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शरीर के निजी प्रतिरक्षा (Private Defence) के अभ्यास में हमलावर की मृत्यु कब कारित की जा सकती है?: प्रमुख निर्णयों के साथ समझें

SPARSH UPADHYAY
19 July 2019 12:52 PM GMT
शरीर के निजी प्रतिरक्षा (Private Defence) के अभ्यास में हमलावर की मृत्यु कब कारित की जा सकती है?: प्रमुख निर्णयों के साथ समझें
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आपराधिक मामलों में प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार एक अहम् एवं जरुरी अधिकार है। यह अधिकार व्यक्ति विशेष को स्वयं को या अपनी किसी संपत्ति के विरुद्ध हो रहे या हो सकने वाले अपराध को रोकने में मदद करता है। यह अधिकार, स्व संरक्षण (self-preservation) के सिद्धांत पर आधारित है। हम इस श्रृंखला में यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि यह अधिकार किन परिस्थितियों में अस्तित्व में आता है, यह कहाँ से शुरू एवं कहाँ खत्म होता है एवं इसकी सीमाएं क्या हैं।

जहाँ पिछले लेख में हमने धारा 96, 97, 98 एवं 99 के बीच के आपसी सम्बन्ध को समझा और यह जाना कि आखिर किस स्थिति में प्राइवेट प्रतिरक्षा के इस अधिकार का उपयोग एक व्यक्ति कर सकता है। हमने यह भी जाना कि यह अधिकार किन परिस्थितियों में शुरू होता है और कहाँ खत्म होता है, हालाँकि आगे की धाराओं को समझते हुए हम इस अधिकार को और विस्तार एवं समग्र रूप से समझेंगे। आगे की धाराओं में, हम आज धारा 100 एवं 101 को समझने का प्रयास करेंगे और यह जानेंगे कि आखिर कब शरीर के निजी प्रतिरक्षा के अधिकार हेतु किसी हमलावर की मृत्यु कारित की जा सकती है।

हमे यह ध्यान में रखना होगा कि धारा 96 एवं 97 के अंतर्गत यह साफ़ किया गया है कि एक व्यक्ति को प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार है, वहीँ धारा 98 एवं 100-106 उस अधिकार की विभिन डिग्री की बात करती हैं। वहां धारा 99 के अंतर्गत एक साधारण सीमा को दिया गया है कि इस अधिकार का किस हद तक उपयोग किया जा सकेगा।

धारा 100 (आखिर कब प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करने की इजाजत देता है?)

धारा 100 कहती है - शरीर की निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार, पूर्ववर्ती धारा में वर्णित बंधनों के अधीन रहते हुए, हमलावर की स्वेच्छा पूर्वक मॄत्यु कारित करने या कोई अन्य क्षति कारित करने तक है, यदि वह अपराध, जिसके कारण उस अधिकार के प्रयोग का अवसर आता है, एतस्मिनपश्चात निम्न प्रगणित भांतियों में से किसी भी भांति का है, अर्थात्: -

प्रथम - ऐसा हमला जिससे यथोचित रूप से यह आशंका कारित हो कि अन्यथा ऐसे हमले का परिणाम मॄत्यु होगा।

द्वितीय - ऐसा हमला जिससे यथोचित रूप से आशंका कारित हो कि अन्यथा ऐसे हमले का परिणाम घोर क्षति होगा;

तृतीय - बलात्संग करने के आशय से किया गया हमला;

चतुर्थ - प्रकॄति-विरुद्ध काम-तॄष्णा की तॄप्ति के आशय से किया गया हमला;

पंचम - व्यपहरण या अपहरण करने के आशय से किया गया हमला;

षष्ठ - इस आशय से किया गया हमला कि किसी व्यक्ति का ऐसी परिस्थितियों में अनुचित रूप से प्रतिबंधित किया जाए, जिनसे उसे यथोचित रूप से यह आशंका कारित हो कि वह अपने को छुड़वाने के लिए लोक प्राधिकारियों की सहायता प्राप्त नहीं कर सकेगा;

सप्तम - तेजाब फेकने या देने का कार्य या उसका प्रयास करना जिससे यथोचित रूप से आशंका कारित हो कि अन्यथा ऐसे कृत्य का परिणाम घोर क्षति होगा। (आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013)।

