एग्जीक्यूशन कोर्ट आदेश से आगे बढ़कर ऐसी राहत नहीं दे सकता, जो उसमें शामिल न हो: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

23 Aug 2026 10:04 PM IST

  • एग्जीक्यूशन कोर्ट आदेश से आगे बढ़कर ऐसी राहत नहीं दे सकता, जो उसमें शामिल न हो: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने फिर से कहा कि एग्जीक्यूशन कोर्ट (आदेश लागू करने वाली अदालत) के लिए उस आदेश या डिक्री से आगे बढ़कर ऐसी राहत देना सही नहीं है, जिसका आदेश में कोई ज़िक्र न हो या जिसका इरादा न हो।

    जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा,

    "एग्जीक्यूशन कोर्ट उस आदेश से आगे नहीं बढ़ सकता जिसे लागू किया जाना है, और न ही उसकी व्याख्या (Interpretation) में गहराई से जा सकता है, खासकर तब जब आदेश में किसी और या खास व्याख्या की ज़रूरत न हो।"

    बेंच ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द किया, जो एग्जीक्यूशन कार्यवाही में दिया गया। उस मामले में हाई कोर्ट आदेश से आगे बढ़कर उन रेस्पॉन्डेंट्स (प्रतिवादियों) को भी राहत देने का आदेश दे दिया, जिनके बारे में मूल फैसले में कोई बात नहीं कही गई।

    ये रेस्पॉन्डेंट्स स्कूल लेक्चरर थे, जिन्हें 1998 और 2000 के बीच कॉन्ट्रैक्ट पर नियुक्त किया गया।

    उन्होंने हाई कोर्ट के 10 जनवरी, 2013 के आदेश (CWP नंबर 264/2013-G) को लागू करने की मांग की। उस आदेश के तहत अगर रेस्पॉन्डेंट्स की स्थिति 'स्टेट ऑफ़ हिमाचल प्रदेश बनाम राकेश चंद' (LPA नंबर 105/2010, फैसला 13 दिसंबर, 2012) मामले में डिवीज़न बेंच के फैसले में शामिल कर्मचारियों जैसी पाई जाती, तो उन्हें भी वैसा ही लाभ मिलना था।

    राकेश चंद मामले में हाईकोर्ट ने कहा कि कॉन्ट्रैक्ट पर नियुक्त स्कूल लेक्चरर JBT टीचर के पदों से जुड़े पे-स्केल (वेतनमान) की शुरुआती रकम पाने के हकदार हैं, जिसमें समय-समय पर बदलाव होता रहता है।

    हालांकि, एग्जीक्यूशन कार्यवाही के दौरान, हाईकोर्ट ने रेस्पॉन्डेंट्स को न केवल लागू होने वाला पे-स्केल दिया, बल्कि मिलने वाले भत्ते (Allowances) भी दिए।

    असल में, हाईकोर्ट ने LPA नंबर 105/2010 में दिए गए आदेश के निर्देशों से आगे बढ़कर रेस्पॉन्डेंट्स को भत्ते का लाभ दिया। ये लाभ LPA नंबर 108/2012 में दिए गए आदेश के अनुसार केवल JBT टीचर के लिए थे, न कि स्कूल टीचर के लिए।

    हाईकोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची। एक्ज़ीक्यूशन प्रोसीडिंग (फैसले को लागू करने की कार्यवाही) में दिए गए विवादित आदेश को रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने 'राकेश चंद' मामले के मुख्य फैसले के दायरे से बाहर जाकर गलती की।

    चूंकि एक अलग कार्यवाही, यानी LPA नंबर 108/2012 में दिया गया आदेश स्कूल शिक्षकों से नहीं, बल्कि सिर्फ़ JBT शिक्षकों से संबंधित था, इसलिए हाईकोर्ट को 'राकेश चंद' मामले के मुख्य फैसले से हटकर ऐसा फ़ायदा नहीं देना चाहिए था जो रेस्पॉन्डेंट्स (प्रतिवादियों) के लिए नहीं था।

    कोर्ट ने साफ़ किया कि रेस्पॉन्डेंट्स 'राकेश चंद' मामले के फैसले से मिलने वाले फ़ायदे पाने के हकदार थे, जिसके तहत उन्हें केवल JBT शिक्षकों के पदों से जुड़े पे-स्केल (वेतनमान) की शुरुआती राशि मिलनी थी, जिसे समय-समय पर संशोधित किया गया हो।

    कोर्ट ने कहा,

    "इसलिए हम यह मानते हैं कि 10.01.2013 के आदेश को उसी सिद्धांत के अनुसार लागू किया जाना चाहिए, जो डिवीज़न बेंच ने LPA नंबर 105/2010 और उससे मिलते-जुलते मामलों में 13.12.2012 के अपने फैसले में तय किया; यानी, रेस्पॉन्डेंट्स JBT शिक्षकों के पदों से जुड़े पे-स्केल की शुरुआती राशि पाने के हकदार होंगे, जिसे समय-समय पर संशोधित किया गया हो। इस प्रकार, हाईकोर्ट के आदेश के ज़रूरी नतीजे के तौर पर रेस्पॉन्डेंट्स 31.12.2005 से पहले 6,400 रुपये और 01.01.2006 से 10,300 रुपये के पे-स्केल के हकदार होंगे, जिसे केवल लागू किया जाना था।"

    कोई पक्षकार एक्ज़ीक्यूशन प्रोसीडिंग के दौरान अपने हक का दावा करने के लिए मूल कार्यवाही में चुप नहीं रह सकता।

    कोर्ट ने 'राकेश चंद' मामले का फैसला आने तक, यानी लगभग 12 साल तक चुप रहकर उसका फ़ायदा मांगने के रेस्पॉन्डेंट्स के रवैये पर भी सवाल उठाया। कोर्ट के अनुसार, अगर रेस्पॉन्डेंट्स LPA नंबर 108/2012 से मिलने वाला फ़ायदा चाहते थे, जो खास तौर पर JBT शिक्षकों के लिए था, तो उन्हें एक्ज़ीक्यूशन प्रोसीडिंग में दावा करने के बजाय रिट कार्यवाही में ही दावा करना चाहिए था।

    कोर्ट ने कहा,

    "...प्रतिवादियों को पता था कि LPA नंबर 105/2010 और उससे जुड़े मामलों में 13.12.2012 के फैसले में आखिर क्या तय किया गया, जिसमें पेमेंट के नियम को साफ तौर पर बताया गया। इस बात का कोई जवाब नहीं है कि उस फैसले के बारे में पता होने के बावजूद, प्रतिवादियों ने - जो JBT टीचर नहीं थे - अपनी रिट याचिका में हाईकोर्ट के सामने खास तौर पर यह क्यों नहीं कहा कि उनका मामला भी LPA नंबर 108/2012 से जुड़े मामलों में तय किए गए नियम के दायरे में आता है।"

    नतीजतन, राज्य की अपील मंजूर कर ली गई और यह आदेश दिया गया:

    "प्रतिवादी उस पे-स्केल (वेतनमान) के हकदार होंगे, जो हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा LPA नंबर 105/2010 और उससे जुड़े मामलों में 13.12.2012 के आदेश में बताया गया, यानी JBT टीचर के पदों से जुड़े पे-स्केल की शुरुआती रकम, जिसे समय-समय पर संशोधित (रिवाइज़) किया गया हो।"

    Cause Title: STATE OF HIMACHAL PRADESH & ANR. ETC. VERSUS JAMEET SINGH & ANR. ETC. (with connected cases)

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