पेंशन कर्मचारी का वैधानिक अधिकार, गंभीर कदाचार साबित हुए बिना नहीं रोकी जा सकती: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

Amir Ahmad

23 Jun 2026 1:31 PM IST

  • पेंशन कर्मचारी का वैधानिक अधिकार, गंभीर कदाचार साबित हुए बिना नहीं रोकी जा सकती: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि पेंशन किसी सरकारी कर्मचारी का वैधानिक और संपत्ति संबंधी अधिकार है, जिसे विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना छीना या रोका नहीं जा सकता।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि पेंशन में कटौती या उसे रोके जाने जैसी कठोर सजा तभी दी जा सकती है जब कर्मचारी के खिलाफ गंभीर कदाचार का स्पष्ट निष्कर्ष दर्ज हो और यह भी स्थापित हो कि यदि वह सेवा में होता तो उसके कृत्य के कारण उसे बर्खास्त किया जा सकता था।

    जस्टिस आनंद सिंह बहरावत की एकलपीठ ने यह टिप्पणी भिंड जिले के जल संसाधन विभाग में कार्यरत कार्यपालन यंत्री की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। याचिकाकर्ता ने 2 जनवरी 2016 के उस दंड आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनकी पेंशन का 5 प्रतिशत हिस्सा तीन वर्षों के लिए रोक दिया गया।

    मामले के अनुसार वर्ष 2012 में याचिकाकर्ता के खिलाफ मध्य प्रदेश सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1966 के तहत आरोपपत्र जारी किया गया। आरोप था कि उन्होंने विभागीय कार्यों में अनियमितताएं कीं। याचिकाकर्ता ने आरोपपत्र का जवाब दिया, लेकिन विभाग ने लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं की।

    इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया, जिसके निर्देश पर विभाग को उनके जवाब पर निर्णय लेने को कहा गया। बाद में जांच अधिकारी नियुक्त किया गया, जिसने गवाहों के बयान दर्ज कर अपनी रिपोर्ट अनुशासनात्मक प्राधिकारी को सौंप दी।

    रिपोर्ट के आधार पर कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जिस पर याचिकाकर्ता ने अपना पक्ष रखा। इसके बाद लोक सेवा आयोग की राय प्राप्त कर विभाग ने पेंशन का 5 प्रतिशत हिस्सा तीन वर्षों के लिए रोकने का आदेश पारित किया।

    याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि लोक सेवा आयोग की राय उन्हें पहले उपलब्ध नहीं कराई गई, जबकि नियमों के अनुसार प्रत्येक नोटिस और संबंधित दस्तावेज कर्मचारी को उपलब्ध कराना अनिवार्य है। यह भी कहा गया कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप कदाचार की श्रेणी में नहीं आते और किसी दुर्भावनापूर्ण मंशा का भी प्रमाण नहीं है।

    हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि लोक सेवा आयोग की राय कर्मचारी को पहले उपलब्ध कराना आवश्यक है। ऐसा न करने पर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है और पूरी विभागीय कार्रवाई प्रभावित हो जाती है।

    अदालत ने यह भी कहा कि अधिकारियों को प्राप्त विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग सावधानी, तर्कसंगतता और निष्पक्षता के साथ किया जाना चाहिए।

    खंडपीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ मुख्य आरोप केवल यह था कि वे विभाग द्वारा निर्धारित लक्ष्यों को हासिल नहीं कर सके। मामले में किसी वित्तीय गड़बड़ी, भ्रष्टाचार या गंभीर कदाचार का आरोप नहीं था।

    अदालत ने कहा,

    "याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोप मामूली प्रकृति के हैं। संक्षेप में सभी आरोप इस बात से जुड़े हैं कि वह निर्धारित लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सके। इनमें किसी प्रकार का वित्तीय नुकसान या गंभीर अनियमितता शामिल नहीं है। ऐसे में तीन वर्षों तक 5 प्रतिशत पेंशन रोकने की सजा कठोर और असंगत प्रतीत होती है।"

    इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने दंड आदेश को निरस्त किया। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को रोकी गई पूरी पेंशन का बकाया भुगतान 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित किया जाए। यह भुगतान आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तिथि से तीन महीने के भीतर करना होगा।

    Next Story