सुप्रीम कोर्ट मंथली राउंड अप : अगस्त, 2026
Shahadat
4 Sept 2026 9:17 PM IST

सुप्रीम कोर्ट में अगस्त, 2026 में क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट मंथली राउंड अप। जुलाई महीने के सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
कानूनी अथॉरिटी आर्टिकल 131 का इस्तेमाल नहीं कर सकती, यह केंद्र-राज्य विवादों तक सीमित: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई कानूनी अथॉरिटी या राज्य की संस्था संविधान के आर्टिकल 131 के तहत अपने ओरिजिनल अधिकार क्षेत्र (Original Jurisdiction) का इस्तेमाल नहीं कर सकती। कोर्ट ने दोहराया कि यह प्रावधान भारत संघ और एक या अधिक राज्यों के बीच विवादों तक ही सीमित है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए यह बात कही। हाईकोर्ट ने लखनऊ में ज़मीन के कब्ज़े से जुड़े विवाद पर लखनऊ डेवलपमेंट अथॉरिटी (LDA) की लंबे समय से लंबित रिट याचिका खारिज की थी।
Case : Lucknow Development Authority v. Union of India & Ors., Civil Appeal No. 11201 of 2026
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जब ज़मीन के मालिकाना हक़ को लेकर असली विवाद हो तो सरकार तुरंत बेदख़ली की कार्रवाई नहीं कर सकती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब ज़मीन के मालिकाना हक़ को लेकर कोई असली विवाद हो तो सरकार बेदख़ली के लिए तुरंत कार्रवाई (समरी प्रोसीडिंग्स) नहीं कर सकती, खासकर तब जब विवाद कब्ज़े और मालिकाना हक़ से जुड़ा हो जो कई दशकों पुराना हो।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने आंध्र प्रदेश असाइन्ड लैंड (ट्रांसफर पर रोक) एक्ट, 1977 के संदर्भ में यह फ़ैसला सुनाया कि मालिकाना हक़ से जुड़े पुराने विवादों का फ़ैसला तुरंत कार्रवाई के ज़रिए नहीं किया जा सकता।
Cause Title: M/s Circar Paper Mills Ltd. v. District Collector, Nellore Distt. & Ors. (with connected matters)
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National Highways Act | रेफ़रेंस कोर्ट मुआवज़े के हक के लिए मालिकाना हक़ तय कर सकता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फ़ैसला सुनाया कि नेशनल हाईवेज़ एक्ट के तहत रेफ़रेंस कोर्ट मुआवज़े के हक को तय करने के लिए मालिकाना हक़ से जुड़े सवालों पर भी विचार कर सकता है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा, "इसलिए धारा 3H (4) के तहत रेफ़रेंस कोर्ट का अधिकार क्षेत्र इतना व्यापक है कि वह मालिकाना हक़ से जुड़े सवालों पर भी विचार कर सकता है, बशर्ते ऐसा करना ज़मीन अधिग्रहण से मिलने वाले मुआवज़े के हकदार व्यक्ति को तय करने के लिए ज़रूरी हो। इसके उलट कोई भी व्याख्या विधायी योजना को विफल कर देगी और पार्टियों को मालिकाना हक़ की घोषणा के लिए अलग से सिविल मुक़दमे करने पर मजबूर करेगी, जिससे विवाद को मुख्य सिविल कोर्ट में भेजने का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा।"
Cause Title: K. VENKATASWAMY & ORS. VS. GOWRAMMA & ANR.