इस धारा के अंतर्गत हमे यह मालूम चलता है कि आखिर किन परिस्थितियों में निजी प्रतिरक्षा का अधिकार, किसी व्यक्ति को हमलावर की मृत्यु कारित करने तक की इजाजत देता है। यह साधारणतया वह परिस्थितियां हैं जहाँ किसी व्यक्ति के शरीर पर खतरा सबसे अधिक होता है, और वहां उस खतरे को रोकने या खत्म कर देने के लिए किसी हमलावर की मृत्यु भी कारित की जा सकता है।

हमे यहाँ यह ध्यान में जरुर रखना है कि यह अधिकार धारा 99 के उपबंधों के अधीन है, अर्थात जब एक लोक सेवक द्वारा (या उसके आदेश के अंतर्गत) सद्भावपूर्वक अपने पदाभास में कोई कार्य किया जाता है और यदि वह कार्य से मॄत्यु या घोर उपहति की आशंका युक्तियुक्त रूप से कारित नहीं होती है, तब धारा 100 के अंतर्गत दिए गए अधिकार का इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। वहीँ यदि संरक्षा के लिए लोक प्राधिकारियों की सहायता प्राप्त करने के लिए समय है, तो भी इस धारा के अंतर्गत मृत्यु कारित नहीं की जा सकेगी। यही बात वहां भी लागू होती है जहाँ प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार, अपहानि से अधिक अपहानि करने पर नहीं होगी जितनी प्रतिरक्षा के प्रयोजन से करनी आवश्यक है, अर्थात इस अधिकार के उपयोग में जरुरत से अधिक अपहानि कारित नहीं की जा सकती है।

धारा 100 के अंतर्गत, निम्नलिखित असाल्ट (हमला) का उल्लेख है:-

(1) मृत्यु या घोर उपहति कारित करने हेतु हमला

(2) प्रकॄति-विरुद्ध काम-तॄष्णा की तॄप्ति के आशय से किया गया हमला

(3) व्यपहरण या अपहरण हेतु किया गया हमला

(4) सदोष परिरोध हेतु किया गया हमला

(5) तेजाब फेकने या देने का कार्य या प्रयास

इसके बाद यदि निजी प्रतिरक्षा के अधिकार के तहत मृत्यु कारित की जाती है तो बस यह दिखाया जाना होगा कि उस अधिकार का इस्तेमाल धारा 100 के अंतर्गत उल्लेखित हमलों से बचाव के लिए किया गया एवं किया गया कार्य धारा 99 द्वारा चिन्हित सीमाओं के अंतर्गत था। बलबीर सिंह बनाम पंजाब राज्य (AIR 1959 Punj 332) के मामले में यह कहा गया था कि धारा 100 के अंतर्गत किसी हमलावर की मृत्यु कारित करने को उचित ठहराने हेतु 4 परिस्थितियों की मौजूदगी साबित की जानी चाहिए:-

(1) वह पूरा घटनाक्रम अभियुक्त (वह व्यक्ति जिसने निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का इस्तेमाल किया है) द्वारा शुरू नहीं किया गया होना चाहिए

(2) अभियुक्त के शरीर पर घोर उपहति या मृत्यु का वास्तविक खतरा होना चाहिए जिससे यह समझा एवं विश्वास किया जा सके कि निजी प्रतिरक्षा के अधिकार के चलते कारित की गयी मृत्यु आवश्यक थी

(3) उस घटना या मौके से भाग सकने या उससे बच सकने का अभियुक्त के पास कोई भी मौका नहीं था

(4) मृत्यु कारित करना उस परिस्थिति में आवश्यक था

(1) - मृत्यु या घोर उपहति कारित करने हेतु किये गए हमले के सापेक्ष निजी प्रतिरक्षा

यहाँ हम धारा 100 के प्रथम एवं द्वितीय क्लॉज़ की बात करेंगे। इसके अंतर्गत निनलिखित बातों को ध्यान में रखा जाना चाहिए

* यह अच्छी तरह से तय है कि मौत कारित करने तक के निजी रक्षा के अधिकार का दावा करने के लिए, अभियुक्त को यह दिखाना होगा कि ऐसी परिस्थितियां या तो मौजूद थी या उम्मीद थी कि या तो अभियुक्त की, हमलावर के हाथों या तो मौत हो जाएगी या घोर उपहति कारित की जाएगी [विश्वास अबा कुराने बनाम महाराष्ट्र राज्य (AIR 1978 SC 414)].

