जानिए हमारा कानून
चिकित्सा में लापरवाही : योग्यता नहीं होने के लिए कब डॉक्टर को ठहराया जा सकता है ज़िम्मेदार?
विश्वजीत आनंद दार्शनिक अन्दाज़ में कहें तो ग़लतियों को जीवन का एक अभिन्न हिस्सा कह सकते हैं। अपनी विफलताओं से हम कुछ नया समझते हैं पर जब कोई पेशेवर, ख़ासकर मेडिकल क्षेत्र में काम करने वाला, कोई ग़लती करता है तो बात कुछ और होती है। अगर डॉक्टर कोई ग़लती करता है जिससे मरीज़ को कुछ नुक़सान पहुँचता है तो डॉक्टरों की लापरवाही का मुद्दा उछल जाता है। प्रसिद्ध न्यायविदों और अदालतों के फ़ैसलों में इस लापरवाही को कई बार बहुत ही अच्छी तरह परिभाषित किया जा चुका है। कुछ लोगों का यह कहना है कि...
आखिर कब करती है CBI किसी मामले की जांच? जानिए कुछ महत्वपूर्ण सवालों के जवाब
स्पर्श उपाध्यायअक्सर हम अख़बारों में एवं न्यूज़ चैनल पर सुनते हैं की सीबीआई (केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो) किसी मामले की जांच कर रही है, या सीबीआई जांच के हुए आदेश. पर क्या आप जानते हैं कि आखिर किन परिस्थितियों में और किन मामलों में सीबीआई जांच करती है? आखिर क्यूँ नहीं सीबीआई हर मामले की जांच करती है? कौन तय करता है कि किन मामलों में सीबीआई जांच की जायेगी? सीबीआई का क्या है इतिहास है यह कैसे करती है काम? हम यह सब आज के इस लेख में समझेंगे| सीबीआई का इतिहास क्या है? द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान,...
क्या पुलिस अभियुक्त के संस्वीकृत बयान (Confessional Statement) के आधार पर FIR दर्ज़ कर सकती है? उसका साक्ष्य के रूप में क्या मूल्य होगा?
"पुलिस किसी भी व्यक्ति (जिसमें अभियुक्त भी शामिल है) द्वारा दी गयी सूचना के आधार पर FIR दर्ज़ कर सकती है, बिना इस बात पर ध्यान दिए कि क्या अभियुक्त द्वारा दिया गया बयान 'संस्वीकृत बयान' (confessional statement) है या नहीं." दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 FIR दर्ज़ करने से सम्बन्ध रखती है हालाँकि यह धारा 'FIR' शब्द का प्रयोग नहीं करती है. यह धारा कहती है कि संज्ञेय अपराध किये जाने से सम्बंधित प्रत्येक सूचना, थानाधिकारी को अगर मौखिक दी गयी है तो उसे वह स्वयं या अपने निर्देशन में...
एक अदालत से दूसरी अदालत में कैसे होते हैं केस ट्रांसफर, जानिए सुप्रीम कोर्ट के अधिकार और प्रक्रिया
ताज़ा उन्नाव मामले के अलावा सुप्रीम कोर्ट के ऐसे कई केस हैं जबकि केस या अपील एक राज्य से दूसरे राज्य में ट्रांसफर हुए हैं। जब भी सुप्रीम कोर्ट को यह प्रतीत करवाया जाता है कि न्याय के उद्देश्य के लिए यह समीचीन है कि इस धारा के तहत आदेश किया जाए...
चोरी की घटना कैसे लूट बन जाती है? लूट कैसे डकैती बनती है? कानून की इन बारिकियों को समझें
भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 378 से लेकर धारा 462 तक संपत्ति के विरुद्ध अपराध के संबंध में हैं। अगर कोई अन्य व्यक्ति किसी दूसरे की संपत्ति में किसी तरह का व्यवधान, अवरोध उत्पन्न करता है तो भारतीय दंड संहिता में इसके लिए दंड का प्रावधान है।
आर्टिकल 15 क्या है? जानिए अपने अधिकारों और भारतीय संविधान के बारे में ये खास बातें
तथ्य की भूल क्षम्य है, लेकिन विधि की भूल अक्षम्य है, इसलिए देश के नागरिकों से यह उम्मीद की जाती है कि वे कानून के बारे में जानकारी रखें। कोई व्यक्ति अपने बारे में यह प्रतिरक्षा नहीं ले सकता कि उसे कानून की जानकारी नहीं है।
शाह बानो से लेकर शबाना बानो तक: तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएं और धारा 125 CrPC के तहत रखरखाव का दावा करने का अधिकार
"जब उसने संहिता के तहत अदालत में आना चुना है, तब यह नहीं कहा जा सकता है कि चूँकि वह एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला है इसलिए इस आधार पर उसे कानून के अंतर्गत ऐसी इजाजत नहीं है।" वर्ष 2009 में, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से यह कहा कि, भले ही एक मुस्लिम महिला को तलाक दिया गया हो, फिर भी वह अपने पति से आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत, इद्दत की अवधि समाप्त होने के बाद भी, जब तक कि वह पुनर्विवाह नहीं करती है, भरण-पोषण की मांग कर सकती है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस कानून को साफ़ किए...
