर्ति डीपी वाधवा और न्यायमूर्ति सैयद शाह मोहम्मद कादरी के साथ सुप्रीम कोर्ट की उस तीन-सदस्यीय पीठ में शामिल था जो राजीव गाँधी हत्या के मामले में अपील की सुनवाई कर रहा था। एलटीटीई (लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम) के 26 सदस्यों पर पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या करने का आरोप था और जांच एजेंसियों ने उन्हें दोषी पाया था और सुनवाई अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुनाई थी। जिस अपील की हम सुनवाई कर रहे थे वह सजा पाए अभियुक्तों ने दाखिल किया था और उन्होंने सुनवाई अदालत के फैसले को चुनौती दी थी। हमने इनमें...
इलाहाबाद हाई कोर्ट भवन की भव्यता को बेरंग करता परिसर के अंदर फैला गंदगी का साम्राज्य
देश में न्यायपालिका के सबसे पुराने भवनों में एक इलाहाबाद हाई कोर्ट के विशाल भवन की भव्यता को देखते ही आप इसके मुरीद हो जाएंगे। औपनिवेशिक भारत की यह भव्य इमारत पिछले डेढ़ सौ सालों से वहाँ खड़ा है। उसने एक से एक ऐसी कानूनी व्यवस्थाएं दी होंगी जो देश के कानूनी इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ होगा। इस भवन में बैठकर पिछले डेढ़ सौ सालों में एक से एक जजों ने इस देश की तकदीर बदल देनेवाले फैसले दिए होंगे और असंख्य लोगों ने उसके फैसलों की दाद दी होगी, उसकी प्रशंसा की होगी, आलोचना की होगी। इस हाई कोर्ट के...
कई राज्यों में उच्च न्यायालय की एक से अधिक पीठ तो होनी ही चाहिए
न्यायपालिका प्रजातांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ है। एक स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका जनतंत्र के बचे रहने की कुछ मूल शर्तों में एक है। हमारे सामने कई ऐसे लोकतंत्र हैं जिनकी विश्वसनीयता संदेह के दायरे में है और ऐसा सिर्फ इसलिए है कि वहाँ की न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं है और वह या तो कार्यपालिका के इशारे पर काम करती है या फिर काम करती ही नहीं है।न्याय मिलना और वह समय पर न्याय मिलना, लोकतंत्र को एक जीवंत राजनीतिक व्यवस्था बनाता है। हमारे देश में लोगों को न्याय की गारंटी संविधान प्रदत्त अधिकार है।...
सुप्रीम कोर्ट के आदेश को निरस्त करने वाले अध्यादेश पर एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश का हस्ताक्षर हास्यास्पद होने के अलावा भी बहुत कुछ है
यह बहुत ही अजीबोगरीब बात है कि भारत के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश को समाप्त करने के लिए एक मुख्यमंत्री के साथ हाथ मिलाए। केरल के वर्तमान राज्यपाल सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश भी रह चुके हैं। लेकिन न्यायमूर्ति पी सदाशिवम को अब यह शर्मनाक स्थिति झेलनी पड़ रही है। राज्य के राज्यपाल की हैशियत से सदाशिवम को केरल सरकार के एक अध्यादेश पर हस्ताक्षर करना पड़ा है जिसमें दो स्व-वित्तपोषित मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश को नियमित करने का प्रावधान है। इन दोनों कॉलेजों में प्रवेश की...
कॉलेजियम पद्धति में पारदर्शिता न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को मजबूत करता है
उत्कृष्ट प्रशासन का लक्ष्य प्राप्त करने का एक सर्वमान्य अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत है महत्तम स्वैच्छिक घोषणा। देश की सर्वोच्च अदालत ने सूचना का अधिकार अधिनियम 2005, के अनुच्छेद 4 (1) के तहत इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाया है। इससे संबंधित एक नोट में कहा गया है, “कॉलेजियम पद्धति की गोपनीयता बरकरार रखते हुए इसमें पारदर्शिता लाने का प्रस्ताव पास किया गया है। अब आगे से हाई कोर्ट बेंच की पदोन्नति, हाई कोर्ट के जजों को नियमित करने, हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की पदोन्नति, हाई कोर्ट के मुख्य...
सेक्यूलरिज्म पंथनिरपेक्षता मात्र नहीं है - न्यायमूर्ति केटी थॉमस
“सेक्यूलरिज्म” का अनुवाद अमूमन “पंथनिरपेक्षता” (धर्म से अलग) किया जाता है। पर यह सेक्यूलरिज्म का बहुत ही संकीर्ण अर्थ हमें देता है। इसीलिए लोगों ने इस शब्द के इसी संकीर्ण अर्थ को अभी तक समझा है। निस्संदेह, जैसा कि मैंने समझा है, सेक्यूलरिज्म का एक अर्थ धर्म से अलग होना भी है। पर सेक्यूलरिज्म की संकल्पना धर्म के बारे में उसके अर्थों से कहीं ज्यादा व्यापक और मूल्यवान है। यह समझना गलत है कि सेक्यूलरिज्म का उद्देश्य धार्मिक कर्मकांडों से मुक्ति सुनिश्चित करता है। सेक्यूलरिज्म की मौलिकता धार्मिक...
