जानिए हमारा कानून

चिकित्सा में लापरवाही : योग्यता नहीं होने के लिए कब डॉक्टर को ठहराया जा सकता है ज़िम्मेदार?
चिकित्सा में लापरवाही : योग्यता नहीं होने के लिए कब डॉक्टर को ठहराया जा सकता है ज़िम्मेदार?

विश्वजीत आनंद दार्शनिक अन्दाज़ में कहें तो ग़लतियों को जीवन का एक अभिन्न हिस्सा कह सकते हैं। अपनी विफलताओं से हम कुछ नया समझते हैं पर जब कोई पेशेवर, ख़ासकर मेडिकल क्षेत्र में काम करने वाला, कोई ग़लती करता है तो बात कुछ और होती है। अगर डॉक्टर कोई ग़लती करता है जिससे मरीज़ को कुछ नुक़सान पहुँचता है तो डॉक्टरों की लापरवाही का मुद्दा उछल जाता है। प्रसिद्ध न्यायविदों और अदालतों के फ़ैसलों में इस लापरवाही को कई बार बहुत ही अच्छी तरह परिभाषित किया जा चुका है। कुछ लोगों का यह कहना है कि...

शाह बानो से लेकर शबाना बानो तक: तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएं और धारा 125 CrPC के तहत रखरखाव का दावा करने का अधिकार
शाह बानो से लेकर शबाना बानो तक: तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएं और धारा 125 CrPC के तहत रखरखाव का दावा करने का अधिकार

"जब उसने संहिता के तहत अदालत में आना चुना है, तब यह नहीं कहा जा सकता है कि चूँकि वह एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला है इसलिए इस आधार पर उसे कानून के अंतर्गत ऐसी इजाजत नहीं है।" वर्ष 2009 में, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से यह कहा कि, भले ही एक मुस्लिम महिला को तलाक दिया गया हो, फिर भी वह अपने पति से आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत, इद्दत की अवधि समाप्त होने के बाद भी, जब तक कि वह पुनर्विवाह नहीं करती है, भरण-पोषण की मांग कर सकती है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस कानून को साफ़ किए...

नाराज़ी याचिका (Protest Petition) प्रस्तुत होने पर क्या कार्यवाही करें मजिस्ट्रेट: सुप्रीम कोर्ट ने समझाया [निर्णय पढ़े]
नाराज़ी याचिका (Protest Petition) प्रस्तुत होने पर क्या कार्यवाही करें मजिस्ट्रेट: सुप्रीम कोर्ट ने समझाया [निर्णय पढ़े]

"मजिस्ट्रेट को नाराज़ी याचिका (protest petition) को 'परिवाद' (complaint) मानते हुए संज्ञान लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है." सुप्रीम कोर्ट ने विष्णु कुमार तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में नाराज़ी याचिका दायर होने पर मजिस्ट्रेट को क्या प्रक्रिया अपनानी चाहिए, यह समझाया है. न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति के. एम. जोसफ ने यह कहा कि यदि नाराज़ी याचिका 'परिवाद' की शर्तों को पूर्ण करती है तो उसे परिवाद की तरह मानकर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा २०० और २०२ के तहत मजिस्ट्रेट...

संपत्ति की निजी प्रतिरक्षा (Private Defence) का अधिकार आखिर किन मामलों में किसी हमलावर की मृत्यु कारित करने की अनुमति देता है?: प्रमुख निर्णयों के साथ समझें
संपत्ति की निजी प्रतिरक्षा (Private Defence) का अधिकार आखिर किन मामलों में किसी हमलावर की मृत्यु कारित करने की अनुमति देता है?: प्रमुख निर्णयों के साथ समझें

हमने इस श्रृंखला के पिछले लेख में मृत्यु कारित करने तक के शरीर के निजी प्रतिरक्षा अधिकार के बारे में बात की और उसे कई प्रसिद्ध वादों के दृष्टिकोण से समझा। मौजूदा लेख में हम संपत्ति के सापेक्ष निजी प्रतिरक्षा के अधिकार को समझेंगे और यह जानेंगे कि आखिर किन परिस्थितियों में इस अधिकार का प्रयोग किस सीमा तक किया जा सकता है।जैसा कि हम भली भाँती जान चुके हैं कि आपराधिक मामलों में प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार एक अहम् एवं जरुरी अधिकार है। यह अधिकार व्यक्ति विशेष को शरीर के या किसी संपत्ति के...

