सेशन जज सुनवाई के बीच लंबित मुकदमा उसी न्यायिक अधिकारी की नई अदालत में स्थानांतरित कर सकते हैं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Amir Ahmad

13 July 2026 7:27 PM IST

  • सेशन जज सुनवाई के बीच लंबित मुकदमा उसी न्यायिक अधिकारी की नई अदालत में स्थानांतरित कर सकते हैं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी आपराधिक मुकदमे की आंशिक सुनवाई कर रहे न्यायिक अधिकारी का तबादला उसी सत्र प्रभाग के भीतर किसी अन्य सक्षम अदालत में हो जाता है, तो सेशन जज दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC)। की धारा 408 के तहत अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए उस लंबित मुकदमे को अधिकारी की नई अदालत में स्थानांतरित कर सकते हैं।

    जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने इस संबंध में दायर याचिका खारिज करते हुए कहा कि यदि स्थानांतरण का उद्देश्य उस न्यायिक अधिकारी को गवाहों के हावभाव और आचरण का लाभ बनाए रखना है, जिसने पहले ही महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही दर्ज की है तो ऐसा आदेश "न्याय के उद्देश्य को विफल नहीं करता और न ही इसे न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग कहा जा सकता है।"

    पूरा मामला

    लखनऊ स्थित अपर सत्र न्यायाधीश एवं विशेष न्यायाधीश (ATS) की अदालत में आपराधिक मुकदमे की सुनवाई चल रही थी। उस समय अदालत की अध्यक्षता न्यायिक अधिकारी अभिनव कुमार मिश्रा कर रहे थे। उन्होंने मुकदमे में अभियोजन पक्ष के नौ गवाहों की गवाही दर्ज की थी।

    बाद में उनका तबादला उसी लखनऊ सत्र प्रभाग के भीतर अपर सत्र न्यायाधीश, न्यायालय संख्या-4 एवं विशेष न्यायाधीश (गैंगस्टर अधिनियम) की अदालत में कर दिया गया।

    उनके स्थान पर न्यायिक अधिकारी शाश्वत पांडे ने एटीएस अदालत का कार्यभार संभाला और दसवें अभियोजन गवाह की गवाही दर्ज की।

    इसी दौरान शिकायतकर्ता ने CrPC की धारा 408 के तहत सेशन जज के समक्ष आवेदन देकर अनुरोध किया कि मुकदमे को उस न्यायिक अधिकारी की नई अदालत में स्थानांतरित कर दिया जाए, जिसने पहले ही अधिकांश गवाहों की गवाही दर्ज की।

    शिकायतकर्ता का तर्क था कि इससे निष्पक्ष सुनवाई, न्यायिक निरंतरता, साक्ष्यों का बेहतर मूल्यांकन और न्यायिक समय की बचत होगी। सेशन जज ने यह आवेदन स्वीकार कर मुकदमा स्थानांतरित किया।

    आरोपी ने हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि CrPC की धारा 326 के अनुसार, किसी न्यायिक अधिकारी के स्थानांतरण के बाद उसका उत्तराधिकारी मुकदमे की सुनवाई और निर्णय देने का अधिकार रखता है। चूंकि नए न्यायिक अधिकारी ने गवाही दर्ज करना भी शुरू कर दिया था और पक्षपात का कोई आरोप नहीं था, इसलिए मुकदमे के स्थानांतरण का कोई औचित्य नहीं था।

    हाईकोर्ट ने सबसे पहले कहा कि आरोपी ने गलत प्रावधान के तहत याचिका दायर की। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि सेशन जज धारा 408 के तहत स्थानांतरण आवेदन खारिज करते हैं, तभी उसके खिलाफ धारा 407 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर की जा सकती है। लेकिन यदि स्थानांतरण आवेदन स्वीकार कर लिया गया हो, तो उसके खिलाफ चुनौती केवल हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों के तहत दी जा सकती है।

    हालांकि, तकनीकी आधार पर याचिका खारिज करने के बजाय अदालत ने मामले के गुण-दोष पर भी विचार किया।

    पीठ ने कहा कि मूल अदालत और वह अदालत, जहां मुकदमा स्थानांतरित किया गया, दोनों को इस मामले की सुनवाई का अधिकार प्राप्त है। अधिकार किसी न्यायिक अधिकारी में नहीं, बल्कि अदालत में निहित होता है।

    अदालत ने कहा कि धारा 408 सेशन जज को यह विवेकाधिकार देती है कि यदि न्यायहित में आवश्यक हो तो वह मुकदमे को एक सक्षम अदालत से दूसरी सक्षम अदालत में स्थानांतरित कर सकते हैं।

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि आपराधिक मामलों में गवाहों के हावभाव, व्यवहार और उनके बयान देने के तरीके का मूल्यांकन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

    अदालत ने कहा,

    "यह स्थापित विधि है कि गवाहों के हावभाव और आचरण को उचित महत्व दिया जाना चाहिए।"

    पीठ ने कहा कि संबंधित न्यायिक अधिकारी नौ अभियोजन गवाहों, जिनमें सभी प्रत्यक्ष तथ्यात्मक गवाह शामिल थे, की गवाही स्वयं सुन चुके थे। ऐसे में यदि सेशन जज ने न्यायहित में मुकदमे को उनकी नई अदालत में स्थानांतरित किया तो इसमें कोई कानूनी त्रुटि या अवैधता नहीं है।

    इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने आरोपी की याचिका खारिज की।

    Next Story