गोदनामे से ही वैध नहीं मानी जाएगी गोद लेने की प्रक्रिया, 'लेने-देने' की रस्म जरूरी : राजस्थान हाईकोर्ट

Amir Ahmad

20 May 2026 11:30 AM IST

  • गोदनामे से ही वैध नहीं मानी जाएगी गोद लेने की प्रक्रिया, लेने-देने की रस्म जरूरी : राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल गोदनामा तैयार कर लेने भर से किसी गोद लेने की प्रक्रिया को कानूनन वैध नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत बच्चे को गोद देने और लेने की वास्तविक रस्म का होना अनिवार्य है और इसे महज औपचारिकता नहीं माना जा सकता।

    जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें निचली अदालत और अपीलीय अदालत द्वारा गोदनामे को अमान्य ठहराने के फैसले को चुनौती दी गई।

    मामले में महिला पक्ष ने कहा कि अपीलकर्ता को कभी भी हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार गोद नहीं लिया गया। आरोप लगाया गया कि कृषि भूमि हड़पने की मंशा से अपीलकर्ता के पिता ने धोखे से महिला के अंगूठे के निशान गोदनामे पर ले लिए और दस्तावेज की वास्तविक प्रकृति नहीं बताई।

    महिला की ओर से यह भी कहा गया कि अपीलकर्ता कभी उसके साथ नहीं रहा और न ही उसका पालन-पोषण, शिक्षा या देखभाल महिला द्वारा की गई। वह लगातार अपने जैविक माता-पिता के साथ ही रहा।

    दोनों पक्षकारों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा,

    “हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 स्पष्ट रूप से कहता है कि वैध गोद लेने के लिए बच्चे को एक परिवार से दूसरे परिवार में स्थानांतरित करने की मंशा के साथ वास्तविक रूप से देने और लेने की प्रक्रिया आवश्यक है। यह रस्म केवल औपचारिकता नहीं बल्कि वैध दत्तक ग्रहण की आत्मा है।”

    अदालत ने यह भी पाया कि गोदनामे में कहीं भी इस अनिवार्य रस्म के संपन्न होने का उल्लेख नहीं था। दस्तावेज में उन जरूरी रीति-रिवाजों और परंपराओं का भी जिक्र नहीं था, जो हिंदू कानून के तहत गोद लेने को वैधता प्रदान करते हैं।

    हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों का हवाला देते हुए कहा कि कथित गोद लेने के बाद भी अपीलकर्ता अपने जैविक माता-पिता की देखरेख और संरक्षण में ही रहा। अदालत के अनुसार ऐसा कोई ठोस प्रमाण पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि महिला ने उसे अपने दत्तक पुत्र के रूप में पाला-पोसा या उसकी जिम्मेदारी निभाई।

    इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले को सही ठहराते हुए अपील खारिज की।

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