जानिए हमारा कानून
धारा 482 दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC): सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले
FIR रद्द करने की याचिका पर विचार किया जा सकता है, भले ही याचिका के लंबित रहते चार्ज शीट दायर करदी गई होआनंद कुमार मोहता बनाम राज्य (दिल्ली सरकार) में सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि उच्च न्यायालय, धारा 482 CrPC के तहत दायर याचिका, जिसमे FIR को रद्द करने की मांग की गयी है, पर विचार कर सकता है भले ही उस याचिका के लंबित रहते चार्ज शीट दायर करदी गई हो।"इस धारा के शब्दों में ऐसा कुछ भी नहीं है जो न्यायालय की शक्ति के प्रयोग को, न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग या मिसकैरेज ऑफ़ जस्टिस को केवल FIR के चरण तक...
समझिये कैसे IPC की धारा 77 एवं 78 के अंतर्गत न्यायिकतः एवं न्यायिक आदेश एवं निर्णय के अनुसरण में किये गए कार्य को साधारण अपवाद का लाभ मिलता हैं? ['साधारण अपवाद श्रृंखला' 5]
पिछले लेख में हमने विस्तार से समझा कि आखिर क्षम्य (Excusable) कृत्य के अंतर्गत किन परिस्थितियों में मत्तता (Intoxication) के दौरान किये गए कृत्य (धारा 85-86) किसी भी अपराध के लिए कब अपवाद बन सकते हैं। जहाँ धारा 85, मत्तता के दौरान किये गए कार्य के लिए, अपराध से पूर्ण बचाव प्रदान करती है, वहीँ धारा 86 के अंतर्गत स्वैच्छिक मत्तता की स्थिति कारित करने में व्यक्ति द्वारा किये गए अपराध के लिए ज्ञान के पक्ष में उपधारणा (presumption) का निर्माण किया जाता है।इस श्रृंखला के भाग 1 में हमने भारतीय दंड...
विश्वविद्यालयों में यौन शोषण: क्या कहते है २०१५ के नियम
पिछले लेखों में हमने कार्यस्थल पर यौन शोषण के विषय में कानून को समझने का प्रयास किया। उसी कड़ी में आज के लेख में हम विश्वविद्यालयों में यौन शोषण और सम्बंधित नियमों पर बात करेंगे।यूँ तो २०१३ का अधिनियम विश्वविद्यालयों पर भी समान रूप से लागू होता है, पर फिर भी विश्वविद्यालयों में यौन शोषण पर अलग से बात करना जरुरी है. #MeToo आंदोलन के दौरान शिक्षा क्षेत्र में होने वाले लैंगिक शोषण के कई मुद्दे सामने आये थे. राया शंकर नामक एक छात्रा ने एक पूरी लिस्ट सार्वजनिक की थी जिसमें उन प्रोफेसरों और अध्यापकों...
समझिये IPC की धारा 85 एवं 86 के अंतर्गत Intoxication (मत्तता) का बचाव क्या है और किन परिस्थितियों में मिलता है इसका लाभ? ['साधारण अपवाद श्रृंखला' 4]
पिछले लेख में हमने समझा कि क्षम्य (Excusable) कृत्य के अंतर्गत किन परिस्थितियों में विकृत-चित्त व्यक्ति का कार्य (धारा 84), किसी भी अपराध के लिए कब अपवाद बन सकता है। इस धारा के अंतर्गत हमने विभिन्न वादों की मदद से यह समझा कि अभियुक्त के इरादे और इच्छाशक्ति की अनुपस्थिति उसे आपराधिक दायित्व से छूट देती है। लेकिन यह अनुपस्थिति महज़ मानसिक विकार, या सामान्य आचरण से विचलन, या किसी भी प्रकार का विचलन नहीं है, जो आपराधिक दायित्व से प्रतिरक्षा को प्रभावित करता है।इस श्रृंखला के भाग 1 में...
धारा 498 ए भारतीय दंड संहिता: सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसले
धारा 498A भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत शिकायतें एक ऐसी जगह पर दायर की जा सकती हैं, जहां एक महिला, जो अपने वैवाहिक घर से बाहर निकाली गयी है, आश्रय लेती है [रूपाली देवी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य]इस मामले में, CJI रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की 3 न्यायाधीशों की पीठ ने निम्नलिखित प्रश्न पर विचार किया: "क्या उस मामले में जहां पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा पत्नी के साथ उसके वैवाहिक घर (matrimonial home) में क्रूरता की गई थी, और जहाँ वह महिला उस वैवाहिक...
