सिविल जज भर्ती में LLM को वकालत के बराबर नहीं माना जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
Amir Ahmad
21 Aug 2026 5:41 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की भर्ती के लिए कानून में पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री को बार में वकालत के अनुभव के बराबर मानने की मांग खारिज की।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून में पोस्ट ग्रेजुएट शिक्षा को वास्तविक न्यायिक और वकालत के अनुभव का विकल्प नहीं माना जा सकता।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ( CJI) सूर्यकांत, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह फैसला मई 2025 के उस निर्णय के खिलाफ दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें निचली ज्यूडिशियल सर्विसेज में सीधे प्रवेश के लिए वकालत के पूर्व अनुभव की अनिवार्यता बहाल की गई।
फैसला सुनाते हुए चीफ जस्टिस ने कहा,
“पोस्ट ग्रेजुएट को वकालत के बराबर माना जाना चाहिए इस दलील को हम स्वीकार नहीं कर पाए हैं।”
सुप्रीम कोर्ट ने दो-एक के बहुमत से वकालत के अनुभव की अनिवार्यता लागू करने के तरीके में बदलाव किया है। जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने इस हिस्से पर असहमति जताई।
कोर्ट ने कहा कि 20 मई 2025 से 31 मार्च 2027 के बीच जारी होने वाली सिविल जज भर्ती की अधिसूचनाओं में सभी लॉ ग्रेजुएट आवेदन कर सकेंगे। इन भर्तियों के लिए तीन साल की वकालत के अनुभव की शर्त लागू नहीं होगी।
ऐसे चयनित उम्मीदवारों को राज्य न्यायिक अकादमी में एक वर्ष का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके बाद उन्हें एक वर्ष की व्यवस्थित विधि लिपिक सेवा करनी होगी। कोर्ट ने इन दोनों वर्षों को वकालत के आवश्यक अनुभव के लिए समकक्ष माना है।
वहीं 1 अप्रैल 2027 या उसके बाद जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं के लिए उम्मीदवारों को सिविल जज (जूनियर डिवीजन) परीक्षा में शामिल होने से पहले कम से कम एक वर्ष वास्तविक वकालत का अनुभव हासिल करना होगा।
मई 2025 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने निचली ज्यूडिशियल सर्विसेज में सीधे प्रवेश के लिए तीन वर्ष की वकालत के अनुभव की शर्त बहाल की थी। कोर्ट ने तब माना था कि ज्यूडिशियल सर्विसेज में प्रवेश करने वाले व्यक्ति के लिए अदालतों के कामकाज का पूर्व व्यावहारिक अनुभव जरूरी है।
पुनर्विचार याचिकाओं पर मौजूदा फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने उस निष्कर्ष को बरकरार रखा है। हालांकि कोर्ट ने माना कि व्यावहारिक अनुभव केवल बार में वकालत के जरिए ही हासिल नहीं किया जा सकता और व्यवस्थित संस्थागत प्रशिक्षण तथा निगरानी में की गई विधि लिपिक सेवा के जरिए भी ऐसा अनुभव प्राप्त किया जा सकता है।
पीठ ने यह भी ध्यान में रखा कि तीन साल की वकालत की शर्त अचानक बहाल किए जाने से उन कानून स्नातकों को परेशानी हुई जो दो दशक से अधिक समय से लागू व्यवस्था के तहत न्यायिक सेवा परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे।
इसी व्यावहारिक कठिनाई को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने संक्रमणकालीन व्यवस्था के तहत 31 मार्च 2027 तक जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं में कानून स्नातकों को बिना पूर्व वकालत अनुभव के आवेदन करने की अनुमति दी है।
इसके बाद ज्यूडिशियल सर्विसेज में प्रवेश के लिए कम से कम एक वर्ष की वास्तविक वकालत अनिवार्य होगी।
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