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समझिये कैसे IPC की धारा 77 एवं 78 के अंतर्गत न्यायिकतः एवं न्यायिक आदेश एवं निर्णय के अनुसरण में किये गए कार्य को साधारण अपवाद का लाभ मिलता हैं? [साधारण अपवाद श्रृंखला 5]
समझिये कैसे IPC की धारा 77 एवं 78 के अंतर्गत न्यायिकतः एवं न्यायिक आदेश एवं निर्णय के अनुसरण में किये गए कार्य को साधारण अपवाद का लाभ मिलता हैं? ['साधारण अपवाद श्रृंखला' 5]

पिछले लेख में हमने विस्तार से समझा कि आखिर क्षम्य (Excusable) कृत्य के अंतर्गत किन परिस्थितियों में मत्तता (Intoxication) के दौरान किये गए कृत्य (धारा 85-86) किसी भी अपराध के लिए कब अपवाद बन सकते हैं। जहाँ धारा 85, मत्तता के दौरान किये गए कार्य के लिए, अपराध से पूर्ण बचाव प्रदान करती है, वहीँ धारा 86 के अंतर्गत स्वैच्छिक मत्तता की स्थिति कारित करने में व्यक्ति द्वारा किये गए अपराध के लिए ज्ञान के पक्ष में उपधारणा (presumption) का निर्माण किया जाता है।इस श्रृंखला के भाग 1 में हमने भारतीय दंड...

समझिये IPC की धारा 85 एवं 86 के अंतर्गत Intoxication (मत्तता) का बचाव क्या है और किन परिस्थितियों में मिलता है इसका लाभ? [साधारण अपवाद श्रृंखला 4]
समझिये IPC की धारा 85 एवं 86 के अंतर्गत Intoxication (मत्तता) का बचाव क्या है और किन परिस्थितियों में मिलता है इसका लाभ? ['साधारण अपवाद श्रृंखला' 4]

पिछले लेख में हमने समझा कि क्षम्य (Excusable) कृत्य के अंतर्गत किन परिस्थितियों में विकृत-चित्त व्यक्ति का कार्य (धारा 84), किसी भी अपराध के लिए कब अपवाद बन सकता है। इस धारा के अंतर्गत हमने विभिन्न वादों की मदद से यह समझा कि अभियुक्त के इरादे और इच्छाशक्ति की अनुपस्थिति उसे आपराधिक दायित्व से छूट देती है। लेकिन यह अनुपस्थिति महज़ मानसिक विकार, या सामान्य आचरण से विचलन, या किसी भी प्रकार का विचलन नहीं है, जो आपराधिक दायित्व से प्रतिरक्षा को प्रभावित करता है।इस श्रृंखला के भाग 1 में...

IPC की धारा 84 के अंतर्गत Unsoundness of Mind (चित्त-विकृति) क्या है और किन परिस्थितियों में मिलता है इसका लाभ? [साधारण अपवाद श्रृंखला 3]
IPC की धारा 84 के अंतर्गत Unsoundness of Mind (चित्त-विकृति) क्या है और किन परिस्थितियों में मिलता है इसका लाभ? ['साधारण अपवाद श्रृंखला' 3]

पिछले लेख में हमने समझा कि क्षम्य (Excusable) कृत्य के अंतर्गत किन परिस्थितियों में दुर्घटना (धारा 80) या इन्फैन्सी (धारा 82,83) किसी भीअपराध के लिए कब अपवाद बन सकती है। जहाँ दुर्घटना या दुर्भाग्य के अंतर्गत, कार्य का विधिपूर्ण होना जरुरी है (और भी तमाम शर्तों के साथ), वहीँ 7 से 12 वर्ष की आयु के शिशु में अपने कार्य के परिणाम और उसकीप्रकृति को न समझ पाना आवश्यक है (धारा 83)।इस श्रृंखला के भाग 1में हमने भारतीय दंड संहिता, 1860 के अंतर्गत 'साधारण अपवाद' (General Exceptions) क्या हैं, यह समझा...

कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम २०१३ [भाग २]- क्या है लोकल कंप्लेंट कमिटी और इंटरनल कंप्लेंट कमिटी ?
कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम २०१३ [भाग २]- क्या है लोकल कंप्लेंट कमिटी और इंटरनल कंप्लेंट कमिटी ?

पिछले लेख (कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम २०१३ भाग-१) में हमने लैंगिक उत्पीड़न का महिलाओं के मूल अधिकारों पर प्रभाव, लैंगिक उत्पीड़न क्या है- ये जाना. आज के लेख में हम असंगठित क्षेत्र और लैंगिक उत्पीड़न के लिए २०१३ एक्ट में दी गयी मशीनरी के बारे में जानेंगे. जैसा कि हमने पिछले भाग में भी देखा था कि २०१३ का अधिनियम संगठित और असंगठित दोनों के क्षेत्रों में यौन शोषण के विरुद्ध कार्यवाही हेतु कानूनी मशीनरी उपलब्ध करवाता है. असंगठित क्षेत्र में यौन शोषण की शिकायतें मुख्यत: लोकल कंप्लेंट कमिटी...

IPC की धारा 80, 82 एवं 83 के अंतर्गत क्षम्य कृत्य क्या हैं?: दुर्घटनावश हुए कृत्य एवं इन्फैन्सी का प्रतिवाद विशेष [साधारण अपवाद श्रृंखला 2]
IPC की धारा 80, 82 एवं 83 के अंतर्गत क्षम्य कृत्य क्या हैं?: दुर्घटनावश हुए कृत्य एवं इन्फैन्सी का प्रतिवाद विशेष ['साधारण अपवाद श्रृंखला' 2]

पिछले लेख में हमने समझा कि भारतीय दंड संहिता, 1860 के अंतर्गत 'साधारण अपवाद' (General Exceptions) क्या हैं और हमने यह भी समझा कि कैसे यह अध्याय ऐसे कुछ अपवाद प्रदान करता है, जहाँ किसी व्यक्ति का आपराधिक दायित्व खत्म हो जाता है। इस लेख में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया कि इन बचाव का आधार यह है कि यद्यपि किसी व्यक्ति ने अपराध किया है, परन्तु उसे उसके लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है।इसी क्रम में हमने जाना कि कैसे यह बचाव आम तौर पर 2 भागों के अंतर्गत वर्गीकृत किये जाते हैं- तर्कसंगत...

समझिये IPC के अंतर्गत क्षम्य एवं तर्कसंगत कृत्य : धारा 76 एवं 79 में तथ्य की भूल विशेष [साधारण अपवाद श्रृंखला 1]
समझिये IPC के अंतर्गत क्षम्य एवं तर्कसंगत कृत्य : धारा 76 एवं 79 में 'तथ्य की भूल' विशेष ['साधारण अपवाद श्रृंखला' 1]

भारतीय दंड संहिता का चैप्टर IV (4th), 'साधारण अपवाद' (General exception) की बात करता है। जैसा कि नाम से जाहिर है, यह अध्याय उन परिस्थितियों की बात करता है जहाँ किसी अपराध के घटित हो जाने के बावजूद भी उसके लिए किसी प्रकार की सजा नहीं दी जाती है।यह अध्याय ऐसे कुछ अपवाद प्रदान करता है, जहाँ किसी व्यक्ति का आपराधिक दायित्व खत्म हो जाता है। इन बचाव का आधार यह है कि यद्यपि किसी व्यक्ति ने अपराध किया है, परन्तु उसे उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि अपराध के समय, या तो मौजूदा हालात...