हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Shahadat

27 Jun 2026 9:00 PM IST

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    देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (22 जून, 2026 से 26 जून, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

    देरी से दायर POSH शिकायतें केवल विलंब के आधार पर खारिज नहीं की जा सकतीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संरक्षण (POSH) कानून के तहत दायर शिकायतों को केवल देरी के आधार पर प्रारंभिक स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता। शिकायत में हुई देरी के कारणों पर विचार करना आंतरिक शिकायत समिति (ICC) का दायित्व है।

    जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने यह टिप्पणी करते हुए प्रयागराज स्थित हरिशचंद्र अनुसंधान संस्थान के खगोल भौतिकी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर के खिलाफ दायर यौन उत्पीड़न की शिकायतों की दोबारा जांच का निर्देश दिया।

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    '24 कोसी परिक्रमा मार्ग' परियोजना पर रोक से इनकार, जनहित के आगे व्यक्तिगत हित को झुकना होगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी 24 कोसी परिक्रमा मार्ग परियोजना पर रोक लगाने से इनकार करते हुए कहा कि यह सरकार की नीति के अनुरूप एक महत्वपूर्ण जनहित परियोजना है और ऐसे मामलों में व्यक्तिगत हित को व्यापक जनहित के आगे झुकना होगा।

    जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस अरुण कुमार की खंडपीठ ने उस याचिका को खारिज किया, जिसमें संभल में प्रस्तावित परिक्रमा मार्ग के निर्माण को रोकने की मांग की गई। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनकी भूमि पर कोल्ड स्टोरेज बनाने की योजना है और परियोजना के कारण उनकी जमीन प्रभावित होगी।

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    रजिस्ट्रार के वैधानिक आदेश पर हुई सेवा समाप्ति के खिलाफ रिट याचिका सुनवाई योग्य: उत्तराखंड हाईकोर्ट

    उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि यदि किसी सहकारी समिति के कर्मचारी की सेवा समाप्ति सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार या वैधानिक अधिकार का प्रयोग करने वाले अधिकारी के निर्देश पर की गई हो, तो उसके खिलाफ दायर रिट याचिका सुनवाई योग्य होगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में यह नहीं कहा जा सकता कि याचिका केवल सहकारी समिति की कार्रवाई के विरुद्ध है।

    चीफ जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता और जस्टिस सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ विशेष अपील पर सुनवाई कर रही थी। यह अपील उस आदेश के खिलाफ दायर की गई, जिसमें एकल पीठ ने रिट याचिका को सुनवाई योग्य न मानते हुए खारिज किया।

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    धार्मिक रीति-रिवाजों के लिए किसी खास सड़क का इस्तेमाल करने का कोई मौलिक अधिकार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुहर्रम जुलूस के लिए रास्ते की मांग वाली याचिका खारिज की

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही भारत के संविधान का अनुच्छेद 25 धर्म की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार देता है, लेकिन यह किसी समुदाय को धार्मिक रीति-रिवाजों के पालन के लिए किसी खास सड़क का इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं देता। [2026 LiveLaw (AB) 333]

    जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस अरुण कुमार की बेंच ने कहा कि बड़ी संख्या में लोगों वाले जुलूसों के लिए रास्ते तय करने की ज़िम्मेदारी सिविल और पुलिस प्रशासन की होती है।

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    इस्लाम अपनाने से व्यक्ति BC (मुस्लिम) आरक्षण का हकदार नहीं बनता: ​​मद्रास हाईकोर्ट ने सरकारी आदेश को असंवैधानिक घोषित किया

    मद्रास हाईकोर्ट ने एक सरकारी आदेश को असंवैधानिक घोषित किया। इस आदेश के तहत पिछड़ी जातियों, अति पिछड़ी जातियों, डी-नोटिफाइड समुदायों या अनुसूचित जातियों से इस्लाम अपनाने वाले व्यक्ति को BC (मुस्लिम) माना जा सकता था और आरक्षण का लाभ उठाने के लिए 7 अधिसूचित समुदायों में से किसी एक का समुदाय प्रमाण पत्र जारी किया जा सकता था। [2026 LiveLaw (Mad) 279]

    'तमिलनाडु पिछड़ी जातियां, अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियां (शैक्षिक संस्थानों में सीटों का आरक्षण और राज्य के तहत सेवाओं में नियुक्तियों या पदों का आरक्षण) अधिनियम, 1993' के अनुसार, मुसलमानों के जिन 7 समुदायों को 'पिछड़ी जाति के मुसलमान' के रूप में अधिसूचित किया गया, वे हैं - अंसार, दक्कनी मुसलमान, दुबेकुला, लब्बाई (जिसमें रोवथर और मरकयार शामिल हैं), माप्पिला, शेख और सैयद।

