सीनियर सिटिज़न एक्ट के तहत संयुक्त परिवार की संपत्ति का बंटवारा 'ट्रांसफर' नहीं, माता-पिता की देखभाल न करने पर इसे रद्द नहीं किया जा सकता: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट
Shahadat
15 July 2026 8:44 AM IST

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007' के तहत संयुक्त परिवार की संपत्ति का बंटवारा "संपत्ति का ट्रांसफर" नहीं माना जाता है। इसलिए वरिष्ठ नागरिक माता-पिता की देखभाल न करने के आधार पर, इस अधिनियम की धारा 23 का इस्तेमाल करके ऐसे रजिस्टर्ड बंटवारे के दस्तावेज़ (partition deed) रद्द नहीं की जा सकती। [2026 LiveLaw (AP) 123]
ऐसा करते हुए कोर्ट ने कहा कि जहां 'ट्रांसफर' का मतलब संपत्ति में एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को अधिकार या हित सौंपना है, वहीं बंटवारा केवल पहले से मौजूद अधिकारों को अलग करता है; इसलिए दोनों की तुलना नहीं की जा सकती।
अधिनियम की धारा 23 के अनुसार, यदि कोई वरिष्ठ नागरिक इस अधिनियम के लागू होने के बाद अपनी संपत्ति किसी को उपहार या किसी अन्य तरीके से इस शर्त पर ट्रांसफर करता है कि जिसे संपत्ति दी जा रही है (ट्रांसफरी) वह उसे बुनियादी सुविधाएँ और शारीरिक ज़रूरतें पूरी करने में मदद करेगा, और यदि वह व्यक्ति ऐसा करने से इनकार करता है या विफल रहता है तो संपत्ति का वह ट्रांसफर धोखाधड़ी, ज़बरदस्ती या अनुचित प्रभाव (undue influence) से किया गया माना जाएगा। ऐसे में संपत्ति देने वाले (ट्रांसफरर) की मर्ज़ी पर ट्रिब्यूनल उस ट्रांसफर को अमान्य (void) घोषित कर सकता है।
जस्टिस वेंकटेश्वरलू निम्मगड्डा ने एक बेटे और उसकी पत्नी द्वारा दायर रिट याचिका को मंज़ूरी दी। उन्होंने इस याचिका में अधिनियम के तहत अपीलीय ट्रिब्यूनल के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें बेटे और उसकी माँ के बीच हुए रजिस्टर्ड बंटवारे का दस्तावेज़ रद्द करने का निर्देश दिया गया।
धारा 23(1) के दायरे की जांच करते हुए कोर्ट ने कहा कि अधिनियम की धारा 23(1) के तहत शक्ति का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है, जब किसी वरिष्ठ नागरिक द्वारा संपत्ति का ट्रांसफर इस शर्त पर किया गया हो कि जिसे संपत्ति दी जा रही है वह भरण-पोषण या बुनियादी सुविधाएँ प्रदान करेगा, और वह व्यक्ति उस ज़िम्मेदारी को पूरा करने में विफल रहता है।
कोर्ट ने कहा:
"इस मामले के तथ्यों पर ऊपर बताए गए सिद्धांतों को लागू करने पर यह साफ़ है कि जिस दस्तावेज़ को रद्द करने की मांग की गई, वह याचिकाकर्ता नंबर 1 और प्रतिवादी नंबर 8 के बीच किया गया एक रजिस्टर्ड बंटवारानामा (partition deed) है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि दोनों पक्षों के पास संपत्तियों में पहले से ही अधिकार थे और बंटवारानामे ने उन अधिकारों को तय और अलग किया। रिकॉर्ड पर मौजूद जानकारी से यह पता नहीं चलता है कि प्रतिवादी नंबर 8 ने उक्त दस्तावेज़ के तहत अपनी संपत्ति याचिकाकर्ता नंबर 1 को ट्रांसफर की थी। इस प्रकार, धारा 23(1) के तहत शक्ति का इस्तेमाल करने का मुख्य आधार, यानी किसी सीनियर सिटिज़न द्वारा किसी ट्रांसफ़री (जिसे संपत्ति ट्रांसफर की गई हो) के पक्ष में ट्रांसफर करना, यहां मौजूद नहीं है; इसलिए विवादित आदेश बरकरार नहीं रखा जा सकता।
