हरियाणा में नेशनल हेल्थ मिशन के कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों को भी मिलेगा 7वें वेतन आयोग का फ़ायदा: हाईकोर्ट
Shahadat
22 Jun 2026 8:43 PM IST

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि नेशनल हेल्थ मिशन (NHM), हरियाणा के तहत कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारी 7वें वेतन आयोग के फ़ायदों के हकदार हैं। कोर्ट ने माना कि एक बार जब राज्य ने सोच-समझकर एक व्यवस्थित वेतन ढांचा अपनाया और पहले के वेतन आयोगों के फ़ायदे दिए तो वह मनमाने ढंग से समानता से इनकार नहीं कर सकता। [2026 LiveLaw (PH) 206]।
जस्टिस संदीप मौदगिल ने कहा,
"राज्य से एक आदर्श नियोक्ता (model employer) के तौर पर, निष्पक्षता, पारदर्शिता और एकरूपता के साथ काम करने की उम्मीद की जाती है। प्रशासनिक सुस्ती, विभागों के बीच अनिर्णय या बार-बार रुख बदलना उन कर्मचारियों के जायज़ दावों को खारिज करने का ज़रिया नहीं बन सकता, जिन्होंने सालों तक राज्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में काम किया। किसी कर्मचारी को उस अधिकार की तलाश में नौकरशाही के चक्कर लगाने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता, जो उसे मिलना ही चाहिए। राज्य को अपनी प्रशासनिक कमियों को कानूनी दावे के खिलाफ बचाव के तौर पर इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती, क्योंकि इससे न्याय के रखवाले को ही न्याय में बाधा बनने की इजाज़त देने जैसा होगा।"
कोर्ट ने आगे कहा कि संवैधानिक शासन व्यवस्था राज्य और उसकी संस्थाओं से आचरण, जवाबदेही और निष्पक्षता के उच्च मानकों की मांग करती है, खासकर उन लोगों के अधिकारों और हक से जुड़े मामलों में जिन्होंने सार्वजनिक सेवा में अपने कई साल समर्पित किए।
कोर्ट ने बताया कि स्टेट हेल्थ सोसाइटी ने NHM कर्मचारियों के लिए ऐसे ही फ़ायदों की सिफारिश की, जिसमें उनके अमूल्य योगदान - खासकर कोविड-19 महामारी के दौरान - को माना गया। इस प्रस्ताव को आखिरकार मुख्यमंत्री की मंज़ूरी मिल गई। ऐसे हालात में फ़ायदों से लगातार इनकार करने का कोई तार्किक आधार नहीं है और यह साफ़ तौर पर मनमानी को दर्शाता है।
कोर्ट ने कहा,
"चूंकि सर्विस बाय-लॉज़ (सेवा उप-नियम) को वित्त विभाग की सहमति से मंज़ूरी दी गई और इन्हीं के आधार पर NHM कर्मचारियों को छठे वेतन आयोग के फ़ायदे दिए गए। यही ढांचा SSA/HSSPP कर्मचारियों पर भी लागू होता है, जिन्हें पहले ही सातवें वेतन आयोग के फ़ायदे दिए जा चुके हैं, इसलिए राज्य द्वारा सातवें वेतन आयोग का फ़ायदा न देने के मकसद से दोनों तरह के कर्मचारियों के बीच फ़र्क करना भेदभावपूर्ण है।"
ये टिप्पणियां उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की गईं, जिनमें NHM के तहत स्टाफ नर्स, ANM, फार्मासिस्ट, लैब टेक्नीशियन और अन्य संबंधित पदों पर काम करने वाले कर्मचारी शामिल थे। याचिकाकर्ताओं ने 'सर्विस बाय-लॉज़, 2018' के आधार पर 7वें वेतन आयोग के अनुसार अपने वेतनमान में संशोधन और बकाया राशि की मांग की। इसी नियम के तहत उन्हें पहले ही छठे वेतन आयोग का लाभ दिया गया।
कोर्ट ने गौर किया कि छठे वेतन आयोग को लागू करते समय राज्य ने NHM कर्मचारियों और हरियाणा स्कूल शिक्षा परियोजना परिषद के कर्मचारियों के बीच समानता बनाए रखने का फैसला किया। कोर्ट ने कहा कि एक बार जब ऐसी समानता स्थापित और लागू कर दी गई तो 7वें वेतन आयोग का लाभ देते समय राज्य बाद में कोई बनावटी अंतर नहीं कर सकता।
कोर्ट ने कहा,
"जिस वेतन ढांचे को राज्य ने खुद अपनाया, वह बाद में उसी नीति का पालन न करने का फैसला नहीं कर सकता।"
कोर्ट ने ऐसी कार्रवाई को "साफ़ तौर पर मनमाना" बताया।
NHM कर्मचारी राज्य के कामकाज का अहम हिस्सा
