हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (18 मई, 2026 से 22 मई, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
न्यायिक समीक्षा के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए अदालतें टेंडर की शर्तों में नदारद 'काल्पनिक प्रावधान' को अपनी तरफ से नहीं जोड़ सकतीं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि सार्वजनिक ठेकों में पात्रता से जुड़े विवादों की जांच करते समय अदालतें टेंडर की शर्तों में नदारद किसी "काल्पनिक प्रावधान" को अपनी तरफ से नहीं जोड़ सकतीं।
जस्टिस अनिल क्षत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की डिवीज़न बेंच ने यह स्पष्ट किया कि जब टेंडर में ऐसा कोई प्रावधान नहीं होता, जिसके तहत किसी निलंबित या बीच में छोड़े गए काम को पूरा हुआ मान लिया जाए—सिर्फ इसलिए कि काम छोड़ने की वजह सरकार थी—तो अदालतें टेंडर की शर्तों को फिर से लिखकर ऐसा कोई निष्कर्ष नहीं निकाल सकतीं।
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नशे में धुत दोस्तों के बीच अचानक हुई लड़ाई में ईंट से बार-बार वार करने पर हत्या का आरोप नहीं लगेगा: दिल्ली हाईकोर्ट
शराब के पैसे देने को लेकर दो दोस्तों के बीच हुई नशे वाली कहा-सुनी से जुड़े मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने हत्या की सज़ा को 'गैर-इरादतन हत्या' (culpable homicide not amounting to murder) में बदल दिया। कोर्ट ने माना कि यह घटना अचानक गुस्से में हुई थी और इसके पीछे कोई पहले से सोची-समझी योजना नहीं थी।
जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन की डिवीज़न बेंच ने फैसला सुनाया कि यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत नहीं, बल्कि धारा 304 (भाग II) के तहत आएगा। कोर्ट ने कहा कि भले ही आरोपी को इस बात का पता था कि उसके इस काम से किसी की जान जा सकती है, लेकिन उसका इरादा हत्या करने का नहीं था।
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एक बार प्रोबेट मिल जाने के बाद धारा 68 के तहत वसीयत को दोबारा साबित करने की ज़रूरत नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि एक बार किसी वसीयत के संबंध में प्रोबेट मिल जाने के बाद भारतीय साक्ष्य अधिनियम की (Indian Evidence Act) धारा 68 के तहत बाद की सिविल कार्यवाही में उस दस्तावेज़ को दोबारा साबित करने की ज़रूरत नहीं होती।
धारा 68 में यह प्रावधान है कि यदि किसी दस्तावेज़ को कानून के अनुसार अटेस्ट (साक्षी द्वारा प्रमाणित) किया जाना ज़रूरी है (जैसे वसीयत या दान पत्र), तो उसे अदालत में तब तक सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसे निष्पादित किए जाने को साबित करने के लिए कम-से-कम एक अटेस्ट करने वाले गवाह को न बुलाया जाए।
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कुछ दिव्यांग कर्मचारियों के लिए रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने का फ़ायदा हटाना उचित: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार के उस फ़ैसले को सही ठहराया, जिसमें उसने अपने सर्विस नियमों में बदलाव करके कुछ खास कैटेगरी के दिव्यांग कर्मचारियों के लिए रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने का फ़ायदा वापस ले लिया था। कोर्ट ने कहा कि कर्मचारियों की अलग-अलग कैटेगरी के लिए रिटायरमेंट की अलग-अलग उम्र तय करना कोई गैर-कानूनी भेदभाव नहीं है।
जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर ने कहा, "यह बात पूरी तरह से तय है कि एम्प्लॉयर (नियोक्ता) के पास यह पूरा अधिकार है कि वह काम की प्रकृति और जनसेवा की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए कर्मचारियों की अलग-अलग कैटेगरी के लिए रिटायरमेंट की अलग-अलग उम्र तय करे। हरियाणा सरकार ने इन्हीं ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए ग्रुप 'D' कर्मचारियों और न्यायिक अधिकारियों के मामले में छूट दी थी। अगर सरकार ने ऐसी पोस्ट पर काम करने वाले दिव्यांग कर्मचारियों के साथ भेदभाव किया होता और उनके लिए रिटायरमेंट की अलग उम्र तय की होती, जबकि रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने का फ़ायदा सिर्फ़ शारीरिक रूप से सक्षम कर्मचारियों को दिया होता तो RPwD एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन होता। लेकिन सरकार ने ऐसा कोई तरीका नहीं अपनाया।"
