स्तंभ
आइये जाने FIR के बारे में
कोई भी अपराध मात्र एक पीड़ित के खिलाफ अपराध नहीं होता बल्कि वह सामाजिक सुरक्षा एवं कानून व्यवस्था को एक चुनौती होता है. इसलिए जब भी कोई अपराध होता है तो पीड़ित तो एक निजी व्यक्ति ही होता है फिर भी राज्य / सरकार उस अपराध के विरुद्ध कार्यवाही करती है. अपराधी को उचित सजा दिलाना और न्याय सुनिश्चित करना पीड़ित का नहीं बल्कि राज्य का कर्तव्य एवं अधिकार माना जाता है, यह प्रक्रिया FIR दायर करने से शुरू होती है. आज के लेख में...
आइये! लोक अदालत को जानें और समझें
लोक अदालत का मतलब होता है लोगों की अदालत इसकी संकल्पना हमारे गाँवों में लगने वाली पंचायतों पर आधारित है। इसके अलावा आज के परिवेश में इसके गठन का आधार 1976 का 42वां संविधान संशोधन है, जिसके अंदर अनुच्छेद 39-A में आर्थिक न्याय को जोड़ा गया। लोक अदालत को अमल में लाने के दो मुख्य कारण हैं , पहला यह कि आर्थिक रूप से कमजोर होने कि वज़ह से बहुत सारे लोग न्याय पाने के लिए संसाधन नहीं जुटा पाते। दूसरा अगर वह कोर्ट तक पहुँच भी जाते हैं, तो करोड़ों मुक़दमे लंबित और अपूर्ण होने के कारण उनको समय से...
लोकपाल के जरिये कैसे कसी जाएगी भ्रष्टाचार पर नकेल?: समझिये लोकपाल के कार्य, नियुक्ति और शक्तियों के बारे में
भारत में लोकपाल को लेकर चर्चा, वर्ष 1966 में प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा सिफारिश किए जाने से शुरू हुई, और वर्ष 2011 तक कानून बनाने के 8 असफल प्रयासों के बाद भी खत्म नहीं हुई। वर्ष 2011 में ही, अन्ना हजारे की भूख-हड़ताल ने संसद को इस कानून के प्रति प्रथम बार सोचने को मजबूर किया और अंततः जनवरी, 2014 में यह कानून अस्तित्व में आ सका। वर्ष 2011 और 2014 के बीच प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में मंत्रियों के एक समूह ने इस विधेयक का प्रस्ताव रखा, जिसमें संसद की स्थायी समिति ने पर्याप्त संशोधन किए।...
कॉलेजियम प्रणाली, तीन जज मामले और संवैधानिक अदालतों में नियुक्तियां/तबादले: समझिये यह महत्वपूर्ण गणित
प्रतिदिन हम केवल संसद एवं विधायिकाओं द्वारा बनाये गए कानूनों से ही निर्देशित नहीं होते हैं, बल्कि हमारी अदालतों द्वारा सुनाये गए निर्णयों एवं उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों से भी हम प्रभवित होते हैं। हालाँकि जहाँ संसद एवं विभिन्न राज्यों की विधायिकाओं में प्रवेश का एक तय नियम मौजूद है, वहीँ उच्चतम न्यायलय में न्यायाधीश की नियुक्ति को लेकर हमेशा से विवाद रहा है।हम आज बात करने जा रहे हैं उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के बारे में। इसके साथ ही हम उन मामलों के बारे में भी आपको...
घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के अधिकार एवं संरक्षण (भाग-२)
घरेलू हिंसा से पीड़ित महिला के पास कुछ अधिकार हैं| इन अधिकारों की पूर्ति के लिए मजिस्ट्रेट कई तरह के आदेश पारित कर सकते हैं| इस लेख के पिछले भाग में घरेलू हिंसा क्या है, पीड़ित महिला कौन है, शिकायत किसके समक्ष दर्ज करायी जा सकती है, इत्यादि जानकारी दी गई है| लेख के भाग दो में कौन से आदेश किस परिस्तिथि में पारित किये जा सकते है, इसकी जानकारी दी गई है| आदेश प्राप्त करने के लिए आवेदन की प्रक्रिया घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 में पीड़ित महिला के हितों की रक्षा के...
