पहले पति को तलाक दिए बिन शादी करने वाले दूसरे 'पुरुष' से महिला भरण-पोषण कर सकती है? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया जवाब

Shahadat

13 July 2026 9:56 AM IST

  • पहले पति को तलाक दिए बिन शादी करने वाले दूसरे पुरुष से महिला भरण-पोषण कर सकती है? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया जवाब

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ़ किया कि अगर कोई महिला अपने पहले पति को तलाक दिए बिना किसी पुरुष के साथ रहने लगती है, तो उसे "कानूनी रूप से विवाहित पत्नी" नहीं माना जाएगा, इसलिए वह CrPC की धारा 125 के तहत अपने साथी से गुज़ारा-भत्ता पाने की हकदार नहीं है।

    जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें महिला को उसके साथी (जिससे उसने कथित तौर पर पहले पति से तलाक लिए बिना शादी की थी) से गुज़ारा-भत्ता देने का निर्देश दिया गया था।

    हालांकि, सिंगल जज ने उनकी नाबालिग बेटी को दिए गए गुज़ारा-भत्ते का आदेश बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि पिता को अपने उन बच्चों का भरण-पोषण करना ही होगा जो अपना खर्च उठाने में असमर्थ हैं, चाहे वे जायज़ हों या नाजायज़; जैसा कि CrPC की धारा 125(1)(b) में प्रावधान है।

    मामले का संक्षिप्त विवरण

    कोर्ट संतोष कुमार द्वारा दायर एक क्रिमिनल रिविज़न याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इसमें चित्रकूट के फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज के अगस्त 2025 के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें उन्हें महिला को 2,000 रुपये प्रति माह और उनकी बेटी को (उसके बालिग होने तक) 1,000 रुपये प्रति माह देने का निर्देश दिया गया।

    महिला का दावा था कि उसकी दूसरी शादी हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार गवाहों की मौजूदगी में संतोष (प्रतिवादी) के साथ हुई, जिसके लिए 10 जून, 2006 को एक नोटरीकृत समझौता किया गया।

    उसने यह भी दावा किया कि वे पति-पत्नी के रूप में रहने लगे और उनकी एक बेटी हुई, जो लगभग 8 साल की।

    गुज़ारा-भत्ते की अपनी याचिका के अनुसार, बेटी के जन्म के कुछ साल बाद संतोष का व्यवहार बदल गया। वह उसे और उसकी बेटी को पीटने लगा और राजमिस्त्री के तौर पर 18,000 से 20,000 रुपये प्रति माह कमाने के बावजूद खाना और गुज़ारा-भत्ता देने से इनकार किया।

    हालांकि, जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) के दौरान उसने माना कि लगभग 15 साल पहले उसकी शादी एक अन्य व्यक्ति से हुई और उससे उसके दो बच्चे है।

    उसने यह भी माना कि संतोष के साथ उसकी शादी हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार नहीं हुई। हालांकि, बाद में उसके पहले पति की मौत हो गई, जबकि वह पहले से ही उस व्यक्ति (जिसने अपील की है) के साथ रह रही थी।

    हाईकोर्ट की टिप्पणियां

    हाईकोर्ट ने देखा कि ट्रायल कोर्ट ने खुद यह माना था कि महिला यह साबित नहीं कर पाई कि उसकी शादी हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार उस व्यक्ति से हुई, और यह भी देखा कि जब वह संतोष के साथ रहने लगी थी, तब उसका पति जीवित था।

    जस्टिस सचदेव ने कहा,

    "रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों को देखने से यह साफ है कि पहली याचिकाकर्ता (महिला) दूसरी पार्टी की 'कानूनी रूप से ब्याही पत्नी' की परिभाषा में नहीं आती और ट्रायल कोर्ट ने पहली याचिकाकर्ता (महिला) के पक्ष में गुजारा-भत्ता का आदेश देकर गलती की।"

    हालांकि कोर्ट ने महिला के दावे को गलत माना, लेकिन उसने नाबालिग बेटी के उस व्यक्ति से गुजारा-भत्ता मांगने के अधिकार को सुरक्षित रखा।

    कोर्ट ने गौर किया कि रिकॉर्ड में मौजूद DNA रिपोर्ट से यह साबित होता है कि वह व्यक्ति और महिला ही उस बच्चे के बायोलॉजिकल माता-पिता हैं।

    इसलिए बेटी के गुजारा-भत्ता बरकरार रखते हुए कोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका आंशिक रूप से स्वीकार की और केवल महिला के पक्ष में दिए गए गुजारा-भत्ता के आदेश रद्द किया।

    Case title - Santosh Kumar vs State of U.P. and 2 others 2026 LiveLaw (AB) 389

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