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POSH शिकायतों की जांच ICC/LCC तंत्र के बाहर किसी समानांतर जांच प्राधिकरण द्वारा नहीं की जा सकती: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि यौन उत्पीड़न की रोकथाम अधिनियम (POSH Act), 2013 के तहत शिकायतों की जांच या उनका निपटारा आंतरिक शिकायत समिति (ICC) या स्थानीय शिकायत समिति (LCC) के ढांचे के बाहर किसी भी समानांतर प्राधिकरण द्वारा नहीं किया जा सकता। जस्टिस आशीष श्रोती की पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे किसी समानांतर प्राधिकरण को अनुमति देने से POSH Act का उद्देश्य ही कमजोर हो जाएगा।
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ट्विशा शर्मा दहेज मौत मामला: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एम्स दिल्ली की टीम से दोबारा पोस्टमार्टम कराने के दिए निर्देश
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ट्विशा शर्मा दहेज मौत मामले में बड़ा आदेश देते हुए मृतका का दोबारा पोस्टमार्टम कराने की अनुमति दी। अदालत ने निर्देश दिया कि दूसरा पोस्टमार्टम एम्स दिल्ली के विशेषज्ञों की टीम द्वारा भोपाल में किया जाए।
जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह ने शुक्रवार को ट्विशा शर्मा के पिता की याचिका पर यह आदेश पारित किया।सुनवाई के दौरान पति पक्ष के वकील ने दोबारा पोस्टमार्टम का विरोध करते हुए कहा कि इससे राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं का अपमान होगा। उन्होंने दलील दी कि पहले पोस्टमार्टम पर संदेह जताने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि उससे पक्षकार असंतुष्ट हैं।
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कलकत्ता हाईकोर्ट ने ईद से पहले सरकार के पशु वध नियमों पर रोक लगाने से किया इनकार
कलकत्ता हाईकोर्ट ने गुरुवार को ईद-उल-अज़हा से पहले पशु वध को नियंत्रित करने वाली पश्चिम बंगाल सरकार की अधिसूचना पर रोक लगाने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि 13 मई की अधिसूचना में केवल 2018 में कोर्ट द्वारा ही जारी किए गए उन निर्देशों को लागू किया गया है, जिन्हें पहले चुनौती नहीं दी गई।
हालांकि, एक अहम निर्देश में चीफ जस्टिस सुजॉय पॉल और जस्टिस पार्थ सारथी सेन की खंडपीठ ने राज्य को आदेश दिया कि वह विवादित नोटिस में संशोधन करे और स्पष्ट रूप से यह शामिल करे कि खुले सार्वजनिक स्थानों पर जानवरों, जिनमें गाय और भैंस भी शामिल हैं, उसका वध करना सख्त मना है। साथ ही यह भी शामिल किया जाए कि "गाय की कुर्बानी ईद-उल-ज़ोहा त्योहार का हिस्सा नहीं है और इस्लाम के तहत यह कोई धार्मिक ज़रूरत नहीं है," जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने हनीफ़ कुरैशी बनाम बिहार राज्य मामले में फैसला दिया था।
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जमानत अर्जी पर फैसला देने के बाद कोर्ट पुलिसवालों के खिलाफ जांच का आदेश नहीं दे सकता, न ही उसकी निगरानी कर सकता है: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि एक बार जब ट्रायल कोर्ट बेल अर्जी पर फैसला दे देता है तो उसका काम खत्म हो जाता है (Functus Officio) और वह जांच में कथित देरी को लेकर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच का निर्देश देकर या उनके खिलाफ कड़ी टिप्पणियां करके मामले की निगरानी जारी नहीं रख सकता।
जस्टिस सौरभ बनर्जी ने यह टिप्पणी पुलिस इंस्पेक्टर और अन्य पुलिस अधिकारी द्वारा दायर याचिकाओं को स्वीकार करते हुए की। इन याचिकाओं में एक POCSO मामले में एडिशनल सेशंस जज (ASJ) द्वारा जारी निर्देशों को चुनौती दी गई।