राज्य के इस तर्क को खारिज करते हुए कि NHM कर्मचारी केवल कॉन्ट्रैक्ट या स्कीम-आधारित वर्कर हैं, कोर्ट ने ज़ोर दिया कि वे सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा वितरण की रीढ़ हैं।
कोर्ट ने कोविड-19 महामारी के दौरान उनकी भूमिका पर प्रकाश डाला और कहा कि उन्होंने बिना रुकावट स्वास्थ्य सेवाएँ सुनिश्चित करने के लिए मुश्किल हालात में काम किया, इसलिए उन्हें राज्य के तंत्र से अलग नहीं माना जा सकता।
सर्विस बाय-लॉज़ से लागू करने योग्य अधिकार बनते हैं
बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ताओं का दावा रेगुलराइजेशन (स्थायी नौकरी) पर नहीं, बल्कि मंज़ूरशुदा 'सर्विस बाय-लॉज़, 2018' को लागू करने पर आधारित था। इन नियमों में वेतनमान, इंक्रीमेंट और भत्ते सहित एक व्यवस्थित वेतन ढांचा पेश किया गया।
कोर्ट ने पाया कि एक बार जब वित्त विभाग की मंज़ूरी से ऐसा ढांचा लागू हो जाता है और उस पर सालों तक अमल किया जाता है तो राज्य अलग-अलग बातें कहकर उससे मिलने वाले लाभों से इनकार नहीं कर सकता।
'समान काम के लिए समान वेतन' का नियम लागू होता है
'स्टेट ऑफ़ पंजाब बनाम जगजीत सिंह' जैसे स्थापित कानूनों का हवाला देते हुए कोर्ट ने फिर से कहा कि 'समान काम के लिए समान वेतन' का सिद्धांत अस्थायी या कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों पर भी लागू होता है, जब वे रेगुलर कर्मचारियों की तरह ही काम करते हैं।
कोर्ट ने पाया कि समान काम और मौजूदा वेतन ढांचे के बावजूद 7वें वेतन आयोग के लाभ न देना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।
उचित उम्मीद और प्रशासनिक निष्पक्षता
कोर्ट ने 'उचित उम्मीद' (legitimate expectation) के सिद्धांत का भी ज़िक्र किया और कहा कि सर्विस बाय-लॉज़ (सेवा नियमों) और सरकारी मंज़ूरी को लगातार लागू करने से कर्मचारियों के मन में एक उचित उम्मीद पैदा हुई।
कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक देरी या फ़ैसला न ले पाने की वजह से उन अधिकारों को खत्म नहीं किया जा सकता, जिन्हें सबसे ऊंचे एग्जीक्यूटिव लेवल पर मंज़ूरी मिल चुकी है, जिसमें मुख्यमंत्री द्वारा 7वें वेतन आयोग के लाभ देने की मंज़ूरी भी शामिल है।
राज्य एक ही बात पर अलग-अलग रुख नहीं अपना सकता
राज्य की इस दलील को खारिज करते हुए कि बाय-लॉज़ को सही मंज़ूरी नहीं मिली, कोर्ट ने कहा कि राज्य बाय-लॉज़ को लागू करने और उनके तहत सालों तक वित्तीय लाभ देने के बाद अब अलग रुख नहीं अपना सकता।
इसलिए कोर्ट ने कहा,
"सर्विस बाय-लॉज़ की मंज़ूरी, वित्त विभाग की सहमति, एग्जीक्यूटिव मंज़ूरी और हरियाणा स्कूल शिक्षा परियोजना परिषद के कर्मचारियों के बराबर दर्जा होने के बावजूद याचिकाकर्ताओं को 7वें वेतन आयोग के लाभ न देने का प्रतिवादियों का कदम कानूनी रूप से सही नहीं है।"
इसके अनुसार, प्रतिवादियों को निर्देश दिया जाता है कि वे याचिकाकर्ताओं और नेशनल हेल्थ मिशन, हरियाणा के तहत काम करने वाले इसी तरह के अन्य कर्मचारियों के वेतनमान को 7वें वेतन आयोग के अनुसार संशोधित करें। यह संशोधन उसी तारीख से लागू होगा जब संबंधित ढांचे के तहत आने वाले इसी तरह के कर्मचारियों के लिए यह लागू हुआ, यानी 01.01.2016 से। साथ ही संशोधित वेतनमान से मिलने वाले लाभ (बकाया राशि सहित) याचिकाकर्ताओं को 6% सालाना ब्याज के साथ दिए जाएंगे।
कोर्ट ने आगे कहा,
"हालांकि, ऐसी बकाया राशि केवल उन संबंधित रिट याचिकाओं के दायर होने की तारीख से ठीक पहले के 38 महीनों की अवधि तक ही सीमित रहेगी। यह ज़रूरी प्रक्रिया पूरी तेज़ी से की जाएगी और किसी भी हाल में इस फ़ैसले की सर्टिफाइड कॉपी मिलने की तारीख से बारह हफ़्तों के भीतर पूरी कर ली जाएगी।"
Title: PRIYAWART AND OTHERS v. STATE OF HARYANA AND OTHERS

