निजी स्थान पर भी जातिसूचक अपमान सार्वजनिक दृष्टि में माना जा सकता है, यदि कई लोग मौजूद हों: केरल हाईकोर्ट

Amir Ahmad

24 Jun 2026 4:18 PM IST

  • निजी स्थान पर भी जातिसूचक अपमान सार्वजनिक दृष्टि में माना जा सकता है, यदि कई लोग मौजूद हों: केरल हाईकोर्ट

    केरल हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) की व्याख्या करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि किसी निजी स्थान पर की गई जातिसूचक टिप्पणी भी सार्वजनिक दृष्टि के दायरे में आ सकती है, यदि वहां अन्य लोग मौजूद हों और अपमानजनक शब्द सुन सकें।

    जस्टिस ए. बदरुद्दीन ने SC/ST Act से जुड़े मामलों की विशेष अदालत, त्रिशूर द्वारा अग्रिम जमानत अर्जी खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर यह फैसला सुनाया।

    अदालत ने कहा,

    “यह स्थापित विधिक सिद्धांत है कि 'सार्वजनिक दृष्टि के भीतर' होने का अर्थ 'सार्वजनिक स्थान' होना नहीं है। यदि अपमानजनक और जातिसूचक शब्द सुनने के लिए अन्य लोग या तीसरे व्यक्ति मौजूद हों, तो निजी स्थान भी सार्वजनिक दृष्टि के भीतर माना जा सकता है।”

    मामले में आरोपियों पर भारतीय न्याय संहिता, विस्फोटक पदार्थ कानून तथा SC/ST Act की विभिन्न धाराओं के तहत अपराध करने का आरोप है।

    अभियोजन के अनुसार आरोपी और अन्य लोग कथित रूप से शिकायतकर्ता की संपत्ति में जबरन घुस गए, वहां विस्फोटक पदार्थ फोड़े और मुख्य आरोपी ने शिकायतकर्ता को उसकी जाति के नाम से संबोधित करते हुए गाली-गलौज और धमकियां दीं।

    विशेष अदालत ने यह मानते हुए अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया कि प्रथम दृष्टया SC/ST Act के तहत अपराध बनता है, जिसके कारण अधिनियम की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत पर रोक लागू होती है।

    अपीलकर्ताओं ने दलील दी कि उन्हें शिकायतकर्ता की जाति की जानकारी नहीं थी, इसलिए SC/ST Act की धाराएं लागू नहीं हो सकतीं।

    हाईकोर्ट ने अभियोजन के आरोपों का परीक्षण करते हुए पाया कि कथित घटना शिकायतकर्ता के पति की मौजूदगी में हुई और आरोपियों ने संपत्ति में घुसकर अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया।

    अदालत ने कहा कि सार्वजनिक दृष्टि और सार्वजनिक स्थान एक समान नहीं हैं। यदि किसी निजी स्थान पर तीसरे व्यक्ति मौजूद हों और वे जातिसूचक अपमान सुन सकें, तो वह स्थान भी अधिनियम के तहत सार्वजनिक दृष्टि के भीतर माना जा सकता है।

    पीठ ने आगे कहा कि जब एक से अधिक आरोपी मिलकर किसी व्यक्ति को अपमानित करने और उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाने का प्रयास करते हैं तो उनकी उपस्थिति भी ऐसे तीसरे व्यक्तियों या आम लोगों की उपस्थिति के समान मानी जा सकती है, जो उन टिप्पणियों को सुन रहे हों।

    अदालत ने कहा,

    “जब एक से अधिक आरोपी मिलकर पीड़ित को अपमानित करने के उद्देश्य से अभद्र और अपमानजनक बातें करते हैं तब उनकी सामूहिक उपस्थिति भी उन तीसरे व्यक्तियों की उपस्थिति के समान है, जो ऐसे अपमानजनक और डराने वाले शब्दों को सुन सकते हैं। ऐसी स्थिति में वह स्थान भी सार्वजनिक दृष्टि के भीतर माना जाएगा।”

    हाईकोर्ट ने माना कि शिकायतकर्ता की जाति का नाम अन्य लोगों की मौजूदगी में लेने का आरोप प्रथम दृष्टया SC/ST Act के तहत मामला स्थापित करने के लिए पर्याप्त है।

    अदालत ने यह भी कहा कि आरोपियों को शिकायतकर्ता की जाति की जानकारी थी या नहीं, यह अंतिम रूप से मुकदमे के दौरान साक्ष्यों के आधार पर तय होगा। हालांकि प्रारंभिक स्तर पर उपलब्ध अभिलेखों से इस जानकारी का अनुमान लगाया जा सकता है।

    पीठ ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि दोनों पक्ष पड़ोसी थे और पहले एक ही राजनीतिक दल से जुड़े रहे थे। ऐसे में प्रारंभिक स्तर पर यह मानना उचित है कि आरोपियों को शिकायतकर्ता की जातीय पहचान की जानकारी रही होगी।

    इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि SC/ST Act की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत पर वैधानिक रोक लागू होती है। इसलिए विशेष अदालत द्वारा अग्रिम जमानत से इनकार करने के आदेश को बरकरार रखा गया। साथ ही आरोपियों को जांच अधिकारी के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया और ऐसा न करने पर उनकी गिरफ्तारी की अनुमति दी गई।

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