हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Shahadat

18 July 2026 10:00 PM IST

  • High Courts
    High Courts

    देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (13 जुलाई, 2026 से 17 जुलाई, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

    स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का लाभ लेकर वेतन की मांग नहीं कर सकता कर्मचारी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि कोई सरकारी कर्मचारी एक ही घटना से लाभ भी नहीं ले सकता और उसी आधार पर उसे चुनौती भी नहीं दे सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिसने अनधिकृत अनुपस्थिति को बिना वेतन अवकाश (Leave Without Pay) के रूप में नियमित कराकर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (Voluntary Retirement) का लाभ प्राप्त कर लिया हो, वह बाद में उसी अवधि के वेतन से इनकार किए जाने को चुनौती नहीं दे सकता।

    जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता का आचरण "Approbate and Reprobate" के सिद्धांत के विरुद्ध है। यानी कोई व्यक्ति एक ही लेन-देन से लाभ लेने के बाद अपने हित में उसी को चुनौती नहीं दे सकता।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    सेशन जज के ट्रांसफर ऑर्डर को CrPC की धारा 482 के तहत चुनौती दी जा सकती है, धारा 407 के तहत नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई सेशन जज CrPC की धारा 408 के तहत किसी क्रिमिनल केस को ट्रांसफर करने की अर्ज़ी मंज़ूर करता है, तो उस आदेश से प्रभावित व्यक्ति CrPC की धारा 407 के तहत नई ट्रांसफर अर्ज़ी दाखिल करके उसे चुनौती नहीं दे सकता। कोर्ट ने कहा कि ट्रांसफर की मंज़ूरी देने वाले आदेश को केवल CrPC की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट में ही चुनौती दी जा सकती है।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    केस ट्रांसफर से पहले हाईकोर्ट से मंज़ूरी मिलने के बावजूद सिविल कोर्ट टेरिटोरियल ज्यूरिस्डिक्शन की नए सिरे से जांच कर सकता है: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि केस ट्रांसफर करने से पहले हाईकोर्ट द्वारा 'लेटर्स पेटेंट' के क्लॉज़ XII के तहत मंज़ूरी देने का मतलब यह नहीं है कि बॉम्बे सिटी सिविल कोर्ट, केस ट्रांसफर होने के बाद टेरिटोरियल ज्यूरिस्डिक्शन के मुद्दे की नए सिरे से जांच नहीं कर सकता।

    कोर्ट ने कहा कि बॉम्बे सिटी सिविल कोर्ट एक्ट, 1948 की धारा 4A(2) के तहत सिटी सिविल कोर्ट को ट्रांसफर किए गए केस को ऐसे देखना होता है जैसे वह मूल रूप से उसी के सामने दायर किया गया हो। अगर उसे लगता है कि उसके पास टेरिटोरियल ज्यूरिस्डिक्शन नहीं है तो वह 'कोड ऑफ़ सिविल प्रोसीजर' के ऑर्डर VII नियम 10 के तहत शिकायत (Plaint) वापस कर सकता है।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: पुराने भूमि अधिग्रहण कानून के निरस्त होने के बाद जारी हुई अधिसूचना पर कार्रवाई अवैध

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत जारी अधिसूचना पर भले ही 1 जनवरी 2014 से पहले की तारीख अंकित हो, लेकिन उसका प्रकाशन 1 जनवरी 2014 के बाद हुआ है, तो ऐसी पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू से ही अवैध मानी जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुराने कानून के निरस्त होने के बाद उसके तहत नई अधिग्रहण कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती।

    जस्टिस राजन राय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि अधिसूचना पर लिखी तारीख का कोई कानूनी महत्व नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि उसका राजपत्र, समाचार पत्रों और स्थानीय स्तर पर कब प्रकाशन हुआ। इन सभी में सबसे अंतिम प्रकाशन की तारीख ही अधिसूचना के प्रकाशन की प्रभावी तारीख मानी जाएगी।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    चुनाव याचिका में जाति प्रमाणपत्र की वैधता की जांच नहीं कर सकता चुनाव न्यायाधिकरण: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि चुनाव याचिका की सुनवाई के दौरान चुनाव न्यायाधिकरण किसी जाति प्रमाणपत्र की वैधता की जांच नहीं कर सकता और न ही उसे फर्जी घोषित करने का अधिकार रखता है।