समझिये भारतीय संविधान के अंतर्गत विधान-परिषद् का गठन, इसकी उपयोगिता एवं संरचना का पूरा गणित
पिछले वर्ष सितम्बर के महीने में ओडिशा में नवीन पटनायक सरकार ने अपने विधायी ढांचे में राज्य विधान परिषद (SLC) की स्थापना की संसदीय प्रक्रिया शुरू की है। राज्य में एक विधान परिषद के गठन के लिए संविधान के अनुच्छेद 169 (1) के तहत राज्य सरकार के संसदीय कार्य मंत्री बिक्रम केशरी अरुखा द्वारा इस सम्बन्ध में एक प्रस्ताव पारित किया गया और विधान सभा के 104 सदस्यों ने अपने मतों को इस प्रस्ताव के पक्ष में दर्ज किया था।ओडिशा सरकार का यह प्रस्ताव 35 करोड़ के वार्षिक परिव्यय के साथ 49-सदस्यीय विधान परिषद्...
घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के अधिकार एवं संरक्षण अधिनियम (भाग-1)
इक्कीसवीं शताब्दी के उन्नीसवें वर्ष में दाखिल होने के बाद भी भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कोई कमी नहीं आई है| देश के किसी भी कोने से कोई भी अखबार उठा कर देख लीजिये, महिलाओं के खिलाफ अपराध की कोई ना कोई खबर अवश्य पढने को मिल जाएगी| व्यथा तो यह है कि बाहर तो दूर, महिलाएं अपने घर की चारदीवारी में भी अपराधों का शिकार हो जाती हैं| महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के मामले भी आये दिन सामने आते हैं| वर्ष 2005 से पूर्व घरेलू हिंसा के खिलाफ महिलाओं के पास आपराधिक मामला दर्ज़ करने का अधिकार था|...
संविधान का अनुच्छेद 35-A क्या है? इसके पीछे के विवाद और इतिहास को संक्षेप में समझिये
जहाँ एक ओर उच्चतम न्यायालय में संविधान के अनुच्छेद 35-A की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली दलीलों के एक बैच पर सुनवाई होने की संभावना है, वहीँ यह मुद्दा एक बार फिर आम चर्चा के दौरान गरमाया हुआ है। अनुच्छेद 35-A, जो जम्मू और कश्मीर राज्य के मूल निवासियों को विशेष अधिकार और विशेषाधिकार प्रदान करता है, इसलिए इस मुद्दे पर राजनीतिक नजर भी काफी महत्व रखती है।अनुच्छेद 35-A क्या है?अनुच्छेद 35-A को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के मंत्रिमंडल की सिफारिशों पर एक राष्ट्रपति के आदेश के...
निःशुल्क क़ानूनी सहायता आपका अधिकार है
भारतीय संविधान की उद्देशिका (Preamble) के तहत भारत के समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय की बात की गयी है। समाज के सभी वर्गों को भारतीय न्यायिक प्रणाली में न्याय पाने का समुचित एवं सामान अवसरमिले, इसलिए भारतीय संविधान का अनुच्छेद 39 A भारत देश के ग़रीब और पिछड़े वर्ग के लोगों को निःशुल्क कानूनी सहायता प्रदान करता है। निःशुल्क क़ानूनी सहायता का मतलब है किअभियुक्त या प्रार्थी को वक़ील की सेवाएं मुहैया करवाना। सीधे शब्दों में कहा जाये तो अपने देश में ज़्यादातर लोग जो जेलों में...
समझिये जेनेवा कन्वेंशन के तहत प्रिजनर ऑफ़ वार की स्थिति: आखिर क्या हैं पाकिस्तान की भारतीय पायलट के प्रति जिम्मेदारियां?
जेनेवा कन्वेंशन (या जिनेवा कन्वेंशन) हाल ही में काफी चर्चा में है। भारत-पाकिस्तान के बीच चल रहे विवाद के बीच कल (27 फरवरी 2019) को विदेश मंत्रालय (MEA) ने पुष्टि की कि 27 फरवरी को पाकिस्तानी विमान के साथ संघर्ष के दौरान, भारत ने अपना एक मिग 21 खो दिया और एक भारतीय वायु सेना (IAF) पायलट को पड़ोसी देश द्वारा बंदी बना लिया गया। इस पायलट का नाम विंग कमांडर अभिनन्दन बताया जा रहा है, और कथित रूप से यह पायलट इस वक़्त भी पाकिस्तान सेना के पास मौजूद है। हालांकि, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने...
लोक अभियोजक कौन होता है एवं दंड प्रक्रिया संहिता में इससे सम्बंधित पदों की क्या है व्यवस्था?
