सुप्रीम कोर्ट
NEET-PG 2025 | 'उत्तर कुंजी प्रकाशित करने संबंधी अपनी नीति का खुलासा करें': सुप्रीम कोर्ट ने NBE से पूछा
पारदर्शिता को महत्वपूर्ण कारक बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इस बात की जांच करेगा कि क्या NEET-PG परीक्षा की उत्तर कुंजी प्रकाशित करने से परीक्षा की शुचिता प्रभावित होगी। साथ ही न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि वह NEET-PG 2025 में विसंगतियों के व्यक्तिगत आरोपों पर विचार नहीं करेगा।जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस विपुल एम पंचोली की खंडपीठ ने NEET-PG परीक्षा से संबंधित विभिन्न मुद्दों को उठाने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की, जिनमें पारदर्शिता के तौर पर उत्तर कुंजी का खुलासा आदि शामिल हैं।शुरुआत...
उम्मीदवार की दोषसिद्धि को छिपाने से चुनाव रद्द, यह अप्रासंगिक है कि खुलासा न करने से परिणाम प्रभावित हुए या नहीं: सुप्रीम कोर्ट
यह देखते हुए कि 'दोषसिद्धि का खुलासा न करना' महत्वपूर्ण जानकारी को छिपाना है, जो मतदाताओं के सूचित चुनाव करने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (6 नवंबर) को एक पूर्व पार्षद की अयोग्यता बरकरार रखी, जिन्होंने चुनावी हलफनामे में अपने आपराधिक इतिहास का खुलासा नहीं किया था कि उन्हें चेक अनादर मामले में दोषी ठहराया गया और एक साल की कैद हुई।पूर्व पार्षद की अपील खारिज करते हुए जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर की खंडपीठ ने चुनावी पारदर्शिता के महत्व पर ज़ोर देते हुए...
कानूनी उत्तराधिकारी का नाम रिकॉर्ड में दर्ज न किए जाने पर सुनवाई से पहले मृत पक्षकार के पक्ष में पारित निर्णय अमान्य: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (6 नवंबर) को कहा कि किसी ऐसे पक्षकार के पक्ष में दिया गया निर्णय, जिसकी सुनवाई से पहले ही मृत्यु हो गई हो, कानूनी रूप से लागू नहीं होता और कानून में उसका कोई प्रभाव नहीं होता।दूसरे शब्दों में, यदि अपीलकर्ता की अपील की सुनवाई से पहले ही मृत्यु हो जाती है तो अपील रद्द हो जाती है।जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की खंडपीठ ने उस मामले की सुनवाई की, जिसमें दो प्रतिवादियों ने वादी के पक्ष में पारित ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए प्रथम अपील दायर की थी।...
गिरफ्तारी के लिखित आधार गिरफ्तार व्यक्ति की समझ में आने वाली भाषा में प्रस्तुत न किए जाने पर गिरफ्तारी और रिमांड अवैध: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तार व्यक्ति को उसकी समझ में आने वाली भाषा में गिरफ्तारी के लिखित आधार उपलब्ध न कराने पर गिरफ्तारी और उसके बाद रिमांड अवैध हो जाती है।कोर्ट ने कहा,"गिरफ्तार व्यक्ति द्वारा न समझी जाने वाली भाषा में आधारों का केवल संप्रेषण ही भारत के संविधान के अनुच्छेद 22 के तहत संवैधानिक आदेश को पूरा नहीं करता। गिरफ्तार व्यक्ति द्वारा समझी जाने वाली भाषा में ऐसे आधार प्रदान न करने से संवैधानिक सुरक्षा उपाय भ्रामक हो जाते हैं और भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत प्रदत्त...
BREAKING: अभियुक्त को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने के दो घंटे के अंदर लिखित आधार प्रस्तुत किए जाए, अन्यथा रिमांड होगी अवैध: सुप्रीम कोर्ट
एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (6 नवंबर) को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में देने की आवश्यकता को IPC/BNS के तहत सभी अपराधों पर लागू करने का निर्णय लिया, न कि केवल PMLA या UAPA जैसे विशेष कानूनों के तहत उत्पन्न होने वाले मामलों पर।चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने कहा कि गिरफ्तार व्यक्ति को उसकी समझ में आने वाली भाषा में गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में न देने पर गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड अवैध हो जाएगी।अदालत ने कहा,"भारत के...