    जस्टिस नीरज तिवारी ने स्पष्ट किया कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी जाति प्रमाणपत्र की वैधता तय करने या उसे निरस्त करने का अधिकार केवल राज्य सरकार द्वारा गठित जिला, मंडलीय और राज्य स्तरीय जांच समितियों को है। चुनाव न्यायाधिकरण इस विषय पर निर्णय देने का अधिकार नहीं रखता।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    सरकारी स्कूल टीचर के तौर पर भर्ती के लिए ज़रूरी बैचलर डिग्री न होने पर मास्टर डिग्री वाले उम्मीदवार योग्य नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि मास्टर डिग्री होने से कोई उम्मीदवार अपने आप उस पद के लिए योग्य नहीं हो जाता, जिसके लिए उसी विषय में बैचलर डिग्री की ज़रूरत हो। [2026 LiveLaw (Del) 660]

    जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस विनोद कुमार की डिवीज़न बेंच ने CAT का आदेश रद्द किया, जिसमें दिल्ली सरकारी स्कूलों में कुछ उम्मीदवारों को डोमेस्टिक साइंस टीचर (TGT) के तौर पर नियुक्त करने का निर्देश दिया गया था।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    पिता द्वारा ज़बरदस्ती ले जाए गए बच्चे को वापस पाने के लिए मजिस्ट्रेट BNSS के तहत तलाशी का प्रावधान लागू कर सकते हैं: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत तलाशी के प्रावधानों का इस्तेमाल करके उस बच्चे को वापस ला सकते हैं जिसे कथित तौर पर उसके पिता ने माँ की कस्टडी से ज़बरदस्ती ले लिया था।

    मालेगाँव में मजिस्ट्रेट के उन आदेशों को सही ठहराते हुए, जिनमें पुलिस को पिता के घर की तलाशी लेने और फिर तीन साल के बच्चे की कस्टडी माँ को सौंपने का निर्देश दिया गया, कोर्ट ने पाया कि सेशंस कोर्ट ने उन निर्देशों में दखल देकर गलती की थी।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    अर्द्ध-न्यायिक कार्य करने वाले तहसीलदार को जजों जैसा कानूनी संरक्षण मिलेगा, पेंशन रोकने का आदेश रद्द: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मुरैना के रिटायर संयुक्त कलेक्टर की याचिका स्वीकार करते हुए उनकी पेंशन पर लगाई गई रोक को रद्द किया। कोर्ट ने कहा कि अर्द्ध-न्यायिक कार्य करने वाले तहसीलदार को जजों की तरह कानूनी संरक्षण प्राप्त है, इसलिए अपने न्यायिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए कार्यों के लिए उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा सकती, जब तक दुर्भावना या गंभीर कदाचार सिद्ध न हो।

    जस्टिस आनंद सिंह बहरावत की पीठ ने कहा कि मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता के तहत अधिकारों का प्रयोग करने वाला तहसीलदार जज संरक्षण अधिनियम, 1985 के तहत मिलने वाले संरक्षण का हकदार है।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    विदेशी वकील भारत में गवाहों से क्रॉस एग्जामिनेशन नहीं कर सकते, केवल कार्यवाही देख सकते हैं: केरल हाईकोर्ट

    केरल हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत में अदालत द्वारा नियुक्त वकील आयुक्त के समक्ष विदेशी वकील गवाहों की मुख्य परीक्षा या क्रॉस एग्जामिनेशन नहीं कर सकते। अदालत ने कहा कि साक्ष्य दर्ज करना न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है और यह भारत में विधि व्यवसाय के दायरे में आता है, जिसकी अनुमति केवल भारतीय कानून के अनुसार अधिकृत वकीलों को है।

    जस्टिस मोहम्मद नियास सी. पी. ने कहा, "अधिवक्ता आयुक्त के समक्ष साक्ष्य दर्ज करना न्यायिक कार्यवाही का हिस्सा है और यह भारत में विधि व्यवसाय की श्रेणी में आता है। विदेशी वकीलों को ऐसे कार्य की अनुमति नहीं दी जा सकती।"