क्या आवासीय परिसरों को अधिवक्ताओं के कार्यालय के लिए उपयोग किया जा सकता है?
अधिवक्ताओं के कार्यालय को एक आवासीय स्थान से संचालित किया जा सकता है, क्योंकि इसे व्यावसायिक गतिविधि के रूप में नहीं माना जाता है। हालांकि, यह स्थानीय कानूनों द्वारा लगाए गए क्षेत्र प्रतिबंधों के अधीन है।कानूनी पेशा कोई व्यावसायिक गतिविधि (commercial activity) नहीं है। बल्कि, यह एक पेशेवर गतिविधि (professional activity) के रूप में माना जाता है, जो व्यवसाय, व्यापार या वाणिज्य से अलग है।सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के कई निर्णय हैं, जो इस अंतर को स्पष्ट करते हैं। चूंकि एक वकील की सेवा...
IPC की धारा 84 के अंतर्गत Unsoundness of Mind (चित्त-विकृति) क्या है और किन परिस्थितियों में मिलता है इसका लाभ? ['साधारण अपवाद श्रृंखला' 3]
पिछले लेख में हमने समझा कि क्षम्य (Excusable) कृत्य के अंतर्गत किन परिस्थितियों में दुर्घटना (धारा 80) या इन्फैन्सी (धारा 82,83) किसी भीअपराध के लिए कब अपवाद बन सकती है। जहाँ दुर्घटना या दुर्भाग्य के अंतर्गत, कार्य का विधिपूर्ण होना जरुरी है (और भी तमाम शर्तों के साथ), वहीँ 7 से 12 वर्ष की आयु के शिशु में अपने कार्य के परिणाम और उसकीप्रकृति को न समझ पाना आवश्यक है (धारा 83)।इस श्रृंखला के भाग 1में हमने भारतीय दंड संहिता, 1860 के अंतर्गत 'साधारण अपवाद' (General Exceptions) क्या हैं, यह समझा...
कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम २०१३ [भाग 3]-कैसे करती है २०१३ के अधिनियम के तहत ICC/LCC काम
पिछले भाग में हमने २०१३ के अधिनियम के तहत दो तरह की समितियों के बारे में जाना जो लैंगिक अपराध के मामलों में जांच कर एक्शन लेने का कार्य करती है. जहाँ असंगठित क्षेत्र में यौन शोषण की शिकायतें मुख्यत: लोकल कंप्लेंट कमिटी द्वारा सुनी जाती है जिसे जिला प्रशासन द्वारा स्थापित किया जाता है वही संगठित क्षेत्रों के लिए सम्बंधित नियुक्ता (employer) अपनी संस्था में ही एक कमिटी का गठन करता है जिसे आतंरिक परिवाद कमिटी या ICC कहा जाता है. आज हम जानेंगे कि इन समितियों का...
कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम २०१३ [भाग २]- क्या है लोकल कंप्लेंट कमिटी और इंटरनल कंप्लेंट कमिटी ?
पिछले लेख (कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम २०१३ भाग-१) में हमने लैंगिक उत्पीड़न का महिलाओं के मूल अधिकारों पर प्रभाव, लैंगिक उत्पीड़न क्या है- ये जाना. आज के लेख में हम असंगठित क्षेत्र और लैंगिक उत्पीड़न के लिए २०१३ एक्ट में दी गयी मशीनरी के बारे में जानेंगे. जैसा कि हमने पिछले भाग में भी देखा था कि २०१३ का अधिनियम संगठित और असंगठित दोनों के क्षेत्रों में यौन शोषण के विरुद्ध कार्यवाही हेतु कानूनी मशीनरी उपलब्ध करवाता है. असंगठित क्षेत्र में यौन शोषण की शिकायतें मुख्यत: लोकल कंप्लेंट कमिटी...