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सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: कारों के लिए थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस को 4 साल और दो-पहिया वाहनों के लिए 6 साल तक बढ़ाया जाए
एक अहम घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट ने नई कारों के लिए थर्ड-पार्टी मोटर वाहन इंश्योरेंस की अवधि को चार साल और नए दो-पहिया वाहनों के लिए छह साल तक बढ़ाने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट के 2018 के निर्देश के बाद यह कारों के लिए 3 साल और दो-पहिया वाहनों के लिए 5 साल है।
मंगलवार को कोर्ट ने गौर किया कि आठ साल पहले जारी किए गए इस निर्देश के बावजूद, कई वाहन बिना इंश्योरेंस के हैं। इसलिए कोर्ट ने इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (IRDAI) और जनरल इंश्योरेंस काउंसिल (GIC) की आपत्तियों के बावजूद नई पॉलिसी की अवधि बढ़ाने का निर्देश दिया।
Case : National Insurance Co Ltd v Smt Thungala Dhana Laxmi
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IPC की धारा 498A 'शादी जैसे रिश्तों' पर भी होगी लागू: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (3 अगस्त) को कहा कि 'शादी जैसे रिश्तों' (Live in Relationship) में रहने वाली महिलाओं को IPC की धारा 498A के तहत सुरक्षा से बाहर रखना भेदभावपूर्ण होगा। कोर्ट ने माना कि ऐसे रिश्ते में रहने वाले पुरुष पर भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 की धारा 498A के तहत घरेलू क्रूरता का मुकदमा चलाया जा सकता है। हालांकि, कोर्ट ने साफ़ किया कि यह फ़ैसला उन "लिव-इन रिश्तों" पर लागू होगा जो "शादी जैसे रिश्तों" की श्रेणी में आते हैं, यानी जहाँ शादी करने का इरादा साफ़ हो।
Cause Title: X & ORS. VERSUS STATE OF KARNATAKA & ANR.
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सिर्फ 'संदेह' के आधार पर बैंक अकाउंट फ्रीज नहीं कर सकती ED, 'Reasons to Believe' अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को प्रवर्तन निदेशालय (ED) की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें कहा गया था कि धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2000 की धारा 17(1A) के तहत केवल 'संदेह' (Suspicion) के आधार पर बैंक खाते फ्रीज नहीं किए जा सकते। इसके लिए सक्षम प्राधिकारी के पास 'Reasons to Believe' (विश्वास के कारण) होना अनिवार्य है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की खंडपीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट की व्याख्या से सहमति जताते हुए कहा कि भले ही धारा 17(1A) में "Reasons to Believe" शब्दों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन इसे धारा 17(1) से अलग करके नहीं पढ़ा जा सकता। जब्ती (Seizure) के लिए 'Reasons to Believe' आवश्यक है और चूंकि फ्रीज करना जब्ती का ही एक वैकल्पिक उपाय है, इसलिए उस पर भी वही मानक लागू होगा।
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JJ Act | रेगुलर कोर्ट ने नाबालिग पर बालिग़ की तरह मुक़दमा चलाया तो भी सज़ा का फ़ैसला रद्द नहीं होगा: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी नाबालिग पर रेगुलर क्रिमिनल कोर्ट में मुक़दमा चलाया गया तो सिर्फ़ इस वजह से मामले के गुण-दोष के आधार पर हुई सज़ा (कनविक्शन) रद्द करने की ज़रूरत नहीं। इसी के अनुसार, कोर्ट ने एक ऐसे आरोपी की सज़ा (कनविक्शन) को तो बरकरार रखा, जिस पर बालिग़ की तरह मुक़दमा चलाया गया था, लेकिन अपराध की तारीख़ पर उसके नाबालिग होने का पता चलने के बाद उसे सुनाई गई सज़ा रद्द कर दी।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की, जिसमें अपील करने वाले आरोपी पर रेगुलर कोर्ट में मुक़दमा चलाया गया और उसे हत्या के अपराध के लिए दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सज़ा सुनाई गई।
Cause Title: DINESH KUMAR VERSUS THE STATE OF HARYANA
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अगर किसी व्यक्ति के पास गोपनीय जानकारी है और वह ट्रेडिंग करता है तो इसे इनसाइडर ट्रेडिंग माना जाएगा: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (11 अगस्त) को कहा कि SEBI (इनसाइडर ट्रेडिंग पर रोक) रेगुलेशन, 2015 के तहत इनसाइडर ट्रेडिंग का अनुमान लगाने के लिए सिर्फ़ 'अनपब्लिश्ड प्राइस सेंसिटिव इन्फॉर्मेशन' (UPSI) का पास होना और उस दौरान सिक्योरिटीज़ में ट्रेडिंग करना ही काफ़ी है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (SAT) के आदेश को रद्द करते हुए सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) की अपील को मंज़ूरी दी। इसके साथ ही कोर्ट ने तारा ज्वेल्स लिमिटेड (TJL) के प्रमोटरों के ख़िलाफ़ रेगुलेटर का आदेश बहाल किया।
Cause Title: SECURITIES AND EXCHANGE BOARD OF INDIA VERSUS RAJEEV VASANT SHETH & ORS.