मृत्यु की धारणा के लिए निर्धारित 7 वर्ष की अवधि से पहले रिटायर हुए लापता कर्मचारी को अनुकंपा नियुक्ति का दावा नहीं: सुप्रीम कोर्ट
यह देखते हुए कि किसी व्यक्ति के लापता होने की तिथि से सात वर्ष बाद ही मृत्यु की धारणा बनती है, सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ का आदेश रद्द कर दिया, जिसमें नगर निगम को लापता कर्मचारी के पुत्र को अनुकंपा नियुक्ति देने का निर्देश दिया गया था, जो नागरिक मृत्यु की धारणा के लिए आवश्यक सात वर्ष की अवधि पूरी होने से पहले ही रिटायर हो गया था।कोर्ट ने कहा कि चूंकि कर्मचारी का परिवार पहले ही रिटायरमेंट और पेंशन संबंधी लाभ स्वीकार कर चुका है, इसलिए वे बाद में अनुकंपा नियुक्ति का...
S. 156(3) CrPC | शिकायत में संज्ञेय अपराध का खुलासा होने पर मजिस्ट्रेट पुलिस को FIR दर्ज करने का निर्देश दे सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (4 नवंबर) को कहा कि जब शिकायत में आरोपित तथ्य किसी अपराध के घटित होने का खुलासा करते हैं तो मजिस्ट्रेट पुलिस को CrPC की धारा 156(3) (अब BNSS की धारा 175(3)) के तहत FIR दर्ज करने का निर्देश देने के लिए अधिकृत हैं।जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की खंडपीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया, जिसमें मजिस्ट्रेट के निर्देश पर CrPC की धारा 156(3) के तहत दर्ज की गई FIR रद्द कर दी गई थी। चूंकि मजिस्ट्रेट को दी गई शिकायत में आरोपित तथ्य एक संज्ञेय अपराध...
जिला जजों की नियुक्तियां | पदोन्नति पाने वालों की सीधी भर्ती से तुलना नहीं की जा रही: सुप्रीम कोर्ट ने सीनियरिटी मानदंडों पर फैसला सुरक्षित रखा
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इस मुद्दे पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया कि क्या जिला न्यायाधीश के पदों पर कार्यरत न्यायिक अधिकारियों की पदोन्नति के लिए कोई कोटा होना चाहिए।चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) बीआर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टित जॉयमाल्या बागची की पांच सदस्यीय पीठ इस बात पर विचार कर रही है कि न्यायिक सेवा में पारस्परिक वरिष्ठता निर्धारित करने के लिए पूरे देश में एक समान दिशानिर्देश बनाए जाएं या नहीं। न्यायालय इस मुद्दे पर विचार कर रहा है कि क्या...
MV Act | निजी बस संचालक अधिसूचित राज्य परिवहन मार्गों से ओवरलैप करने वाले अंतर-राज्यीय मार्गों पर बस नहीं चला सकते: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि निजी संचालकों को पारस्परिक परिवहन समझौतों के तहत अंतर-राज्यीय मार्गों पर स्टेज-कैरिज परमिट नहीं दिए जा सकते, यदि उन मार्गों का कोई भी भाग मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के अध्याय VI के तहत राज्य परिवहन उपक्रमों के लिए आरक्षित अधिसूचित अंतर-राज्यीय मार्ग से ओवरलैप करता है।जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टाइन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर पीठ के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के परिवहन विभागों के बीच अंतर-राज्यीय पारस्परिक...
कर्मचारियों से परामर्श न लेने मात्र से बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली अवैध नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा ओडिशा के महालेखाकार (लेखांकन एवं व्यय) कार्यालय में बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली (Biometric Attendance System - BAS) लागू करने के फैसले को सही ठहराया है। कोर्ट ने कर्मचारियों की इस दलील को खारिज कर दिया कि इस प्रणाली को लागू करने से पहले उनसे परामर्श नहीं किया गया था।जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने ओडिशा हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली की शुरुआत को अवैध ठहराया गया था। कोर्ट ने...