नाराज़ी याचिका (Protest Petition) प्रस्तुत होने पर क्या कार्यवाही करें मजिस्ट्रेट: सुप्रीम कोर्ट ने समझाया [निर्णय पढ़े]
"मजिस्ट्रेट को नाराज़ी याचिका (protest petition) को 'परिवाद' (complaint) मानते हुए संज्ञान लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है." सुप्रीम कोर्ट ने विष्णु कुमार तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में नाराज़ी याचिका दायर होने पर मजिस्ट्रेट को क्या प्रक्रिया अपनानी चाहिए, यह समझाया है. न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति के. एम. जोसफ ने यह कहा कि यदि नाराज़ी याचिका 'परिवाद' की शर्तों को पूर्ण करती है तो उसे परिवाद की तरह मानकर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा २०० और २०२ के तहत मजिस्ट्रेट...
संपत्ति की निजी प्रतिरक्षा (Private Defence) का अधिकार आखिर किन मामलों में किसी हमलावर की मृत्यु कारित करने की अनुमति देता है?: प्रमुख निर्णयों के साथ समझें
हमने इस श्रृंखला के पिछले लेख में मृत्यु कारित करने तक के शरीर के निजी प्रतिरक्षा अधिकार के बारे में बात की और उसे कई प्रसिद्ध वादों के दृष्टिकोण से समझा। मौजूदा लेख में हम संपत्ति के सापेक्ष निजी प्रतिरक्षा के अधिकार को समझेंगे और यह जानेंगे कि आखिर किन परिस्थितियों में इस अधिकार का प्रयोग किस सीमा तक किया जा सकता है।जैसा कि हम भली भाँती जान चुके हैं कि आपराधिक मामलों में प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार एक अहम् एवं जरुरी अधिकार है। यह अधिकार व्यक्ति विशेष को शरीर के या किसी संपत्ति के...
अगर पुलिस प्रथम दृष्टया रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने से मना करें, तो क्या करें?
भारतीय दंड संहिता की धारा १५४ प्रथम दृष्टया रिपोर्ट (FIR) दर्ज़ करने से सम्बन्ध रखती है, हालाँकि यह धारा 'प्रथम दृष्टया रिपोर्ट' शब्द का प्रयोग नहीं करती है. धारा १५४(१) के अनुसार संज्ञेय अपराध किये जाने से सम्बंधित प्रत्येक सूचना, थानाधिकारी को अगर मौखिक दी गयी है तो उसे वह स्वयं या अपने निर्देशन में लेखबद्ध करवाएगा और यह सूचना, सूचना देने वाले को पढ़कर सुनाई जाएगी और उस पर उस व्यक्ति के हस्ताक्षर लिए जाएंगे एवं इस सूचना का सार राज्य सरकार के नियमों के अनुसार एक पुस्तक में प्रविष्ट...
शरीर के निजी प्रतिरक्षा (Private Defence) के अभ्यास में हमलावर की मृत्यु कब कारित की जा सकती है?: प्रमुख निर्णयों के साथ समझें
आपराधिक मामलों में प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार एक अहम् एवं जरुरी अधिकार है। यह अधिकार व्यक्ति विशेष को स्वयं को या अपनी किसी संपत्ति के विरुद्ध हो रहे या हो सकने वाले अपराध को रोकने में मदद करता है। यह अधिकार, स्व संरक्षण (self-preservation) के सिद्धांत पर आधारित है। हम इस श्रृंखला में यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि यह अधिकार किन परिस्थितियों में अस्तित्व में आता है, यह कहाँ से शुरू एवं कहाँ खत्म होता है एवं इसकी सीमाएं क्या हैं।जहाँ पिछले लेख में हमने धारा 96, 97, 98 एवं 99 के बीच के आपसी...
फतवों और धार्मिक फरमानों की कानूनी वैधता
धर्म कई लोगों के जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. धर्म के नाम पर कही गयी हर बात फिर चाहे वह तर्क-शून्य और कभी-कभी गैर-कानूनी ही क्यों न हो, उसे स्वीकार्यता प्राप्त है. वे व्यक्ति और संस्थाएँ जो इन मामलों में रसूख रखते है वे धार्मिक जनता की इन्हीं प्रवृत्तियों का फायदा उठाकर मज़हबी फरमान जारी करते हैं. हालाँकि कुछ फरमान सीधे-सीधे व्यक्ति के धार्मिक मामलों से जुड़े होते है, पर कुछ व्यक्तियों के मानव और मूलभूत अधिकारों जैसे जीवन जीने का अधिकार, निजता का अधिकार, आज़ादी का...
चेक का डिसऑनर: सुप्रीम कोर्ट के हालिया 14 निर्णय
एनआई अधिनियम की धारा 148 का प्रभाव है भूतलक्षी (Retrospective)[सुरिंदर सिंह देशवाल @ कर्नल एस. एस. देसवाल बनाम वीरेंद्र गांधी]इस मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट की संशोधित धारा 148, एक्ट की धारा 138 के तहत अपराध के लिए सजा और सजा के आदेश के खिलाफ अपील के संबंध में लागू होगी। यहां तक कि यह ऐसे मामले में भी यह लागू होगी जहां धारा 138 के तहत अपराध की शिकायत वर्ष 2018 के संशोधन अधिनियम से पहले यानी 01.09.2018 से पहले दायर की गयी थी।NI अधिनियम की धारा 148, जिसे...
