कुछ दिव्यांग कर्मचारियों के लिए रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने का फ़ायदा हटाना उचित: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट
Shahadat
22 May 2026 7:39 PM IST

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार के उस फ़ैसले को सही ठहराया, जिसमें उसने अपने सर्विस नियमों में बदलाव करके कुछ खास कैटेगरी के दिव्यांग कर्मचारियों के लिए रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने का फ़ायदा वापस ले लिया था। कोर्ट ने कहा कि कर्मचारियों की अलग-अलग कैटेगरी के लिए रिटायरमेंट की अलग-अलग उम्र तय करना कोई गैर-कानूनी भेदभाव नहीं है।
जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर ने कहा,
"यह बात पूरी तरह से तय है कि एम्प्लॉयर (नियोक्ता) के पास यह पूरा अधिकार है कि वह काम की प्रकृति और जनसेवा की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए कर्मचारियों की अलग-अलग कैटेगरी के लिए रिटायरमेंट की अलग-अलग उम्र तय करे। हरियाणा सरकार ने इन्हीं ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए ग्रुप 'D' कर्मचारियों और न्यायिक अधिकारियों के मामले में छूट दी थी। अगर सरकार ने ऐसी पोस्ट पर काम करने वाले दिव्यांग कर्मचारियों के साथ भेदभाव किया होता और उनके लिए रिटायरमेंट की अलग उम्र तय की होती, जबकि रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने का फ़ायदा सिर्फ़ शारीरिक रूप से सक्षम कर्मचारियों को दिया होता तो RPwD एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन होता। लेकिन सरकार ने ऐसा कोई तरीका नहीं अपनाया।"
कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार ने एक सोच-समझकर फ़ैसला लिया कि ग्रुप 'D' कर्मचारियों और न्यायिक अधिकारियों को छोड़कर बाकी सभी कर्मचारियों के लिए रिटायरमेंट की उम्र एक जैसी रखी जाए। उसने 'एक जैसी स्थिति वाले' कर्मचारियों के बीच कोई भेदभाव नहीं किया।
कोर्ट ने कहा कि अगर कर्मचारियों की अलग-अलग कैटेगरी के लिए रिटायरमेंट की अलग-अलग उम्र तय करने का फ़ैसला किसी 'समझने लायक अंतर' (Intelligible Differentia) पर आधारित है तो उसे गलत नहीं ठहराया जा सकता।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि इस बदलाव से 'दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016' (RPwD Act) और संविधान के अनुच्छेद 14, 16, 19(1)(g) और 21 का उल्लंघन हुआ है। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि इस बदलाव के कारण दिव्यांग कर्मचारियों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार हो रहा है।
यह बात भी सामने रखी गई कि जहां ज़्यादातर दिव्यांग कर्मचारियों के लिए रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने का फ़ायदा वापस ले लिया गया, वहीं ग्रुप 'D' पोस्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों और न्यायिक अधिकारियों के लिए यह फ़ायदा परोक्ष रूप से जारी है। इस तरह एक ही जैसे कर्मचारियों के समूह (Homogenous Class) के भीतर ऐसा वर्गीकरण (Classification) बना दिया गया, जिसकी अनुमति नहीं है।
हालांकि, राज्य सरकार ने इस बदलाव का बचाव करते हुए कहा कि इसका मकसद एकरूपता सुनिश्चित करना और कथित असमानताओं को दूर करना है। सरकार ने यह भी कहा कि उसे काम की प्रकृति और सेवा की ज़रूरतों के आधार पर रिटायरमेंट की अलग-अलग उम्र तय करने का अधिकार है। इस चुनौती को खारिज करते हुए कोर्ट ने फैसला दिया कि RPwD Act के तहत रोक दिव्यांग व्यक्तियों और उनके जैसी ही स्थिति वाले गैर-दिव्यांग व्यक्तियों के बीच भेदभाव के खिलाफ है, न कि पदों की प्रकृति के आधार पर किए गए वर्गीकरण के खिलाफ।
कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि हालांकि दिव्यांग व्यक्ति एक समरूप वर्ग बनाते हैं, फिर भी रोज़गार की अलग-अलग श्रेणियों में सेवा की अलग-अलग शर्तें होना अपने आप में भेदभाव नहीं माना जाएगा।
बेंच ने यह पाया कि राज्य ने सभी कर्मचारियों के लिए रिटायरमेंट की एक समान उम्र रखी है, सिवाय कुछ खास श्रेणियों जैसे ग्रुप 'D' कर्मचारियों और न्यायिक अधिकारियों के; और यह फैसला सेवा की ज़रूरतों से जुड़े तर्कसंगत आधार पर लिया गया। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि पदों की एक ही श्रेणी के भीतर, दिव्यांग कर्मचारियों पर विशेष रूप से कोई अलग या प्रतिकूल रिटायरमेंट शर्त नहीं थोपी गई।
"उचित सुविधा" (Reasonable Accommodation) वापस लिए जाने की दलील पर कोर्ट ने फैसला दिया कि किसी भी निहित अधिकार को छीना नहीं गया। साथ ही अपने पहले के निष्कर्षों को दोहराया कि ऐसे नीतिगत फैसले राज्य के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, जब तक कि उन्हें मनमाना या भेदभावपूर्ण साबित न कर दिया जाए।
याचिका में कोई दम न पाते हुए कोर्ट ने इसे खारिज किया। साथ ही इस बात की पुष्टि की कि विवादित अधिसूचना न तो RPwD Act का उल्लंघन करती है और न ही संवैधानिक गारंटियों का।
Title: Madan Kumar v. State of Haryana and others

