बहू को स्थायी वैकल्पिक आवास का अधिकार नहीं, कानून केवल साझा घर में रहने का हक देता है: दिल्ली हाईकोर्ट

Amir Ahmad

21 May 2026 11:38 AM IST

  • बहू को स्थायी वैकल्पिक आवास का अधिकार नहीं, कानून केवल साझा घर में रहने का हक देता है: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 और माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम, 2007 में बहू को स्थायी वैकल्पिक आवास देने का कोई प्रावधान नहीं है। कानून केवल साझा घर में रहने के अधिकार को मान्यता देता है।

    जस्टिस पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने यह टिप्पणी एक बुजुर्ग दंपति की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। 76 और 73 वर्षीय दंपति ने उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें अपीलीय प्राधिकारी ने उन्हें अपनी बहू और पोते-पोतियों के लिए स्थायी वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था।

    बुजुर्ग दंपति ने वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि उनका बेटा और बहू उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं।

    जिला मजिस्ट्रेट ने मामले की सुनवाई के बाद संपत्ति से बेटे और बहू को बेदखल करने का आदेश दिया था। आदेश में यह भी दर्ज किया गया था कि बुजुर्ग दंपति के पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है।

    हालांकि, मंडलीय आयुक्त ने बेदखली का आदेश बरकरार रखते हुए उसमें संशोधन किया और कहा कि सास-ससुर बहू और बच्चों को समान आकार का स्थायी वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराएं। यह भी ध्यान में रखा गया कि बच्चों में से एक विशेष आवश्यकता वाला बच्चा है।

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि पक्षों के बीच संबंध अत्यंत तनावपूर्ण और कटु हो चुके हैं, जिससे एक ही घर में साथ रहना संभव नहीं रह गया है।

    अदालत ने माना कि बुजुर्ग दंपति को अपने घर से बेदखली की मांग करने का अधिकार है।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बहू के भरण-पोषण और उसके रहने की व्यवस्था की प्राथमिक जिम्मेदारी उसके पति की है, न कि बुजुर्ग सास-ससुर की।

    हाईकोर्ट ने कहा,

    “घरेलू हिंसा अधिनियम या वरिष्ठ नागरिक अधिनियम में स्थायी आवास देने का कोई प्रावधान नहीं है। इन कानूनों में केवल साझा घर में रहने के अधिकार को मान्यता दी गई।”

    अदालत ने कहा कि वैकल्पिक आवास देने का आश्वासन यह नहीं माना जा सकता कि बहू को जीवनभर के लिए स्थायी मकान उपलब्ध कराया जाए।

    इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने आदेश में संशोधन करते हुए बुजुर्ग दंपति को निर्देश दिया कि वे बहू को साझा आवास के लिए हर महीने 25 हजार रुपये और भरण-पोषण के लिए अतिरिक्त 5 हजार रुपये दें।

    अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि चार महीने की अग्रिम राशि 45 दिनों के भीतर अदा की जाए। इसके बाद बहू और बच्चों को संपत्ति खाली करनी होगी।

    हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि मासिक भुगतान जारी नहीं रखा गया, तो बहू संपत्ति में दोबारा कब्जा बहाल करने की मांग कर सकती है।

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