जब बात आती है किसी अपराध की, तो यह कॉमन लॉ का एक सिद्ध प्रिंसिपल है कि एक अपराध हमेशा समाज के खिलाफ होता है। भले ही वह अपराध चोरी हो, हत्या हो, या किसी व्यक्ति को गंभीर रूप से चोट पहुंचना हो, घटना भले किसी एक व्यक्ति के खिलाफ अंजाम दी गयी हो लेकिन उस घटना से समाज को भी नुकसान होता है। लोगों के बीच भय, दहशत फैलता है और समाज की शांति भंग होती है। जब भी किसी अपराध को अंजाम दिया जाता है, तो किसी अभियुक्त के खिलाफ मामले को स्टेट के जरिये अदालत तक पहुंचाया जाता है। क्यूंकि एक स्टेट इस बात की...
मतदाता सूची में नहीं है नाम तो ऐसे कराएँ पंजीकरण
लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा शासन है और इसलिए इस व्यवस्था में, चुनाव, बदलाव लाने का सबसे बड़ा अवसर होता है। हमारे देश में भी जल्द ही लोक सभा चुनाव होने वाले हैं और देश की सभी छोटी-बड़ी पार्टियाँ अपने चुनावी समीकरण बनाने में लग गयी हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि हम मतदाता, मतदान पंजीकरण की प्रक्रिया, और उससे जुडी मुख्य बातों को जाने. यह लेख उसी दिशा में एक प्रयास है. मतदान की प्रक्रिया भारत निर्वाचन आयोग के नियमों के अनुसार, प्रत्येक मतदाता को...
दंड संहिता में अदालतों की व्यवस्था: एक नजर
आपराधिक कानून की आवश्यक वस्तु अपराधियों और कानून तोड़ने वालों के खिलाफ समाज की रक्षा करना है। इस उद्देश्य के लिए कानून संभावित कानून तोड़ने वालों को दंड के खतरों के साथ-साथ वास्तविक अपराधियों को उनके अपराधों के लिए निर्धारित दंड भुगतने का प्रयास करता है। इसलिए, आपराधिक कानून, व्यापक अर्थ में, आपराधिक कानून और प्रक्रियात्मक (या विशेषण) आपराधिक कानून दोनों के होते हैं। पर्याप्त आपराधिक कानून अपराधों को परिभाषित करता है और उसी के लिए दंड निर्धारित करता है, जबकि प्रक्रियात्मक कानून मूल कानून का...
एटीएम कार्ड से पैसा गायब हुआ है तो अपनायें ये क़ानूनी उपाय
प्रकृति और अपराध के प्रकार कभी ठहर नहीं सकते। समय और प्रगति के साथ बदलते रहते हैं। जहाँ एक ओर आधुनिक विज्ञान और तकनीक ने समाज के फ़ायदे को बढ़ाया है , वहीं दूसरी ओर कुछ अवांछित तत्वों को इससे अपराध करने का नया तरीका भी मिला है। लेकिन समाज में बदलाव के साथ - साथ समाज की सुरक्षा व जरूरतों को पूरा करने के लिए क़ानून भी अपने में परिवर्तन को प्रोत्साहित करता है। इन्ही बातों को समझते हुए , भारतीय संसद ने सन २००२ में 'सूचना तकनीक अधिनियम २००२' को पारित किया। जिससे की इस प्रकार के साइबर अपराधों को रोका जा...
राम जन्मभूमि विवाद और कानूनी दांव-पेंच: पढ़िए सरकार और अदालत के क़दमों का अबतक का लेखा-जोखा
राम मंदिर पर विवाद का इतिहास आजाद भारत के इतिहास जितना ही विस्तृत है, कई मौकों पर यह मुद्दा या तो राजनीतिक या तो कानूनी लड़ाई में फंसा रहा है। हम आपको आज इस पुरे मुद्दे को संक्षेप में समझने का प्रयास करेंगे।आखिर यह पूरा मामला क्या है?यह विवाद उत्तर प्रदेश के अयोध्या शहर में एक जमीन के एक भूखंड को लेकर है। यह विशेष स्थल, हिंदुओं में भगवान राम की जन्मभूमि माना जाता है, लेकिन यहाँ बाबरी मस्जिद भी स्थित रही है। सवाल यह भी उठता रहा है कि क्या मस्जिद बनाने के लिए यहाँ स्थित पहले के एक हिंदू मंदिर को...