IPC की धारा 80, 82 एवं 83 के अंतर्गत क्षम्य कृत्य क्या हैं?: दुर्घटनावश हुए कृत्य एवं इन्फैन्सी का प्रतिवाद विशेष ['साधारण अपवाद श्रृंखला' 2]
पिछले लेख में हमने समझा कि भारतीय दंड संहिता, 1860 के अंतर्गत 'साधारण अपवाद' (General Exceptions) क्या हैं और हमने यह भी समझा कि कैसे यह अध्याय ऐसे कुछ अपवाद प्रदान करता है, जहाँ किसी व्यक्ति का आपराधिक दायित्व खत्म हो जाता है। इस लेख में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया कि इन बचाव का आधार यह है कि यद्यपि किसी व्यक्ति ने अपराध किया है, परन्तु उसे उसके लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है।इसी क्रम में हमने जाना कि कैसे यह बचाव आम तौर पर 2 भागों के अंतर्गत वर्गीकृत किये जाते हैं- तर्कसंगत...
UAPA : रिमांड की अवधि को 90 दिन से ज्यादा बढ़ाने के लिए क्या आवश्यकताएं हैं? सुप्रीम कोर्ट ने बताया
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में गैर कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA, 1967) के तहत एक अभियुक्त को दीगई डिफाॅल्ट जमानत को रद्द करने से इंकार कर दियाIअपील पर विचार करते हुए जस्टिस ए.एम खानविल्कर और जस्टिस अजय रस्तोगी की पीठ ने उन आवश्यकताओं की भीव्याख्या दी जो यूएपीए के तहत दर्ज मामलों में आरोपी के रिमांड की अवधि को 90 से दिन से ज्यादा बढ़ाने के लिए जरूरी है।पीठ ने यूएपीए की धारा 43डी(2)(बी) के तहत बताए गए नियम का हवाला दिया जिसमें कहा गया है कि 90 दिनों की उक्त अवधिके भीतर जांच को पूरा...
सीआरपीसी की धारा 202 के तहत जांच या पूछताछ करने का दायरा- सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले सप्ताह दिए गए एक फैसले में दंड प्रक्रिया संहिता यानि सीआरपसी की धारा 202 के तहत जांच या पूछताछ करने के दायरे के बारे मेंसमझाया।बिड़ला मामले में,जस्टिस आर.भानुमथि वाली पीठ ने पाया कि सीआरपीसी की धारा 202 के तहत जांच का उद्देश्य यह पता लगाना है कि प्रथम दृष्टया केस बनताहै या नहीं और क्या अभियुक्त के खिलाफ कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार है या नहीं। फैसले के पेज संख्या 19-29 में सीआरपीसी की धारा 202 के दायरे के बारे मेंबताया गया है। पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति द्वारा शिकायत...
समझिये IPC के अंतर्गत क्षम्य एवं तर्कसंगत कृत्य : धारा 76 एवं 79 में 'तथ्य की भूल' विशेष ['साधारण अपवाद श्रृंखला' 1]
भारतीय दंड संहिता का चैप्टर IV (4th), 'साधारण अपवाद' (General exception) की बात करता है। जैसा कि नाम से जाहिर है, यह अध्याय उन परिस्थितियों की बात करता है जहाँ किसी अपराध के घटित हो जाने के बावजूद भी उसके लिए किसी प्रकार की सजा नहीं दी जाती है।यह अध्याय ऐसे कुछ अपवाद प्रदान करता है, जहाँ किसी व्यक्ति का आपराधिक दायित्व खत्म हो जाता है। इन बचाव का आधार यह है कि यद्यपि किसी व्यक्ति ने अपराध किया है, परन्तु उसे उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि अपराध के समय, या तो मौजूदा हालात...
कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम २०१३ भाग-१
१६ अक्टूम्बर 2017 को कलाकार और एक्टिविस्ट Alyassa Milano ने अपने ट्विटर वॉल पर यह कहते हुए पोस्ट लिखा कि अगर सभी महिलाएं जिनके साथ किसी भी तरह का यौन उत्पीड़न हुआ है वो उनके पोस्ट के जवाब में #MeToo लिखे तो शायद समाज को यह नज़र आ जाये कि सेक्सुअल हरासमेंट कितनी बड़ी और व्यापक समस्या है. उस ट्वीट पर मात्र २४ घंटों में लगभग २४ मिलियन महिलाओं ने जवाब दिया और अगले १० दिनों में आंदोलन लगभग ८५ देशों तक पहुँच गया. भारत भी ...


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