दोषी के अधिकार और बार एसोसिएशन
13 सितम्बर को रेयान अंतर्राष्ट्रीय विद्यालय के प्रमुख पदाधिकारी फ्रांसिस थॉमस द्वारा सर्वोच्च न्यायालय से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री के टी एस तुलसी के माध्यम से ये प्रार्थना की गयी कि सर्वोच्च न्यायालय ,उनके मुक़दमे की सुनवाई जो कि सोहना जनपद में चल रही है उसे दिल्ली स्थानांतरित करा दे क्योकि सोहना न्यायालय के स्थानीय अधिवक्ताओ ने सामूहिक रूप से किसी भी दोषी का न्यायालय में प्रतिनिधित्व न करने का निर्णय लिया है | ये विरोध और निर्णय 8 सितम्बर 2017 की उस घटना के विरोध में घटना के तुरंत एक दिन...
निजता का अधिकार का सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय क्या नहीं बताता है?
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 9 न्यायमूर्ति के बेंच के फैसले में, जस्टिस केएस पुत्तस्वामी बनाम यूओआई में (Justice KS Puttaswamy v. UOI) गोपनीयता के विषय पर एक ग्रंथ के रूप में निर्णय दिया है I 547 पृष्ठों पर फैला, छः अलग-अलग न्यायाधीशों के छह अलग-अलग विचारों ने गोपनीयता के अधिकार के विभिन्न पहलुओं को व्यापक रूप से कवर किया। हालांकि यह एक महान निर्णय है, लेकिन यह कई प्रश्नों को जन्म देता है I हालांकि गोपनीयता संबंधी निर्णय के अधिकार पर पहले से बहुत कुछ लिखा गया है, इस ब्लॉग में, वह तीन...
क्या हम बेहतर नहीं कर सकतेः आर. बसंत, सुप्रीम कोर्ट सीनियर एडवोकेट द्वारा शृंखला का पहला भाग
स्कूली बच्चों की तरह छुट्टियों के बाद कोर्ट खुलने का मैं भी इंतजार कर रहा हूं। मैने 9 मई को सुप्रीम कोर्ट बंद होने के बाद कालीकट के लिए पहली फ्लाइट पकड़ी थी। अब एक जुलाई को कोर्ट खुलने पर दिल्ली वापस आ रहा हूं ताकि नए जूडिशियल ईयर में सुप्रीम कोर्ट में उसे वेलकम कर सकूं। मैं स्वीकार करता हूं कि सीनियर एडवोकेट छुट्टियों में ज्यादा रिसर्च और अपडेशन नहीं करते। केरल का मौसम बेहतरीन था और इस दौरान परिवार और दोस्तों के साथ मिलकर अच्छा वक्त बिताया। काफी आलस वाला समय था और उसको खूब एनजॉय किया। उस वक्त...
अंतरराष्ट्रीय ’बोलने की आजादी’ जस्टिस कर्णन के बोलने की आजादी पर प्रतिबंध के आदेश के आयाम
सुप्रीम कोर्ट ने अपने नौ मई 2017 के आदेश के तहत जस्टिस कर्णन को सजा दी थी। इस आदेश में कहा गया था कि अवमानना के मामले में पब्लिक स्टेटमेंट व दोषी द्वारा दिए गए आदेशों का प्रकाशन भी शामिल है,जिनको इलैक्ट्रानिक व प्रिंट ने प्रसारित व प्रकाशित किया है। इसलिए अब दोषी द्वारा आगे से दिए गए किसी भी बयान को न छापा जाए। आदेश का यह हिस्सा सिर्फ निराला व अनोखा ही नहीं है बल्कि बोलने की आजादी का खतरनाक तरीके से अपमान करने वाला है। मैं कहना चाहती हूं कि इस तरह प्रकाशन पर लगाई रोक से बोलने व विचारों की...
नेशनल हेल्थ पाॅलिसी 2017 व भ्रमात्मक अनुमान
दाॅ नेशनल हेल्थ पाॅलिसी 2017(एनएचपी) से आशा की जा रही है कि वह भारत में छिन्न-भिन्न हो चुके देश के स्वास्थ्य सिस्टम को फिर से नया या ठीक कर देगी।सरकार जीडीपी का 1.1 प्रतिशत ही स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करती है,जो स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च का बस 28 प्रतिशत ही है। पब्लिक सेवाओं पर कम खर्च करने के कारण लोगों को मजबूरी में निजी स्वास्थ्य सेवाओं की सहायता लेनी पड़ती हैै। जिसके चलते उनको आपातपूर्ण खर्चे करने पड़ते है।स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले यह आपातपूर्ण खर्च 15 प्रतिशत (2004-05) से बढ़कर 18...
’स्काई बेबी’ पर उठते कानूनी व राजनीतिक सवाल
’स्काई बेबी’ या बेबी बाॅर्न आॅन बाॅर्ड यानि फलाइट में जन्म लेने वाले बच्चों की कई खबरें आई हैं। कुछ दिन पहले 8 अप्रैल 2017 को एक बच्चे ने 42 हजार फीट की उंचाई पर तुर्किश एयरलाइन में जन्म लिया। उस समय फलाइट कोंकरी,गिनी से औगाडौगू,बुर्कीना फासो जा रही थी।एयर स्पेस किसका है,इस पर उठे सवाल अक्सर कानूनी व राजनीतिक वाद-विवाद का कारण बनते है। इस तरह के मामलों में दूसरा महत्वपूर्ण सवाल है जो कौतुहल पैदा करता है,वो यह है कि फलाइट में पैदा हुए बच्चे की नागरिकता का निर्धारण किया जाना।अपनी-अपनी जमीन पर पैदा...



