संपत्ति पर कब्जा न होने और स्वामित्व विवादित होने पर केवल निषेधाज्ञा का मुकदमा पर्याप्त नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि जब विवादित संपत्ति का स्वामित्व (title) ही विवादित हो और कब्जा (possession) प्रतिवादी के पास हो, तब केवल “शांतिपूर्ण उपयोग में हस्तक्षेप न करने के लिए निषेधाज्ञा (injunction)” का मुकदमा कानूनी रूप से बनाए नहीं रखा जा सकता, जब तक कि उसके साथ स्वामित्व की घोषणा (declaration of title) और कब्जा वापस पाने (recovery of possession) की मांग भी न की जाए।दूसरे शब्दों में, जब वादी (plaintiff) के पास संपत्ति का कब्जा नहीं है और प्रतिवादी (defendant) स्वामित्व का दावा करता है, तब...
'राज्य द्वारा उच्च सीमा तय करने के बाद कोई भेदभाव नहीं': सुप्रीम कोर्ट ने असम वित्त निगम के रिटायर कर्मचारियों के लिए बढ़ी हुई ग्रेच्युटी राशि बरकरार रखी
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में गुवाहाटी हाईकोर्ट के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार किया, जिसमें रिटायर कर्मचारियों को राज्य सरकार द्वारा निर्धारित ग्रेच्युटी की उच्च सीमा प्रदान करने के पक्ष में फैसला सुनाया गया। कोर्ट ने कहा कि एक बार जब राज्य के नियमन में ग्रेच्युटी प्रदान करने की उच्च सीमा निर्धारित हो जाती है तो ग्रेच्युटी राशि के वितरण में कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता है और प्रत्येक कर्मचारी के साथ समान व्यवहार किया जाएगा।जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने उस मामले...
Delhi Municipal Regulations | कन्वर्जन चार्ज चुकाने के बाद ही ऊपरी मंजिल को व्यावसायिक उपयोग के लिए परिवर्तित किया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (31 अक्टूबर) को दिल्ली के न्यू राजिंदर नगर मार्केट में आवासीय उद्देश्यों के लिए ऊपरी मंजिलों के अनधिकृत उपयोग के लिए व्यावसायिक प्रतिष्ठान की सीलिंग को बरकरार रखा। साथ ही स्पष्ट किया कि दिल्ली नगर निगम (MCD) को निर्धारित कन्वर्जन चार्ज का भुगतान करने पर ऐसे परिसर को व्यावसायिक उपयोग के लिए परिवर्तित किया जा सकता है।कोर्ट ने कहा कि चूंकि न्यू राजिंदर नगर मार्केट एक "नामित एलएससी" (दुकान-सह-आवास) है, न कि "नियोजित एलएससी" (पूर्णतः व्यावसायिक), जिसका अर्थ है कि ऊपरी...
व्हाट्सएप या सोशल मीडिया के ज़रिए नोटिस नहीं भेजा सकता: सुप्रीम कोर्ट
अग्रिम ज़मानत के एक मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि व्हाट्सएप या ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के ज़रिए नोटिस नहीं भेजा जाना चाहिए।जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की खंडपीठ एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें व्यक्ति पर बलात्कार का आरोप है। उस पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 64(2)(f), 351(2), 296 और 3(5) के तहत दंडनीय अपराध करने का आरोप है। जब अदालत ने पूछा कि क्या याचिकाकर्ता के वकील ने शिकायतकर्ता-पीड़िता को नोटिस भेजा है तो उन्होंने कहा कि...
टेंडर अथॉरिटी टेंडर आमंत्रण सूचना के विपरीत शर्तें नहीं लगा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (31 अक्टूबर) को ने एक टेंडर प्रक्रिया में एक बोलीदाता को अयोग्य ठहराए जाने का फैसला खारिज कर दिया और कहा कि टेंडर अथॉरिटी ने बोलीदाता को टेंडर आमंत्रण सूचना (NIT) में निर्धारित नहीं की गई शर्त को पूरा करने के लिए बाध्य किया।अदालत ने कहा,"हमारा मानना है कि अपीलकर्ता की तकनीकी बोली को इस आधार पर खारिज करना कि अपीलकर्ता का प्रमाण पत्र जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी नहीं किया गया, NIT की शर्तों के विरुद्ध है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।"जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या...