शरीर के निजी प्रतिरक्षा (Private Defence) के अभ्यास में हमलावर की मृत्यु कब कारित की जा सकती है?: प्रमुख निर्णयों के साथ समझें
शरीर के निजी प्रतिरक्षा (Private Defence) के अभ्यास में हमलावर की मृत्यु कब कारित की जा सकती है?: प्रमुख निर्णयों के साथ समझें

आपराधिक मामलों में प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार एक अहम् एवं जरुरी अधिकार है। यह अधिकार व्यक्ति विशेष को स्वयं को या अपनी किसी संपत्ति के विरुद्ध हो रहे या हो सकने वाले अपराध को रोकने में मदद करता है। यह अधिकार, स्व संरक्षण (self-preservation) के सिद्धांत पर आधारित है। हम इस श्रृंखला में यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि यह अधिकार किन परिस्थितियों में अस्तित्व में आता है, यह कहाँ से शुरू एवं कहाँ खत्म होता है एवं इसकी सीमाएं क्या हैं।जहाँ पिछले लेख में हमने धारा 96, 97, 98 एवं 99 के बीच के आपसी...

बहरी और गूंगी रेप पीड़िता के बयान कैसे दर्ज हो ,बॉम्बे हाईकोर्ट ने बताया [आर्डर पढ़े]
बहरी और गूंगी रेप पीड़िता के बयान कैसे दर्ज हो ,बॉम्बे हाईकोर्ट ने बताया [आर्डर पढ़े]

बॉम्बे हाईकोर्ट ने बलात्कार के एक मामले को इस आधार पर ट्रायल कोर्ट के पास वापस भेज दिया क्योंकि साक्ष्य अधिनियम की धारा 119 के प्रावधानों पर विचार किए बिना ही बहरी और गूंगी पीड़िता के बयान दर्ज किए गए थे।साक्ष्य अधिनियम की धारा 119 के अनुसार जब गवाह मौखिक रूप से संवाद करने में असमर्थ होता है तो अदालत ऐसे व्यक्ति का बयान दर्ज करने में एक दुभाषिए या विशेष शिक्षक की सहायता लेगी और इस तरह के बयान की वीडियोग्राफी की जाएगी। राजस्थान राज्य बनाम दर्शन सिंह @ दर्शन लाल के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने...

प्राइवेट (निजी) प्रतिरक्षा का अधिकार क्या है एवं यह किन मामलों में उपलब्ध है?: सम्बंधित प्रावधान एवं प्रमुख वाद (भाग 1)
प्राइवेट (निजी) प्रतिरक्षा का अधिकार क्या है एवं यह किन मामलों में उपलब्ध है?: सम्बंधित प्रावधान एवं प्रमुख वाद (भाग 1)

आपराधिक मामलों में प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार एक अहम् एवं जरुरी अधिकार है। यह अधिकार व्यक्ति विशेष को स्वयं को या अपनी किसी संपत्ति के विरुद्ध हो रहे या हो सकने वाले अपराध को रोकने में मदद करता है। यह अधिकार, स्व संरक्षण (self-preservation) के सिद्धांत पर आधारित है। प्राइवेट प्रतिरक्षा के कानून की आवश्यकता यह नहीं है कि जब व्यक्ति पर हमला किया जाए या वह हमले की आशंका का सामना करे, तो वो भाग खड़ा हो। यह अधिकार उसे अपना बचाव करने के लिए प्रेरित करता है और यह प्रावधान उसे आवश्यक बल का उपयोग करके...