अन्तर्जातीय और अंतरधार्मिक विवाह: कैसे करवाएँ रजिस्ट्रेशन?
एनसीएईआर (National Council of Applied Economic Research) द्वारा २०१४ में प्रकाशित शोध के अनुसार भारत में मात्र ५% विवाह अन्तर्जातीय विवाह है, लगभग ९५% भारतीय अपनी ही जाति/ समुदाय में विवाह करते है.[i] शिक्षा के प्रसार के बावजूद भारतीय समाज में शादियाँ बेहद कम संख्या में हो रही है. पर अन्तर्जातीय और अंतर धार्मिक विवाह एक बराबरी आधारित समावेशी समाज बनाने के लिए आवश्यक है. अम्बेडकर अन्तर्जातीय विवाहों को जाति जैसे भेदभावपूर्ण सामाजिक ढांचे को गिराने के लिए महत्वपूर्ण मानते थे. यह कहना...
बहरी और गूंगी रेप पीड़िता के बयान कैसे दर्ज हो ,बॉम्बे हाईकोर्ट ने बताया [आर्डर पढ़े]
बॉम्बे हाईकोर्ट ने बलात्कार के एक मामले को इस आधार पर ट्रायल कोर्ट के पास वापस भेज दिया क्योंकि साक्ष्य अधिनियम की धारा 119 के प्रावधानों पर विचार किए बिना ही बहरी और गूंगी पीड़िता के बयान दर्ज किए गए थे।साक्ष्य अधिनियम की धारा 119 के अनुसार जब गवाह मौखिक रूप से संवाद करने में असमर्थ होता है तो अदालत ऐसे व्यक्ति का बयान दर्ज करने में एक दुभाषिए या विशेष शिक्षक की सहायता लेगी और इस तरह के बयान की वीडियोग्राफी की जाएगी। राजस्थान राज्य बनाम दर्शन सिंह @ दर्शन लाल के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने...
प्राइवेट (निजी) प्रतिरक्षा का अधिकार क्या है एवं यह किन मामलों में उपलब्ध है?: सम्बंधित प्रावधान एवं प्रमुख वाद (भाग 1)
आपराधिक मामलों में प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार एक अहम् एवं जरुरी अधिकार है। यह अधिकार व्यक्ति विशेष को स्वयं को या अपनी किसी संपत्ति के विरुद्ध हो रहे या हो सकने वाले अपराध को रोकने में मदद करता है। यह अधिकार, स्व संरक्षण (self-preservation) के सिद्धांत पर आधारित है। प्राइवेट प्रतिरक्षा के कानून की आवश्यकता यह नहीं है कि जब व्यक्ति पर हमला किया जाए या वह हमले की आशंका का सामना करे, तो वो भाग खड़ा हो। यह अधिकार उसे अपना बचाव करने के लिए प्रेरित करता है और यह प्रावधान उसे आवश्यक बल का उपयोग करके...
आदेश II नियम 2: आखिर कब दावे (Claim) का लोप करना या उसे त्याग देना, दूसरे वाद (Second Suit) को रोक देता है?
आदेश II नियम 2 (Order II Rule 2) के अंतर्गत आने वाले मामलों में सही परीक्षण है, "क्या नए वाद (suit) में किया गया दावा (claim), वास्तव में उस वादहेतुक (cause of action) पर आधारित है, जो पूर्व वाद (former suit) के वादहेतुक (cause of action) से भिन्न है।" किसी भी व्यक्ति को एक ही वादहेतुक (cause of action) के लिए, एक से अधिक बार परेशान नहीं किया जाना चाहिए - यह नागरिक प्रक्रिया संहिता के आदेश II नियम 2 (Order II Rule 2) का अंतर्निहित सिद्धांत है। सामान्य नियम यह है कि एक वाद (suit) में...
क्या मात्र पीड़ित महिला की गवाही के आधार पर बलात्कार का आरोप सिद्ध किया जा सकता है?
भारतीय कानून का यह स्थापित नियम है कि भारतीय दंड संहिता की धारा ३७६ के तहत बलात्कार का अपराध, पीड़ित महिला की एकमात्र गवाही (sole testimony) के आधार पर साबित किया जा सकता है जब तक कि सम्पुष्टि (corroborative evidence) के लिए प्रभावशाली कारण न उपलब्ध हो. एक गवाह जिसे घटित घटना की वजह से क्षति पहुंची है, उसे एक मुनासिब गवाह माना जाता है, (बशर्ते वह क्षति उसने स्वयं ना पहुंचायी हो) क्योंकि ऐसा गवाह असली अपराधी को बचाएगा, ऐसी संभावना बहुत कम है. ठीक इसी तरह बलात्कार के अपराध की पीड़ित की गवाही...









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