वकीलों को मुवक्किलों के साथ संचार का खुलासा करने के लिए जांच एजेंसियों द्वारा दी जाने वाली धमकियों से बचाना ही BSA की धारा 132 का उद्देश्य: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने जांच अधिकारियों द्वारा वकीलों को मनमाने ढंग से समन भेजने से बचाने के लिए निर्देश जारी करते हुए कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 132-134 का उद्देश्य वकीलों को अपने मुवक्किलों के साथ विशेष संचार का खुलासा करने के लिए अनावश्यक धमकाने से बचाना है।चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) बीआर गवई, जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने जांच एजेंसियों द्वारा अभियुक्तों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों को मनमाने ढंग से समन भेजने के मुद्दे पर कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान...
इन-हाउस काउंसल 'वकील' नहीं, नियोक्ता के साथ उनका संवाद BSA की धारा 132 के तहत संरक्षित नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इन-हाउस वकीलों और उनके नियोक्ताओं के बीच संवाद भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 132 के तहत मुवक्किल-वकील विशेषाधिकार द्वारा संरक्षित नहीं है, क्योंकि एडवोकेट एक्ट, 1961 के अर्थ में इन-हाउस काउंसल 'वकील' नहीं हैं।हालांकि, कोर्ट ने माना कि इन-हाउस वकील और उनकी कंपनी के कानूनी सलाहकार के बीच संवाद BSA की धारा 134 के तहत प्रकटीकरण से संरक्षित रहेगा।चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) बीआर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने यह टिप्पणी जांच एजेंसियों द्वारा अपने...
BREAKING| BSA की धारा 132 के तहत अपवादों को छोड़कर वकीलों को समन जारी नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट ने जारी किए निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (31 अक्टूबर) को कुछ निर्देश जारी किए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जांच एजेंसियां आपराधिक मामलों में अभियुक्तों को दी गई कानूनी सलाह के आधार पर वकीलों को मनमाने ढंग से समन जारी न करें।चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) बीआर गवई, जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने जांच एजेंसियों द्वारा अभियुक्तों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों को मनमाने ढंग से समन जारी करने के मुद्दे पर कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लिए गए मामले में यह निर्णय सुनाया।यद्यपि कोर्ट ने कोई...
सुप्रीम कोर्ट ने जांच के लिए वकीलों के डिजिटल डिवाइस की प्रस्तुति पर निर्देश जारी किए, कहा- मुवक्किलों के दस्तावेज़ BSA की धारा 132 के अंतर्गत नहीं आते
सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों के दस्तावेज़ों और डिजिटल डिवाइस, जिनमें मुवक्किलों की जानकारी हो सकती है, उनकी प्रस्तुति को विनियमित करने के लिए विस्तृत निर्देश जारी किए।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुवक्किल से संबंधित लेकिन वकील द्वारा रखे गए दस्तावेज़, भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 132 के तहत विशेषाधिकार के अंतर्गत नहीं आते, चाहे वे दीवानी या आपराधिक कार्यवाही में हों। हालांकि, ऐसी प्रस्तुति में सख्त प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन किया जाना चाहिए।आपराधिक मामलों में यदि किसी वकील को मुवक्किल का...
750 रुपये से अधिक एनरोलमेंट फीस लेने पर बार काउंसिलों पर अवमानना की कार्रवाई होगी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य बार काउंसिलों को पिछले साल जारी अपने निर्देशों का पालन करने का आखिरी मौका दिया, जिसमें एनरोलमेंट फीस के रूप में 750 रुपये से अधिक फीस न लेने का निर्देश दिया गया।गौरव कुमार बनाम भारत संघ (2024) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बार काउंसिल एडवोकेट एक्ट, 1961 की धारा 24 के तहत निर्धारित फीस से अधिक एनरोलमेंट फीस नहीं ले सकते। धारा 24 में प्रावधान है कि सामान्य वर्ग के वकीलों के लिए एनरोलमेंट फीस 750 रुपये और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति वर्ग के वकीलों के लिए 125 रुपये से...




