धारा 23(1) में ऐसे ट्रांसफर की बात की गई, जो इस शर्त के अधीन हो कि ट्रांसफ़री, ट्रांसफर करने वाले व्यक्ति को बुनियादी सुविधाएं और शारीरिक ज़रूरतें पूरी करने में मदद करेगा। इस मामले में कोर्ट के सामने ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि 30.03.2018 के बंटवारानामे में ऐसी कोई शर्त है, जिसके तहत याचिकाकर्ता नंबर 1 को प्रतिवादी नंबर 8 की देखभाल करनी हो या उन्हें बुनियादी सुविधाएं और शारीरिक ज़रूरतें पूरी करनी हों। बंटवारानामे में ऐसी किसी शर्त के न होने के कारण धारा 23(1) में बताई गई कानूनी ज़रूरत पूरी नहीं होती है। इसके अलावा, प्रतिवादी नंबर 8 का यह कहना भी नहीं है कि याचिकाकर्ता ने बंटवारानामे में लिखी शर्तों का उल्लंघन किया। अगर ऐसा कोई उल्लंघन हुआ भी हो तो उस उल्लंघन पर एक्ट की धारा 23 और उसके तहत बने नियमों के तहत विचार नहीं किया जा सकता है।"
कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि पक्षों के बीच भरण-पोषण (Maintenance) को लेकर विवाद पैदा हुए, बंटवारानामे को रद्द करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे विवादों के कारण प्रतिवादी नंबर 8 (माँ) भरण-पोषण या एक्ट के तहत उपलब्ध कोई अन्य राहत पाने की हकदार हो सकती हैं, लेकिन इससे ट्रिब्यूनल को ऐसे लेन-देन को अमान्य करने का अधिकार नहीं मिलता जो एक्ट की धारा 23(1) के तहत बताए गए ट्रांसफर की परिभाषा में नहीं आता है।
यह विवाद तब शुरू हुआ, जब याचिकाकर्ताओं ने अपनी संयुक्त पारिवारिक संपत्ति के लिए एक रजिस्टर्ड बंटवारा डीड (Partition Deed) तैयार की। बाद में माँ ने 2007 के कानून के तहत ट्रिब्यूनल में इस डीड को रद्द करने की मांग की।
हालांकि ट्रिब्यूनल ने उनकी अर्जी खारिज की, लेकिन अपीलीय ट्रिब्यूनल ने उनकी अपील स्वीकार की और बंटवारा डीड रद्द करने का आदेश दिया।
याचिकाकर्ताओं ने इस रद्दीकरण को चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि ये संपत्तियां संयुक्त परिवार की थीं, जिनमें दोनों पक्षों के पहले से ही अधिकार थे और बंटवारा डीड ने बिना किसी ट्रांसफर के केवल उन अधिकारों को बांटा था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि डीड में ऐसी कोई शर्त नहीं थी जिसके तहत बेटे को अपनी माँ की देखभाल करनी हो या बुनियादी सुविधाएं देनी हों, इसलिए धारा 23(1) यहां लागू नहीं होती।
अदालत ने यह भी कहा कि "गिफ्ट या अन्यथा" (gift or otherwise) वाक्यांश का अर्थ बंटवारे को शामिल करने के रूप में नहीं लगाया जा सकता है।
यह पाते हुए कि धारा 23(1) को लागू करने के लिए ज़रूरी कानूनी शर्तें मौजूद नहीं थीं, अदालत ने फैसला सुनाया कि अपीलीय ट्रिब्यूनल ने रजिस्टर्ड बंटवारा डीड को रद्द करने का आदेश देकर अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया था।
इसके अनुसार, अदालत ने विवादित आदेश रद्द किया, रजिस्टर्ड बंटवारा डीड बहाल की और स्पष्ट किया कि प्रतिवादी डीड रद्द कराने के लिए कानून में उपलब्ध किसी भी अन्य उपाय को अपनाने के लिए स्वतंत्र है।
Case Title: Uddagiri Srirama Murthy & Anr. v. State of Andhra Pradesh & Ors.