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झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: हाईकोर्ट में लॉ क्लर्क बनने से वकालत नामांकन का अधिकार खत्म नहीं होता
झारखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि हाईकोर्ट में लॉ रिसर्चर या रिसर्च एसोसिएट के रूप में कार्यरत लॉ ग्रेजुएट को वकील के रूप में नामांकन से वंचित नहीं किया जा सकता। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी नियुक्ति के दौरान उसका वकालत लाइसेंस निलंबित माना जाएगा।
जस्टिस आनंद सेन की एकलपीठ ऋचा प्रिया की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में झारखंड राज्य बार काउंसिल को निर्देश देने की मांग की गई कि उसे उसी तारीख से एडवोकेट के रूप में नामांकित किया जाए, जिस दिन उसके साथ आवेदन करने वाले अन्य अभ्यर्थियों को नामांकन प्रमाणपत्र जारी किए गए।
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'फ्रेंडली लोन' अपने आपमें NI Act की धारा 138 के तहत कानूनी रूप से लागू करने योग्य कर्ज़ नहीं: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने चेक बाउंस मामले में दो आरोपियों को बरी करने का फैसला सही ठहराते हुए कहा कि पक्षों के बीच "दोस्ताना लेन-देन" अपने आप में Negotiable Instruments Act (NI Act) की धारा 138 के तहत कानूनी रूप से लागू करने योग्य कर्ज़ नहीं बन जाता।
जस्टिस राजेश कुमार की एकल पीठ शिकायतकर्ता द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें जमशेदपुर के न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रथम श्रेणी द्वारा 28.07.2008 को Complaint C-1 Case No. 807 of 2007 में दिए गए फैसले को चुनौती दी गई।
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बहू को स्थायी वैकल्पिक आवास का अधिकार नहीं, कानून केवल साझा घर में रहने का हक देता है: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 और माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम, 2007 में बहू को स्थायी वैकल्पिक आवास देने का कोई प्रावधान नहीं है। कानून केवल साझा घर में रहने के अधिकार को मान्यता देता है।
जस्टिस पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने यह टिप्पणी एक बुजुर्ग दंपति की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। 76 और 73 वर्षीय दंपति ने उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें अपीलीय प्राधिकारी ने उन्हें अपनी बहू और पोते-पोतियों के लिए स्थायी वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था।
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POSH Act के तहत संस्थान के निदेशक के खिलाफ भी आंतरिक शिकायत समिति कर सकती है जांच : केरल हाईकोर्ट
केरल हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि यदि किसी संस्थान का निदेशक उसके प्रशासन और प्रबंधन पर पूर्ण नियंत्रण नहीं रखता और वह कार्यकारी समिति द्वारा नियुक्त कर्मचारी की श्रेणी में आता है तो उसके खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत की जांच संस्थान की आंतरिक शिकायत समिति कर सकती है। जस्टिस अनिल के. नरेंद्रन और जस्टिस मुरली कृष्ण एस. की खंडपीठ उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें एकल पीठ के फैसले को चुनौती दी गई।
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मुस्लिम रीति से शादी करने वाली हिंदू महिला को अंतरिम भरण-पोषण का अधिकार: कलकत्ता हाईकोर्ट
कलकत्ता हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि कोई हिंदू महिला इस्लाम धर्म अपनाकर मुस्लिम रीति-रिवाज से विवाह करती है तो केवल विवाह की वैधता पर सवाल उठाकर मुस्लिम पति भरण-पोषण देने से बच नहीं सकता। अदालत ने कहा कि जब तक सक्षम अदालत विवाह को शून्य घोषित नहीं करती, तब तक पत्नी और बच्चे को अंतरिम भरण-पोषण पाने का अधिकार रहेगा।