* इस अधिकार का उपयोग वहां ही उचित होगा जहाँ मृत्यु या घोर उपहति की आशंका वास्तविक थी, अर्थात ऐसी आशंका मनगढ़ंत अथवा बिना किसी आधार के नहीं होनी चाहिए और ऐसा खतरा बहुत दूर का नहीं होना चाहिए बल्कि एकदम पास का होना चाहिए [रामेश्वर बनाम राज्य [दिल्ली एडमिनिस्ट्रेशन (1981) Cr LJ 1125 (Del)]

* ऐसी स्थिति को संबंधित अभियुक्तों के व्यक्तिपरक दृष्टिकोण से आंका जाना चाहिए, जो मौके पर ऐसी स्थिति का सामना करता है और किसी भी हाल में ऐसी परिस्थिति को सूक्ष्म और पांडित्य जांच के अधीन नहीं किया जा सकता है (वसन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1996) Cr LJ 878 (SC)]।

* यह अदालत द्वारा अच्छी तरफ से तय किया जा चुका है कि हमलावर की मौत के कारण को सही ठहराने के लिए, अभियुक्त को बस अदालत को इस बात पर संतुष्ट करना है कि उसे एक ऐसे हमले का सामना करना पड़ा जिससे मृत्यु या घोर उपहति कारित होने की उचित आशंका उत्पन्न । यह सवाल कि क्या आशंका वाजिब थी या नहीं, यह प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है और इस संबंध में कोई स्ट्रेट-जैकेट फार्मूला निर्धारित नहीं किया जा सकता है। इस्तेमाल किए गए हथियार, हमले के तरीके और प्रकृति और अन्य आसपास की परिस्थितियों का मूल्यांकन करते समय यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि क्या आशंका जायज थी अथवा नहीं [उत्तर प्रदेश राज्य बनाम गाजे सिंह (2009) 11 SCC 414]।

कुछ अन्य प्रमुख मामले

प्रथम मामला - कस्बे में रहने वाले कुछ सिंधी शरणार्थियों और स्थानीय मुसलमानों के बीच 5 मार्च, 1950 को कटनी में एक सांप्रदायिक दंगा हुआ। घटनास्थल पर यह पाया गया कि उस इलाके में मुस्लिम लोगों की दुकानों में सामान बिखरे हुए थे। यह भी सबूत है कि कुछ मुसलमानों ने अपनी जान गंवाई और उनकी दुकानों को लूटा गया। इसी इलाके में अपीलकर्ता की दुकान भी थी, जो ज़ांडा बाज़ार (जहा यह घटनाएं हुई) के पश्चिम में स्थित है।

यह साबित किया गया कि जब ज़ांडा चौक में दंगे भड़क उठे तो अपीलकर्ता के इलाके में दहशत फैल गयी और अपीलकर्ता सहित वहां के लोग अपनी दुकानें बंद करने लगे। भीड़ अंततः इस इलाके में पहुंची और पूर्व की ओर स्थित इमारत के उस हिस्से में घुस गई जिसमें अपीलकर्ता के भाई की दुकान स्थित है और उसे लूट लिया गया। परिवार के अन्य सदस्य अपीलकर्ता के पास आये और उससे शरण मांगने लगे। भीड़ उसके दरवाजे पर लगातार लाठियों से तोड़ फोड़ करने लगी।

उच्चतम अदालत ने यह माना कि यह पर्याप्त था कि भीड़ वास्तव में घर के दूसरे हिस्से में घुस गई थी और उसे लूट लिया था, जिसके बाद उनके परिवार की महिला और बच्चे अपने जीवन की सुरक्षा के लिए अपीलकर्ता के पास भाग गए और भीड़ वास्तव में उनके दरवाजे पर लाठियां बरसा रही थी, वहीँ मुस्लिम दुकानें पहले ही लूट ली गई थीं और आस-पास के इलाके में मुस्लिम मारे गए थे। अपीलकर्ता के लिए यह जानना असंभव था कि क्या उसकी दुकान को भी लूटा जायेगा या नहीं और उसे भी उसी तकलीफ का सामना करना पड़ेगा या नहीं। उसके पास प्रतिरक्षा का अधिकार था और वास्तव में वह अपने परिवार की रक्षा करने के लिए बाध्य था [अमजद खान बनाम राज्य (AIR 1952 SC 165)]।