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आपराधिक मामला लंबित होने पर सरकारी कर्मचारी को नौकरी से नहीं निकाला जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई सरकारी नियोक्ता किसी कर्मचारी को सिर्फ़ इसलिए नौकरी से नहीं निकाल सकता कि उसके ख़िलाफ़ कोई आपराधिक मामला लंबित है, खासकर तब जब कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का मौका न दिया गया हो।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने पुलिस कॉन्स्टेबल को नौकरी से हटाने को ग़ैर-क़ानूनी माना, क्योंकि उसे हटाते समय उसे दोषी नहीं ठहराया गया और यह आदेश पूरी तरह से आपराधिक मामला लंबित होने के आधार पर दिया गया।
Cause Title: SPO/CONSTABLE IRB SATPAL SINGH VERSUS STATE OF PUNJAB & ORS.
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Judicial Service में 3 साल की Practice Rule घटाकर 1 साल: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने Judicial Service में Civil Judge (Junior Division) के पद पर सीधी भर्ती के लिए अनिवार्य 3 साल की legal practice की शर्त को बदलते हुए इसे 1 साल की active practice किया।
हालांकि, चयनित उम्मीदवारों को नियुक्ति के बाद एक साल Judicial Academy में training और एक साल structured law clerkship पूरी करनी होगी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मई 2025 के फैसले के खिलाफ दाखिल review petitions पर यह फैसला सुनाया। जस्टिस विनोद चंद्रन ने असहमति जताई।
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सिविल जज भर्ती में LLM को वकालत के बराबर नहीं माना जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की भर्ती के लिए कानून में पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री को बार में वकालत के अनुभव के बराबर मानने की मांग खारिज की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में पोस्ट ग्रेजुएट शिक्षा को वास्तविक न्यायिक और वकालत के अनुभव का विकल्प नहीं माना जा सकता।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ( CJI) सूर्यकांत, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह फैसला मई 2025 के उस निर्णय के खिलाफ दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें निचली ज्यूडिशियल सर्विसेज में सीधे प्रवेश के लिए वकालत के पूर्व अनुभव की अनिवार्यता बहाल की गई।
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अगर सर्विस रूल्स में कहा गया कि PSC का फ़ैसला फ़ाइनल है तो सरकार कैंडिडेट की योग्यता की दोबारा जांच नहीं कर सकती: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जहां सर्विस रूल्स में साफ़ तौर पर कहा गया कि कैंडिडेट की योग्यता पर पब्लिक सर्विस कमीशन (PSC) का फ़ैसला फ़ाइनल होगा, वहां कमीशन द्वारा व्यक्ति को योग्य पाए जाने और नियुक्ति के लिए उसकी सिफ़ारिश करने के बाद सरकार स्वतंत्र रूप से उस व्यक्ति की योग्यता की दोबारा जांच या पूरी तरह से दोबारा मूल्यांकन नहीं कर सकती।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने शैलेंद्र कुमार पटेल से जुड़े मामले की सुनवाई की, जिन्हें छत्तीसगढ़ पब्लिक सर्विस कमीशन (CGPSC) ने स्टेट यूनिवर्सिटी में रजिस्ट्रार के पद के लिए चुना था और उनकी सिफ़ारिश की थी। सिफ़ारिश के बावजूद, राज्य सरकार ने अपनी जांच समिति बनाई, जिसने निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता के पास ज़रूरी अनुभव नहीं था, जिसके कारण उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया।
Cause Title: SHAILENDRA KUMAR PATEL VERSUS STATE OF CHHATTISGARH & ORS. (with connected case)
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बंद जगह पर जातिसूचक गाली देना SC/ST Act के तहत अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (20.08.2026) को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) की धारा 3(2)(r) और 3(1)(s) के तहत चल रही कार्यवाही रद्द की। यह मामला स्कूल मैनेजर के खिलाफ दर्ज किया गया, जिस पर दो छात्रों के पिता के साथ मारपीट करने और जातिसूचक गालियां देने का आरोप था। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए मामला रद्द किया कि कथित बातें एक बंद कमरे में कही गईं, जहां आम जनता की पहुंच नहीं थी, इसलिए कानून की ज़रूरी शर्तों को पूरा नहीं किया गया।
