सलवार उतारने की कोशिश और छेड़छाड़ मात्र से दुष्कर्म के प्रयास का अपराध नहीं बनता: पटना हाईकोर्ट

Praveen Mishra

14 July 2026 5:55 PM IST

  • सलवार उतारने की कोशिश और छेड़छाड़ मात्र से दुष्कर्म के प्रयास का अपराध नहीं बनता: पटना हाईकोर्ट

    पटना हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी महिला की सलवार उतारने की कोशिश करना और उसका सीना दबाकर छेड़छाड़ करना, जब तक दुष्कर्म के प्रयास को स्पष्ट रूप से साबित करने वाला कोई ठोस कृत्य या प्रवेश (penetration) का साक्ष्य न हो, तब तक उसे दुष्कर्म के प्रयास (Attempt to Rape) का अपराध नहीं माना जा सकता।

    जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने एक सत्र न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए आरोपी की धारा 376 सहपठित धारा 511 आईपीसी के तहत हुई दोषसिद्धि और तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा को रद्द कर दिया। हालांकि, अदालत ने कहा कि आरोपी के कृत्य से धारा 354 आईपीसी (महिला की लज्जा भंग करना) के आवश्यक तत्व अवश्य स्थापित होते हैं।

    अभियोजन के अनुसार, पीड़िता अपने पिता के साथ फोटो खिंचवाने के लिए आरोपी के स्टूडियो गई थी। आरोप था कि आरोपी ने पीड़िता के पिता को बाहर बैठाकर फोटो देखने के लिए कहा, स्टूडियो का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और पीड़िता की सलवार उतारने की कोशिश करते हुए उसका सीना दबाया, ताकि उसके साथ दुष्कर्म कर सके। पीड़िता के शोर मचाने पर उसके पिता ने दरवाजा तोड़ा, जिसके बाद आरोपी मौके से फरार हो गया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि यदि अभियोजन का पूरा मामला भी सही मान लिया जाए, तब भी रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने दुष्कर्म करने का ऐसा प्रत्यक्ष प्रयास किया जो धारा 376 सहपठित धारा 511 आईपीसी के दायरे में आए। अदालत ने कहा कि प्रवेश (penetration) का कोई प्रमाण, यहां तक कि मामूली स्तर पर भी, या दुष्कर्म के प्रयास को स्पष्ट रूप से दर्शाने वाला कोई कृत्य रिकॉर्ड पर नहीं है।

    अदालत ने माना कि आरोपी ने पीड़िता के साथ बल प्रयोग कर उसकी लज्जा भंग करने का अपराध किया, लेकिन उपलब्ध साक्ष्य दुष्कर्म के प्रयास के अपराध को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

    इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने आरोपी को धारा 376/511 आईपीसी सहित लगाए गए आरोपों से बरी कर दिया।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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