NRC, नागरिकता अधिनियम और सुप्रीम कोर्ट: जानिए कैसे इस मुद्दे पर दशकों से फंसा हुआ है पेंच
आजकल सुप्रीम कोर्ट से लेकर केंद्र सरकार और अख़बारों की सुर्ख़ियों से लेकर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में एक मसला काफी ज्यादा बहस का मुद्दा बना रहा है। यह मुद्दा एनआरसी (NRC) का है। एनआरसी, जिसके असम राज्य के सम्बन्ध को हम मुख्य तौर पर देख रहे हैं, नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजन्स के नाम से जाना जाता है। असं एक मात्रा ऐसा राज्य है, जहाँ ऐसा कोई रजिस्टर अस्तित्व में है। हम इस लेख के माध्यम से यह प्रयास करेंगे कि आपको इस पूरे मुद्दे के बारे में जानकारी दी जा सके।असम में पलायन की शुरुआत असम सरकार के...
बीते दिनों सीबीआई में हुई उठापटक की सारी जानकारी जानिए संक्षेप में
सीबीआई में पिछले 3 महीनों से उठापटक का दौर चलता रहा। इस पूरे प्रकरण को संक्षेप में समझाने का यह हमारा प्रयास है। आइये समझते हैं यह पूरा मामला। 12 जुलाई 2018: केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) ने एक मीटिंग बुलाई जिसमे सीबीआई के अंदर प्रमोशन पर विचार विमर्श होना था। उस मीटिंग में अस्थाना को सीबीआई के नंबर 2 के अधिकारी के रूप में बुलाया गया। इस समय अलोक वर्मा विदेश दौरे पर थे, जब उन्हें इस बारे में जानकारी मिली तो उन्होंने सीवीसी को लिखा कि उन्होंने अस्थाना को अपनी ओर से इन बैठकों में भाग लेने के...
रफ़ाल जांच में साँच को आँच
आखिर सरकारी भ्रष्टाचार के मामले में जांच कब होनी चाहिए?भ्रष्टाचार के किसी भी मामले में जब इतने तथ्य मौजूद हों जिससे उस मामले पर संदेह गहरा होता जाए और हमे आरोप का कोई सीधा जवाब ना मिल पाए, तब न्यायिक जांच की ज़रूरत और बढ़ जाती है। जब रफ़ाल सौदे को लेकर वार्ता, कारगिल युद्ध के बाद से शुरू हुई हो और पिछली कई सरकारों के कार्यकाल के दौरान इस पर काम हुआ हो, उसमें हड़बड़ी में ‘ऑफ-सेट पार्टनर’ का चुना जाना, जहाज का दाम एकाएक बढ़ जाना और भारतीय वायु सेना द्वारा वर्षों से की जा रही 126 जहाज की मांग को दबाकर...
मौलिक अधिकारों में द्वंद्व और लोकनीति की दुविधा
आधार अधिनियम, 2016 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका में संघ सरकार का पक्ष रखते हुए महान्यायवादी केके वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि निजता के मौलिक अधिकार तथा भूख, दरिद्रता व बेजारी रहित जीवन यापन के मौलिक अधिकार में यदि द्वंद्व हो तो बाद वाले अधिकार को प्रश्रय देना होगा. वेणुगोपाल का तर्क है कि अमरीकी सुप्रीम कोर्ट ने 1876 में मन बनाम इलिनाइस में प्राण तथा दैहिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का निर्वचन करते हुए कहा था कि इसके अंतर्गत मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार शामिल है और जीवन के...
केरल सरकार के अध्यादेश पर रोक से उपजे साख, औचित्य तथा संवैधानिकता के प्रश्न!
अभी हाल में सुप्रीम कोर्ट ने केरल प्राइवेट कॉलेज (रेगुलेशन ऑफ़ एड्मिसन इन मेडिकल कॉलेज) अध्यादेश, 2017 पर स्थगन आदेश देकर इसके क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है. सत्र 2016-17 में राज्य के कुछ प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों ने गैर कानूनी रूप से छात्रों का प्रवेश लिया था जिसे भारतीय आयुष परिषद् की प्रवेश अधिवीक्षण समिति ने निरस्त कर दिया था. केरल हाई कोर्ट ने भी इन प्रवेशों को कानून सम्मत नहीं माना था तथा अपील में सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के निर्णय पर मुहर लगा दी थी. लेकिन उच्चतर न्यायपालिका के स्पष्ट...

