द्वितीय मामला- भियुक्त वनकर जाति का था और मृतक चमार जाति का। वनकर जाति के लोग जहाँ रहते थे वहां चमार जाति के लोगों का प्रवेश वर्जित था। जब वहां से एक महिला 'शांताबेन' गुजरी, तो वनकर जाति के लोगों ने इसपर आपत्ति जताई। अभियुक्त ने उस महिला को लात से मारा जिससे शुब्ध होकर वह एक मंदिर गयी जहाँ चमार जाति के कई लोग इकठ्ठा थे। उस महिला ने उनको अपने साथ हुई घटना के बारे में बताया जिससे 8-10 लोग उसके साथ अभियुक्त के घर की ओर चल पड़े।

अभियुक्त को जब इसका पता लगा कि चमार जाति के कुछ लोग उसके घर आ रहे हैं तो वह वनकर जाति के क्कुह लोगों के साथ अपने घर के बाहर खड़ा हो गया और वह स्वयं बन्दूक से लैस था। दोनों पक्षों के बीच पत्थरबाजी चली। जिसके बाद अभियुक्त ने गोली चलायी जिससे 2 चमार जाति के लोगों की मृत्यु हो गयी।

उसने निजी प्रतिरक्षा के अधिकार के तहत अपने अपराध को उचित ठहराने की कोशिश की लेकिन अदालत ने कहा कि चमार जाति के उन लोगों के खिलाफ अभियुक्त को प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार नहीं मिल सकता क्यूंकि वो लोग बिना किसी तैयारी के वहां आये थे और पत्थरबाजी में एक भी वनकर जाति का व्यक्ति घायल नहीं हुआ था इसलिए उस समय वहां पर मृत्यु अथवा घोर उपहति की कोई आशंका उत्पन्न नहीं हुई थी [परषोत्तम लाल जी वाघेला बनाम गुजरात राज्य (1992) Cr LJ 2521 (SC)]।

(2) - प्रकॄति-विरुद्ध काम-तॄष्णा की तॄप्ति के आशय से किये गए हमले के सापेक्ष निजी प्रतिरक्षा का अधिकार

यशवंत राओ बनाम मध्य प्रदेश राज्य (AIR 1992 SC 1683) के मामले में अभियुक्त की 15 वर्षीया पुत्री थी जो कि दैनिक कृत्यों के चलते घर से थोड़ी दूर पर गयी हुई थी। जब अभियुक्त वहां पंहुचा तो उसने देखा की मृतक, उसकी पुत्री का यौन उत्पीडन कर रहा था। उसने तुरंत मृतक के सर पर धारदार हथियार से वार किया, जिसके बाद अभियुक्त ने वहां से भागने की कोशिश की लेकिन वह नीचे गिर गया और उससे चोट लगी जिसके बाद उसकी मृत्यु हो गयी। अदालत ने अभियुक्त-पिता को निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का लाभ दिया और कहा चूँकि अभियुक्त की पुत्री 18 वर्ष से कम उम्र की थी तो यह मायने नहीं रखता कि उसने यौन कृत्य के लिए मृतक को अपनी सहमति दी थी अथवा नहीं, और इसलिए मृतक का कृत्य बलात्कार की श्रेणी में आएगा और उसके पिता को यह अधिकार था कि वह अपनी बेटी के शरीर के बचाव हेतु निजी प्रतिरक्षा का इस्तेमाल करते हुए मृतक की मृत्यु कारित करदे।

बदन-नाथ बनाम राजस्थान राज्य [(1999) Cr LJ 2268 (Raj)] के मामले में भी यह अभिनिर्णित किया गया कि एक पिता को अपनी बेटी के खिलाफ हो रहे यौन कृत्य के खिलाफ निजी प्रतिरक्षा का अधिकार उपलब्ध है (मृत्यु कारित करने तक)।

वहीँ उड़ीसा राज्य बनाम निरुपम्मा पांडा [(1989) Cr LJ 621 (Ori)] के मामले में एक महिला ने एक व्यक्ति की मृत्यु कारित की थी जो उसके साथ उसकी सहमति के बिना उससे शारीरिक सम्बन्ध बनाने की कोशिश कर रहा था, अदालत ने उस महिला को इस धारा के अंतर्गत निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का लाभ दिया।