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    फरार आरोपी जिसे 'घोषित अपराधी' करार दिया गया, वह पावर ऑफ़ अटॉर्नी के ज़रिए केस रद्द करने की याचिका दायर नहीं कर सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट

    उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि जिस आरोपी को 'घोषित अपराधी' (proclaimed offender) करार दिया गया और जिसके खिलाफ 'लुकआउट सर्कुलर' जारी किया गया, वह पावर ऑफ़ अटॉर्नी होल्डर के ज़रिए CrPC की धारा 482 के तहत याचिका दायर नहीं कर सकता।

    कोर्ट ने कहा कि वह ऐसे व्यक्ति के पक्ष में अपने विशेष या अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र (inherent jurisdiction) का इस्तेमाल नहीं करेगा, जो जानबूझकर कानूनी प्रक्रिया से बच रहा है और फरार है।

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    ज़िला कोर्ट को CBI जांच का आदेश देने का अधिकार नहीं: पटना हाईकोर्ट

    पटना हाईकोर्ट ने कहा कि ज़िला कोर्ट (जिसमें सेशन कोर्ट और मजिस्ट्रेट शामिल हैं) के पास किसी अपराध की जांच के लिए सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) को आदेश देने का अधिकार नहीं है।

    कोर्ट ने दोहराया कि यह अधिकार सिर्फ़ संवैधानिक अदालतों के पास है, जो संविधान के आर्टिकल 32 और 226 के तहत अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करती हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि ज़मानत से जुड़े मामले की सुनवाई करते समय सेशन कोर्ट CBI जांच का आदेश नहीं दे सकता।

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    निजी स्थान पर भी जातिसूचक अपमान सार्वजनिक दृष्टि में माना जा सकता है, यदि कई लोग मौजूद हों: केरल हाईकोर्ट

    केरल हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) की व्याख्या करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि किसी निजी स्थान पर की गई जातिसूचक टिप्पणी भी सार्वजनिक दृष्टि के दायरे में आ सकती है, यदि वहां अन्य लोग मौजूद हों और अपमानजनक शब्द सुन सकें।

    जस्टिस ए. बदरुद्दीन ने SC/ST Act से जुड़े मामलों की विशेष अदालत, त्रिशूर द्वारा अग्रिम जमानत अर्जी खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर यह फैसला सुनाया।

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    महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट की धारा 41A के तहत असिस्टेंट चैरिटी कमिश्नर ट्रस्ट के चल रहे चुनावों में दखल नहीं दे सकते: हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स एक्ट, 1950 की धारा 41A के तहत मिली शक्ति केवल पब्लिक ट्रस्ट के सही कामकाज के लिए निर्देश जारी करने तक सीमित है और इसका इस्तेमाल चल रही चुनाव प्रक्रिया में दखल देने के लिए नहीं किया जा सकता।

    कोर्ट ने कहा कि एक बार चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद असिस्टेंट चैरिटी कमिश्नर धारा 41A का इस्तेमाल करके चुनाव नोटिस को रद्द नहीं कर सकते या इस आधार पर चुनाव नहीं रोक सकते कि मौजूदा मैनेजिंग कमेटी की वैधता पर संदेह है।

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    ममता बनर्जी की चुनाव याचिका पर कलकत्ता हाईकोर्ट की मुहर, EVM-VVPAT और CCTV फुटेज सुरक्षित रखने का आदेश

    कलकत्ता हाईकोर्ट ने मंगलवार को ममता बनर्जी की उस चुनाव याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार किया, जिसमें उन्होंने भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र से सुवेंदु अधिकारी के निर्वाचन को चुनौती दी। अदालत ने माना कि याचिका में प्रथम दृष्टया सुनवाई योग्य आधार मौजूद हैं और यह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की आवश्यकताओं को पूरा करती है।

    जस्टिस गौरांग कांत ने याचिका को प्रारंभिक चरण में खारिज करने से इनकार करते हुए निर्वाचन आयोग, पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी तथा भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र के रिटर्निंग अधिकारी को चुनाव से संबंधित इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM), मतदाता सत्यापन योग्य कागजी पर्ची प्रणाली (VVPAT) और CCTV फुटेज को तत्काल सुरक्षित रखने का निर्देश दिया।

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    पेंशन कर्मचारी का वैधानिक अधिकार, गंभीर कदाचार साबित हुए बिना नहीं रोकी जा सकती: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि पेंशन किसी सरकारी कर्मचारी का वैधानिक और संपत्ति संबंधी अधिकार है, जिसे विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना छीना या रोका नहीं जा सकता।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि पेंशन में कटौती या उसे रोके जाने जैसी कठोर सजा तभी दी जा सकती है जब कर्मचारी के खिलाफ गंभीर कदाचार का स्पष्ट निष्कर्ष दर्ज हो और यह भी स्थापित हो कि यदि वह सेवा में होता तो उसके कृत्य के कारण उसे बर्खास्त किया जा सकता था।