Case : Ramkrishna Chauhan v State of Uttar Pradesh & Anr
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बेंगलुरु वॉटर सप्लाई मामले में दी गई 'इंडस्ट्री' की परिभाषा ही लंबित मामलों पर लागू होगी: सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच
सुप्रीम कोर्ट ने 5:4 के बहुमत से 'बेंगलुरु वॉटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजाप्पा' मामले में 1978 के फैसले में तय किए गए "ट्रिपल टेस्ट" (तीन शर्तों वाले परीक्षण) को फिर से परिभाषित किया। यह परीक्षण यह तय करने के लिए था कि क्या कोई गतिविधि 'इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947' की धारा 2(j) के तहत "इंडस्ट्री" (उद्योग) की परिभाषा में आएगी या नहीं। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नया फॉर्मूला केवल भविष्य के मामलों पर लागू होगा और इससे पहले के फैसलों या लंबित कार्यवाही पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
Case Details : STATE OF U.P. Vs JAI BIR SINGH | C.A. No. 897/2002
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PC-PNDT Act के तहत अपराधों के लिए पुलिस FIR दर्ज नहीं कर सकती, न ही जांच कर सकती है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस 'प्री-कन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स (लिंग चयन पर रोक) एक्ट, 1994' (PC & PNDT Act) के तहत अपराधों के लिए FIR दर्ज नहीं कर सकती और न ही मुख्य जांच एजेंसी के तौर पर काम कर सकती है।
कोर्ट ने कहा कि एक्ट के तहत बनी 'उचित अथॉरिटी' (Appropriate Authority) शिकायतों की जांच के लिए जिम्मेदार है, जबकि पुलिस ज़्यादा से ज़्यादा तब सहायक भूमिका निभा सकती है जब उचित अथॉरिटी को इसकी ज़रूरत हो।
Case Title: THE STATE OF UTTAR PRADESH Vs BRIJ PAL SINGH
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बैंक और इंश्योरेंस प्रमोशन के लिए ऑटो डीलरों को मिले रेफरल चार्ज पर सर्विस टैक्स लगेगा: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (19 अगस्त) को कहा कि ऑटोमोबाइल डीलरों को बैंकों और इंश्योरेंस कंपनियों से गाड़ी का लोन और इंश्योरेंस पॉलिसी दिलाने के लिए मिलने वाले रेफरल चार्ज पर फाइनेंस एक्ट, 1994 के तहत "बिज़नेस ऑक्सिलरी सर्विस" (व्यावसायिक सहायक सेवा) के तौर पर टैक्स लगेगा।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा, "आसेसी (टैक्स देने वाला) बैंकों और इंश्योरेंस कंपनी के कारोबार को बढ़ावा दे रहा है, जिसके लिए उन्हें एग्रीमेंट में तय रकम मिलती है।"
Cause Title: M/S TVS MOTOR COMPANY LIMITED Versus COMMISSIONER OF CENTRAL EXCISE, CHENNAI-III
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मैजिस्ट्रेट द्वारा CrPC की धारा 156(3) के तहत एप्लीकेशन खारिज करने के बावजूद पुलिस FIR दर्ज कर सकती है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (19 अगस्त) को कहा कि Cr.P.C. की धारा 156(3) / BNSS की धारा 175(3) के तहत FIR दर्ज करने के लिए मैजिस्ट्रेट के पास दी गई एप्लीकेशन खारिज होने के बाद भी पुलिस FIR दर्ज कर सकती है।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने कहा, "CrPC की धारा 156(3) के तहत एप्लीकेशन खारिज होने से CrPC की धारा 154 के तहत पुलिस पर डाली गई स्वतंत्र कानूनी जिम्मेदारी कम या खत्म नहीं हो सकती।"
Cause Title: PRAMOD KUMAR SHUKLA VERSUS STATE OF UTTAR PRADESH AND OTHERS
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एग्जीक्यूशन कोर्ट आदेश से आगे बढ़कर ऐसी राहत नहीं दे सकता, जो उसमें शामिल न हो: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फिर से कहा कि एग्जीक्यूशन कोर्ट (आदेश लागू करने वाली अदालत) के लिए उस आदेश या डिक्री से आगे बढ़कर ऐसी राहत देना सही नहीं है, जिसका आदेश में कोई ज़िक्र न हो या जिसका इरादा न हो।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा, "एग्जीक्यूशन कोर्ट उस आदेश से आगे नहीं बढ़ सकता जिसे लागू किया जाना है, और न ही उसकी व्याख्या (Interpretation) में गहराई से जा सकता है, खासकर तब जब आदेश में किसी और या खास व्याख्या की ज़रूरत न हो।"