जस्टिस चैताली चटर्जी दास ने महिला और उसके नाबालिग बेटे के पक्ष में पारित अंतरिम भरण-पोषण आदेश बहाल करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया विवाह और बच्चे के पितृत्व के प्रमाण होने के बावजूद उन्हें भरण-पोषण से वंचित करना घोर अवैधता होगी।
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गोदनामे से ही वैध नहीं मानी जाएगी गोद लेने की प्रक्रिया, 'लेने-देने' की रस्म जरूरी : राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल गोदनामा तैयार कर लेने भर से किसी गोद लेने की प्रक्रिया को कानूनन वैध नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत बच्चे को गोद देने और लेने की वास्तविक रस्म का होना अनिवार्य है और इसे महज औपचारिकता नहीं माना जा सकता।
जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें निचली अदालत और अपीलीय अदालत द्वारा गोदनामे को अमान्य ठहराने के फैसले को चुनौती दी गई।
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निजी मंदिरों के प्रबंधन में दखल नहीं दे सकती सरकार: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकार किसी निजी मंदिर के प्रबंधन में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। अदालत ने राज्य के सभी जिला कलेक्टरों को निर्देश दिया है कि किसी भी मंदिर पर प्रबंधन योजना लागू करने से पहले यह तय किया जाए कि वह मंदिर सार्वजनिक है या निजी।
जस्टिस दीपक खोत की पीठ ने यह आदेश डूंडा सिवनी गांव स्थित एक शिव मंदिर के सर्वराकर की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में लोक न्यास रजिस्ट्रार द्वारा मंदिर के प्रबंधन के लिए पांच सदस्यीय समिति गठित करने के आदेश को चुनौती दी गई।
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बिना कानूनी सुरक्षा अपनाए सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ FIR का आदेश नहीं दे सकता मजिस्ट्रेट: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ मजिस्ट्रेट बिना भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 223 में निर्धारित सुरक्षा उपायों का पालन किए सीधे FIR दर्ज करने का आदेश नहीं दे सकता।
जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने कहा कि यदि शिकायत सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़े कार्यों को लेकर हो, तो मजिस्ट्रेट को FIR दर्ज कराने या संज्ञान लेने से पहले संबंधित अधिकारियों को सुनवाई का अवसर देना और उनके सीनियर अधिकारी से तथ्यात्मक रिपोर्ट मंगाना अनिवार्य है।
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हाईकोर्ट अपनी पुनरीक्षण अधिकारिता में भरण-पोषण की राशि बढ़ा या घटा नहीं सकता, इसका उपाय BNSS की धारा 146 के तहत: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह अपनी पुनरीक्षण अधिकारिता के तहत किसी याचिका पर सुनवाई करते समय भरण-पोषण की राशि को सीधे तौर पर बढ़ा या घटा नहीं सकता। जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने टिप्पणी की कि बदली हुई परिस्थितियों के कारण भरण-पोषण भत्ते में संशोधन या बदलाव का उचित उपाय केवल BNSS की धारा 146 (CrPC की धारा 127) के तहत यह उपाय उसी अदालत के समक्ष किया जाना चाहिए जिसने मूल आदेश पारित किया था।
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सार्वजनिक जगह पर अपमान साबित हुए बिना केवल जातिसूचक शब्द बोलना SC/ST Act के तहत अपराध नहीं: पटना हाईकोर्ट
पटना हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) और भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा कि केवल जातिसूचक शब्द बोल देना या सामान्य गाली-गलौज करना, यदि वह सार्वजनिक दृष्टि में न हो तो अपने आप SC/ST Act के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।
जस्टिस अनिल कुमार सिन्हा की सिंगल बेंच उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें 27 सितंबर 2023 को विशेष जज, SC/ST Act, सारण, छपरा द्वारा संज्ञान लेने के आदेश को चुनौती दी गई थी।