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    पार्टनरशिप एक्ट के तहत वकीलों की पार्टनरशिप फर्म रजिस्टर करने के लिए ट्रेड लाइसेंस की ज़रूरत नहीं: कलकत्ता हाईकोर्ट

    कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ वकालत का काम करने के लिए बनी पार्टनरशिप फर्म को इंडियन पार्टनरशिप एक्ट, 1932 के तहत रजिस्ट्रेशन के लिए ट्रेड लाइसेंस दिखाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने माना कि पार्टनरशिप फर्मों के रजिस्ट्रेशन से जुड़े कानूनी नियमों में ऐसी कोई शर्त नहीं है।

    जलपाईगुड़ी में सर्किट बेंच में बैठे जस्टिस बिवास पट्टनायक ने वकील डॉ. अर्जुन चौधरी की रिट याचिका मंज़ूरी की। उन्होंने वेस्ट बंगाल के रजिस्ट्रार ऑफ़ फर्म्स, सोसाइटीज़ एंड नॉन-ट्रेडिंग कॉरपोरेशन्स के उस फ़ैसले को चुनौती दी थी, जिसमें ट्रेड लाइसेंस न होने की वजह से पार्टनरशिप फर्म M/s पिनावा लीगल को रजिस्टर करने से मना कर दिया गया।

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    हरियाणा में नेशनल हेल्थ मिशन के कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों को भी मिलेगा 7वें वेतन आयोग का फ़ायदा: हाईकोर्ट

    पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि नेशनल हेल्थ मिशन (NHM), हरियाणा के तहत कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारी 7वें वेतन आयोग के फ़ायदों के हकदार हैं। कोर्ट ने माना कि एक बार जब राज्य ने सोच-समझकर एक व्यवस्थित वेतन ढांचा अपनाया और पहले के वेतन आयोगों के फ़ायदे दिए तो वह मनमाने ढंग से समानता से इनकार नहीं कर सकता। [2026 LiveLaw (PH) 206]।

    जस्टिस संदीप मौदगिल ने कहा, "राज्य से एक आदर्श नियोक्ता (model employer) के तौर पर, निष्पक्षता, पारदर्शिता और एकरूपता के साथ काम करने की उम्मीद की जाती है। प्रशासनिक सुस्ती, विभागों के बीच अनिर्णय या बार-बार रुख बदलना उन कर्मचारियों के जायज़ दावों को खारिज करने का ज़रिया नहीं बन सकता, जिन्होंने सालों तक राज्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में काम किया। किसी कर्मचारी को उस अधिकार की तलाश में नौकरशाही के चक्कर लगाने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता, जो उसे मिलना ही चाहिए। राज्य को अपनी प्रशासनिक कमियों को कानूनी दावे के खिलाफ बचाव के तौर पर इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती, क्योंकि इससे न्याय के रखवाले को ही न्याय में बाधा बनने की इजाज़त देने जैसा होगा।"

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    पैसेंजर ट्रेन में बम धमाका रेलवे एक्ट के तहत 'हादसा', रेलवे मुआवज़ा देने के लिए ज़िम्मेदाक: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

    पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने पैसेंजर ट्रेन में बम धमाके के पीड़ितों को मुआवज़ा देने के लिए भारत सरकार (यूनियन ऑफ़ इंडिया) की ज़िम्मेदारी बरकरार रखी। कोर्ट ने कहा कि ऐसी घटना रेलवे एक्ट, 1989 की धारा 124 के तहत "हादसे" की परिभाषा में आती है। [2026 LiveLaw (PH) 204]

    जस्टिस पंकज जैन ने कहा, "एक बार यह तय हो जाने के बाद कि ट्रेन में आग या धमाका 'हादसे' की परिभाषा में आता है तो भारत सरकार ट्रेन/रेलवे स्टेशन पर बम धमाके से हुई मौत के लिए मुआवज़ा देने की अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकती।"

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    एमपी में शादी करने वाली महिला सरकारी नौकरी में आरक्षण के लिए अपने मूल राज्य से जारी जाति प्रमाण पत्र पर निर्भर नहीं रह सकती: हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि एक महिला को उस राज्य में आरक्षण का लाभ मिल सकता है, जहां उसकी शादी हुई है, बशर्ते वह उस राज्य के सक्षम अधिकारी से जाति प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करे और उसे प्राप्त करे। [2026 LiveLaw (MP) 223]

    जस्टिस विशाल धगट की बेंच ने आगे स्पष्ट किया कि महिला को उसके मूल राज्य द्वारा मूल रूप से जारी जाति प्रमाण पत्र का उपयोग किसी अन्य राज्य में आरक्षण पाने के लिए नहीं किया जा सकता है।

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