जमानत अर्जी पर फैसला देने के बाद कोर्ट पुलिसवालों के खिलाफ जांच का आदेश नहीं दे सकता, न ही उसकी निगरानी कर सकता है: दिल्ली हाईकोर्ट

Shahadat

21 May 2026 7:33 PM IST

  • जमानत अर्जी पर फैसला देने के बाद कोर्ट पुलिसवालों के खिलाफ जांच का आदेश नहीं दे सकता, न ही उसकी निगरानी कर सकता है: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि एक बार जब ट्रायल कोर्ट बेल अर्जी पर फैसला दे देता है तो उसका काम खत्म हो जाता है (Functus Officio) और वह जांच में कथित देरी को लेकर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच का निर्देश देकर या उनके खिलाफ कड़ी टिप्पणियां करके मामले की निगरानी जारी नहीं रख सकता।

    जस्टिस सौरभ बनर्जी ने यह टिप्पणी पुलिस इंस्पेक्टर और अन्य पुलिस अधिकारी द्वारा दायर याचिकाओं को स्वीकार करते हुए की। इन याचिकाओं में एक POCSO मामले में एडिशनल सेशंस जज (ASJ) द्वारा जारी निर्देशों को चुनौती दी गई।

    यह मामला 2019 में दर्ज एक FIR से जुड़ा है, जिसमें एक नाबालिग लड़की के लापता होने के बाद IPC और POCSO Act के तहत अपराधों का आरोप लगाया गया।

    एक सह-आरोपी द्वारा दायर अग्रिम जमानत अर्जी पर सुनवाई के दौरान, ASJ ने जांच में देरी के संबंध में स्टेटस रिपोर्ट मांगी। बाद में पूर्व SHO और जांच अधिकारी सहित कई पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच का निर्देश दिया।

    याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि अग्रिम जमानत अर्जी पर फैसला होने के बाद ASJ का काम खत्म हो गया (Functus Officio) और वह जांच या अनुशासनात्मक कार्यवाही की निगरानी जारी नहीं रख सकते थे।

    उन्होंने यह भी तर्क दिया कि उन्हें सुनवाई का मौका दिए बिना ही उनके खिलाफ कड़ी टिप्पणियां की गईं, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

    इस तर्क को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि जमानत अर्जी पर फैसला करते समय कोर्ट का अधिकार क्षेत्र केवल बेल देने या न देने तक ही सीमित होता है और यह पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही की निगरानी तक नहीं बढ़ सकता।

    कोर्ट ने कहा,

    "एक बार जब माननीय ASJ के समक्ष कार्यवाही समाप्त/बंद हो गई तो किसी भी कारण से उनके समक्ष कुछ भी बचा हुआ/जीवित और/या लंबित नहीं था। ऐसे में, सभी उद्देश्यों के लिए अग्रिम बेल देने की अर्जी पर फैसला देने के बाद माननीय ASJ का काम खत्म हो गया था (functus officio)।"

    इसलिए कोर्ट ने आगे कहा,

    "विभागीय जांच का निर्देश देना और उसकी निगरानी करना, साथ ही संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कड़ी टिप्पणियां करना - और वह भी याचिकाकर्ताओं को कोई नोटिस जारी किए बिना, जिसमें उनसे कोई जवाब मांगा गया हो - पूरी तरह से अनुचित और अस्वीकार्य था।"

    इस मामले में 'State v. M. Murugesan (2020)' मामले का हवाला दिया गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हालांकि कोर्ट जांच में हुई चूकों को लेकर चिंता व्यक्त कर सकते हैं, लेकिन वे आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार के बहाने बेल देने के अधिकार क्षेत्र की सीमा से बाहर नहीं जा सकते।

    हाईकोर्ट ने 'स्टेट ऑफ़ वेस्ट बंगाल बनाम मीर मोहम्मद उमर (2006)' मामले का भी ज़िक्र किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने यह फ़ैसला दिया था कि आपराधिक अदालतों का समय जांच में हुई कमियों को ढूंढ़ने और जांच अधिकारियों के ख़िलाफ़ कड़वी टिप्पणियां करने में बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए।

    इसलिए कोर्ट ने ASJ के आदेश और उसके बाद की सभी कार्यवाहियों को रद्द किया। साथ ही पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ की गई प्रतिकूल टिप्पणियों को भी हटा दिया।

    यह देखते हुए कि ट्रायल कोर्ट द्वारा बार-बार इसी तरह के आदेश पारित किए जा रहे हैं, हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि इस फ़ैसले की एक प्रति सभी ज़िला जजों को भेजी जाए।

    Case title: Aishvir Singh (Inspector) v. State

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