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    सगा बेटा भरण-पोषण दे रहा है तो सौतेले बेटे से दोबारा गुजारा भत्ता नहीं मांग सकती मां: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी मां को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत उसके सगे बेटे से भरण-पोषण मिल रहा है, तो वह उसी उद्देश्य के लिए बाद में अपने सौतेले बेटे से अलग से भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकती। जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला ने एक महिला की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    सीनियर सिटिज़न एक्ट के तहत संयुक्त परिवार की संपत्ति का बंटवारा 'ट्रांसफर' नहीं, माता-पिता की देखभाल न करने पर इसे रद्द नहीं किया जा सकता: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

    आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007' के तहत संयुक्त परिवार की संपत्ति का बंटवारा "संपत्ति का ट्रांसफर" नहीं माना जाता है। इसलिए वरिष्ठ नागरिक माता-पिता की देखभाल न करने के आधार पर, इस अधिनियम की धारा 23 का इस्तेमाल करके ऐसे रजिस्टर्ड बंटवारे के दस्तावेज़ (partition deed) रद्द नहीं की जा सकती। [2026 LiveLaw (AP) 123]

    ऐसा करते हुए कोर्ट ने कहा कि जहां 'ट्रांसफर' का मतलब संपत्ति में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को अधिकार या हित सौंपना है, वहीं बंटवारा केवल पहले से मौजूद अधिकारों को अलग करता है; इसलिए दोनों की तुलना नहीं की जा सकती।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    विज्ञापन जारी होने के साथ ही भर्ती प्रक्रिया शुरू हो जाती है, बाद में लागू कानून उस पर लागू नहीं होगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भर्ती प्रक्रिया की शुरुआत नियुक्ति की मंजूरी से नहीं, बल्कि विज्ञापन जारी होने की तारीख से मानी जाएगी। अदालत ने कहा कि यदि भर्ती का विज्ञापन किसी नए कानून के लागू होने से पहले जारी हो चुका है, तो बाद में लागू हुआ कानून उस भर्ती प्रक्रिया को प्रभावित नहीं करेगा।

    जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने सुप्रीम कोर्ट के तेज प्रकाश पाठक बनाम राजस्थान हाईकोर्ट फैसले का हवाला देते हुए कहा कि भर्ती प्रक्रिया विज्ञापन जारी होने से शुरू होकर अधिसूचित रिक्तियों को भरने तक चलती है। एक बार प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद बीच में नियम या कानून नहीं बदले जा सकते।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    सलवार उतारने की कोशिश और छेड़छाड़ मात्र से दुष्कर्म के प्रयास का अपराध नहीं बनता: पटना हाईकोर्ट

    पटना हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी महिला की सलवार उतारने की कोशिश करना और उसका सीना दबाकर छेड़छाड़ करना, जब तक दुष्कर्म के प्रयास को स्पष्ट रूप से साबित करने वाला कोई ठोस कृत्य या प्रवेश (penetration) का साक्ष्य न हो, तब तक उसे दुष्कर्म के प्रयास (Attempt to Rape) का अपराध नहीं माना जा सकता।

    जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने एक सत्र न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए आरोपी की धारा 376 सहपठित धारा 511 आईपीसी के तहत हुई दोषसिद्धि और तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा को रद्द कर दिया। हालांकि, अदालत ने कहा कि आरोपी के कृत्य से धारा 354 आईपीसी (महिला की लज्जा भंग करना) के आवश्यक तत्व अवश्य स्थापित होते हैं।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    फरार घोषित आरोपी को सामान्यतः अग्रिम जमानत नहीं मिल सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोहराया है कि जो आरोपी अदालत की कार्यवाही और जांच से जानबूझकर बचता है तथा घोषित फरार (Proclaimed Offender) घोषित हो चुका हो, उसे सामान्यतः अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) जैसी असाधारण राहत नहीं दी जा सकती।

    जस्टिस विवेक कुमार सिंह की पीठ ने आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपी एक व्यक्ति की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि बिना किसी वैध या संतोषजनक कारण के अदालत की प्रक्रिया से बचने वाले और फरार घोषित किए गए आरोपी को अग्रिम जमानत देने का सामान्य नियम नहीं है।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    कोर्ट स्कूल रिकॉर्ड में जन्म तिथि बदलने के लिए एजुकेशन बोर्ड को निर्देश नहीं दे सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि कोर्ट एजुकेशन बोर्ड को स्कूल सर्टिफिकेट में दर्ज जन्म तिथि बदलने का निर्देश नहीं दे सकता; कोर्ट ने माना कि ऐसी रिक्वेस्ट पर सबसे पहले संबंधित बोर्ड को ही विचार करना चाहिए। [2026 LiveLaw (Raj) 278]

