सेशन जज के ट्रांसफर ऑर्डर को CrPC की धारा 482 के तहत चुनौती दी जा सकती है, धारा 407 के तहत नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Shahadat

18 July 2026 10:15 AM IST

  • सेशन जज के ट्रांसफर ऑर्डर को CrPC की धारा 482 के तहत चुनौती दी जा सकती है, धारा 407 के तहत नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई सेशन जज CrPC की धारा 408 के तहत किसी क्रिमिनल केस को ट्रांसफर करने की अर्ज़ी मंज़ूर करता है, तो उस आदेश से प्रभावित व्यक्ति CrPC की धारा 407 के तहत नई ट्रांसफर अर्ज़ी दाखिल करके उसे चुनौती नहीं दे सकता।

    कोर्ट ने कहा कि ट्रांसफर की मंज़ूरी देने वाले आदेश को केवल CrPC की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट में ही चुनौती दी जा सकती है।

    बता दें, CrPC की धारा 408 सेशन जज को अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर क्रिमिनल ट्रायल/अपील को ट्रांसफर करने का अधिकार देती है।

    धारा 407 हाईकोर्ट को अपने राज्य के अधीनस्थ अदालतों में लंबित क्रिमिनल ट्रायल/अपील को ट्रांसफर करने का अधिकार देती है।

    धारा 407(2) का प्रावधान हाईकोर्ट में अर्ज़ी देने की अनुमति तभी देता है जब सेशन जज के पास की गई ट्रांसफर अर्ज़ी खारिज कर दी गई हो।

    CrPC की धारा 482 हाई कोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों (inherent powers) का प्रावधान करती है।

    जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने कहा,

    “जब कोई आवेदक CrPC की धारा 408 के तहत केस ट्रांसफर करने के लिए सेशन जज के सामने अर्ज़ी दाखिल करता है और वह अर्ज़ी खारिज हो जाती है तो आवेदक CrPC की धारा 407 के तहत ट्रांसफर अर्ज़ी दाखिल करके हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटा सकता है, जैसा कि धारा 407 की उप-धारा (2) से जुड़े प्रावधान में विशेष रूप से बताया गया। हालाँकि, जब CrPC की धारा 408 के तहत दाखिल ट्रांसफर अर्ज़ी को सेशन जज मंज़ूर कर लेते हैं तो ट्रांसफर आदेश से प्रभावित व्यक्ति CrPC की धारा 407 के तहत दूसरी अर्ज़ी दाखिल करके उसे चुनौती नहीं दे सकता। ट्रांसफर आदेश की वैधता को केवल हाई कोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल करके ही चुनौती दी जा सकती है, जैसा कि CrPC की धारा 482 में बताया गया...”

    ट्रांसफर-आवेदक (जो केस में शिकायतकर्ता भी था) लखनऊ के सेशन जज के उस आदेश से नाराज़ था, जिसमें प्रतिवादी नंबर 2 द्वारा दाखिल ट्रांसफर अर्ज़ी को मंज़ूर किया गया। ट्रायल एडिशनल सेशन जज/विशेष जज, ATS, लखनऊ के सामने शुरू हुआ, जिसकी अध्यक्षता उस समय श्री अभिनय कुमार मिश्रा कर रहे थे; उन्होंने अभियोजन पक्ष के पहले नौ गवाहों के बयान दर्ज किए। उसी सेशन डिवीज़न के भीतर दूसरी अदालत में उनका ट्रांसफर होने के बाद उनके उत्तराधिकारी ने कार्यभार संभाला और दसवें गवाह का बयान दर्ज किया। प्रतिवादी नंबर 2 ने मुकदमे को मिस्टर अभिनय कुमार मिश्रा की अध्यक्षता वाली अदालत में ट्रांसफर करने की मांग की।

    उनका तर्क था कि जिस अधिकारी ने मामले का मुख्य हिस्सा सुना है, उसी के सामने सुनवाई जारी रखने से निष्पक्ष सुनवाई, न्यायिक निरंतरता, सबूतों का सही मूल्यांकन और न्यायिक समय व संसाधनों की बचत होगी। सेशन जज ने इस अर्ज़ी को मंज़ूरी दे दी, और शिकायतकर्ता ने CrPC की धारा 407 के तहत हाई कोर्ट में उस आदेश को चुनौती दी।

    आवेदक ने सुप्रीम कोर्ट के 'रणबीर यादव बनाम बिहार राज्य' और 'भास्कर उर्फ ​​प्रभास्कर बनाम राज्य' के फैसलों और इलाहाबाद हाईकोर्ट के 'अनिल कुमार अग्रवाल बनाम यू.पी. राज्य' के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि CrPC की धारा 326, जो उत्तराधिकारी जज को पहले से दर्ज सबूतों के आधार पर अधूरी सुनवाई जारी रखने की अनुमति देती है, यह ज़रूरी नहीं बनाती कि सुनवाई को उस जज के पास भेजा जाए जिसने सबूत दर्ज किए।

    कोर्ट ने माना कि इन फैसलों का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि ट्रांसफर की मांग या मंज़ूरी इस आधार पर नहीं दी गई कि जिस अदालत में मामला भेजा जा रहा है, उसके पास अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिस्डिक्शन) नहीं है।

    हालांकि आवेदक को धारा 407 के बजाय धारा 482 के तहत अर्ज़ी देनी चाहिए, लेकिन दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने तकनीकी आधार पर याचिका खारिज करने से इनकार किया और अपनी अंतर्निहित शक्तियों (इनहेरेंट पावर) का इस्तेमाल करते हुए ट्रांसफर आदेश की समीक्षा की।

    कोर्ट ने माना कि जिस अदालत में सुनवाई चल रही थी और जिस अदालत में इसे भेजा गया, दोनों के पास ही मामले का फैसला करने का अधिकार क्षेत्र था, इसलिए सेशन जज के पास यह तय करने का अधिकार था कि सुनवाई किस अदालत को सौंपी जाए।

    "सेशन जज द्वारा CrPC की धारा 407 (1) के तहत मिले अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए पक्षों को सुनवाई का मौका देने और उनकी दलीलों पर विचार करने के बाद पारित आदेश को कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं कहा जा सकता।"

    यह मानते हुए कि सेशन जज ने मामले को उस अधिकारी के पास भेजने में कोई गलती नहीं की, जिसने सभी गवाहों के बयान दर्ज होते देखे थे, कोर्ट ने कहा,

    "उस अदालत के पीठासीन अधिकारी को अभियोजन पक्ष के नौ गवाहों - जिनमें मामले के सभी मुख्य गवाह शामिल थे - के व्यवहार और हाव-भाव को देखने का लाभ मिला था।"

    इसके अनुसार, ट्रांसफर की अर्ज़ी खारिज की गई।

    Case Title: Satyendra Nath Shukla v. State of U.P. Thru. Addl. Chief Secy. Home U.P. Lko. and another

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