सगा बेटा भरण-पोषण दे रहा है तो सौतेले बेटे से दोबारा गुजारा भत्ता नहीं मांग सकती मां: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Amir Ahmad

15 July 2026 7:00 PM IST

  • सगा बेटा भरण-पोषण दे रहा है तो सौतेले बेटे से दोबारा गुजारा भत्ता नहीं मांग सकती मां: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी मां को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत उसके सगे बेटे से भरण-पोषण मिल रहा है, तो वह उसी उद्देश्य के लिए बाद में अपने सौतेले बेटे से अलग से भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकती।

    जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला ने एक महिला की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

    बता दें महिला ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश में संशोधन की मांग की थी जिसमें उसके सगे बेटे को 8,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया जबकि सौतेले बेटे पर कोई जिम्मेदारी नहीं डाली गई।

    महिला का कहना था कि फैमिली कोर्ट ने केवल उसके सगे बेटे पर भरण-पोषण की जिम्मेदारी डालकर गलती की और उसके सौतेले बेटे को भी भरण-पोषण देने का निर्देश दिया जाना चाहिए।

    वहीं राज्य सरकार और सौतेले बेटे की ओर से कहा गया कि जब सगा बेटा पर्याप्त साधन रखता है और मां का भरण-पोषण कर रहा है, तब सौतेले बेटे पर उसी उद्देश्य के लिए दायित्व नहीं डाला जा सकता।

    हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 125 का उल्लेख करते हुए कहा कि माता-पिता के भरण-पोषण के दावे पर विचार करते समय अदालत को यह देखना होता है कि दोनों पक्षों के बीच क्या संबंध है, क्या माता-पिता स्वयं अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हैं, जिससे भरण-पोषण मांगा जा रहा है उसके पास पर्याप्त साधन हैं या नहीं।

    कोर्ट ने कहा कि यह निर्विवाद है कि महिला, एक पक्ष की जैविक मां और दूसरे पक्ष की सौतेली मां है। जब उसने भरण-पोषण का दावा किया तब वह स्वयं का पालन-पोषण करने में असमर्थ थी इसलिए फैमिली कोर्ट उसके सगे बेटे को भरण-पोषण देने का आदेश दिया।

    हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि उस आदेश के बाद परिस्थितियां बदल गईं। अब महिला को सगे बेटे से नियमित भरण-पोषण मिल रहा है इसलिए वह स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ नहीं रही।

    कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की भरण-पोषण करने में असमर्थता उस समय समाप्त हो जाती है, जब अदालत उसके पक्ष में भरण-पोषण का आदेश पारित कर देती है। ऐसे में वह उसी उद्देश्य के लिए किसी दूसरे व्यक्ति से दोबारा भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकता।

    हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति के भरण-पोषण का दायित्व एक से अधिक लोगों पर है तो यह तय करना अदालत का अधिकार है कि किस व्यक्ति से कितनी राशि दिलाई जाए।

    हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में फैमिली कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। साथ ही कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि यह याचिका बिना किसी ठोस कानूनी आधार के केवल सौतेले बेटे को परेशान करने की मंशा से दायर की गई प्रतीत होती है।

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