    राजस्थान बोर्ड ऑफ़ सेकेंडरी एजुकेशन को एक छात्रा की 10वीं क्लास की मार्कशीट में उसकी जन्म तिथि बदलने का निर्देश देने वाले सिंगल जज का आदेश रद्द करते हुए एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस मनीष शर्मा की डिवीज़न बेंच ने साफ़ किया कि अगर कोई व्यक्ति बोर्ड के फ़ैसले से संतुष्ट नहीं है, तो वह सिविल कोर्ट जा सकता है।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    हिंसक विरोध करना, सरकार के खिलाफ नारेबाजी या असहमति व्यक्त करना राजद्रोह नहीं: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

    पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि केवल हिंसक विरोध प्रदर्शन में भाग लेना, सरकार के खिलाफ नारे लगाना या असहमति व्यक्त करना स्वचालित रूप से देशद्रोह का अपराध नहीं है।

    जस्टिस विनोद एस भारद्वाज और जस्टिस सुखविंदर कौर ने कहा, "हिंसक विरोध को दंगा माना जा सकता है, लेकिन हिंसा की ऐसी कार्रवाई को सरकार के खिलाफ नफरत या अवमानना ​​का कार्य नहीं माना जाएगा। एक निर्वाचित लोकतंत्र में सरकार या शासन के खिलाफ नारेबाजी, उसके नागरिकों के खिलाफ राजद्रोह के आरोप लगाने के लिए पर्याप्त नहीं होगी।"

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    इलेक्ट्रोहोम्योपैथी का सर्टिफिकेट लेकर एलोपैथी नहीं कर सकते, बिना मान्यता इलाज करना झोलाछाप डॉक्टरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इलेक्ट्रोहोम्योपैथी का सर्टिफिकेट रखने वाला व्यक्ति एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति से मरीजों का इलाज नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि मान्यता प्राप्त मेडिकल योग्यता के बिना एलोपैथी करना झोलाछाप डॉक्टरी है और ऐसे लोगों को मरीजों का इलाज करने की अनुमति देना जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।

    जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने एटा के चीफ मेडिकल ऑफिसर द्वारा एक प्राइवेट अस्पताल को सील किए जाने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    सेशन जज सुनवाई के बीच लंबित मुकदमा उसी न्यायिक अधिकारी की नई अदालत में स्थानांतरित कर सकते हैं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी आपराधिक मुकदमे की आंशिक सुनवाई कर रहे न्यायिक अधिकारी का तबादला उसी सत्र प्रभाग के भीतर किसी अन्य सक्षम अदालत में हो जाता है, तो सेशन जज दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC)। की धारा 408 के तहत अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए उस लंबित मुकदमे को अधिकारी की नई अदालत में स्थानांतरित कर सकते हैं।

    जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने इस संबंध में दायर याचिका खारिज करते हुए कहा कि यदि स्थानांतरण का उद्देश्य उस न्यायिक अधिकारी को गवाहों के हावभाव और आचरण का लाभ बनाए रखना है, जिसने पहले ही महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही दर्ज की है तो ऐसा आदेश "न्याय के उद्देश्य को विफल नहीं करता और न ही इसे न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग कहा जा सकता है।"

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    पहले पति को तलाक दिए बिन शादी करने वाले दूसरे 'पुरुष' से महिला भरण-पोषण कर सकती है? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया जवाब

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ़ किया कि अगर कोई महिला अपने पहले पति को तलाक दिए बिना किसी पुरुष के साथ रहने लगती है, तो उसे "कानूनी रूप से विवाहित पत्नी" नहीं माना जाएगा, इसलिए वह CrPC की धारा 125 के तहत अपने साथी से गुज़ारा-भत्ता पाने की हकदार नहीं है।

    जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें महिला को उसके साथी (जिससे उसने कथित तौर पर पहले पति से तलाक लिए बिना शादी की थी) से गुज़ारा-भत्ता देने का निर्देश दिया गया था।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story