(3) - व्यपहरण या अपहरण हेतु किये गए हमले के सापेक्ष निजी प्रतिरक्षा का अधिकार

अभियुक्त की बहन अपने पिता और भाई (अभियुक्त) के साथ रह रही थी, क्यूंकि वह अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती थी। मृतक पति अभियुक्त के घर आया और अपनी पत्नी (अभियुक्त की बहन) को घसीट कर ले जाने लगा। इसपर उसकी पत्नी ने दरवाजे का एक सिरा पकड़ लिया, जिसके बाद उसके पति ने उसे घसीटना जारी रखा। इस पर उसकी पत्नी के भाई (अभियुक्त) ने चाकू निकला और मृतक पति पर उससे वार किया। चाकू उसके सीने में गहराई तक चला गया और मृतक पति गिर पड़ा और उसकी मृत्यु हो गयी।

अभियुक्त ने धारा 100 के अंतर्गत निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का लाभ माँगा। मृतक पक्ष की ओर से ऐसा कहा गया कि दंड संहिता की धारा 100 के पांचवें खंड में प्रयुक्त "अपहरण" शब्द ऐसे अपहरण का उल्लेख करता है जैसा कि उस संहिता के तहत अपराध है, और केवल धारा 362 में परिभाषित किए गए अपहरण के कार्य के लिए नहीं। केवल अपहरण कोई अपराध नहीं है और इसलिए, निजी रक्षा के किसी भी अधिकार को जन्म नहीं दे सकता है।

हालाँकि अदालत ने यह कहा कि धारा 100 को पढ़ने पर, ऐसा विश्वास करने का कोई कारण प्रतीत नहीं होता है कि उक्त धारा में "अपहरण" शब्द का अर्थ वह है जो "अपहरण" के रूप में परिभाषित किये गए कृत्य से ज्यादा की मांग करता हो। दूसरे शब्दों में यदि अपहरण किया जा रहा है तो धारा 100 के अंतर्गत निजी प्रतिरक्षा के अधिकार के अभ्यास हेतु यह देखने का कोई कारण नहीं बनता कि क्या अपहरण का उद्देश्य कुछ ऐसा है जैसा दंड संहिता के तहत अपराध है (धारा 364 से 369)। उक्त क्लॉज की आवश्यकता केवल यह है, कि एक हमला होना चाहिए जो मानव शरीर के खिलाफ अपराध है, और यह हमला अपहरण के इरादे से होना चाहिए, और जब भी ये तत्व मौजूद होंगे तो यह क्लॉज लागू होगा। अदालत ने अभियुक्त-भाई को इस धारा के अंतर्गत लाभ दिया।

(4) - सदोष परिरोध हेतु किये गए हमले के सापेक्ष निजी प्रतिरक्षा का अधिकार

इस अपवाद को लागू करने के लिए निम्नलिखित तथ्यों का प्रमाण होना चाहिए, अर्थात्, (i) एक हमला होना चाहिए, (ii) हमला सदोष परिरोध के इरादे से होना चाहिए, (iii) इस तरह का हमला ऐसे किया जाना चाहिए और ऐसी परिस्थितियों में होना चाहिए जो किसी व्यक्ति को उचित रूप से यह समझने का कारण दे कि वह अपनी रिहाई के लिए सार्वजनिक प्राधिकारियों तक पहुँच प्राप्त करने में असमर्थ होगा: (iv) ऊपर बताए गए तीनों तत्वों का सह-अस्तित्व होना चाहिए और (v) भले ही इन चारों तत्वों की मौजूदगी हो, परन्तु किया गया कृत्य (निजी प्रतिरक्षा के अधिकार में) अधिनियम की धारा 99 में उल्लिखित प्रतिबंधों के अंतर्गत होना चाहिए।

(5) - तेजाब फेकने या देने का कार्य या प्रयास

एसिड अटैक जिसे एसिड फेंकना भी कहा जाता है, हिंसक हमले का एक रूप है। एसिड अटैक समाज में क्रूर, हिंसक, अनैतिक रूप से अपराध है। एसिड अटैक की शिकार ज्यादातर महिलाएं ही होती हैं। एसिड अटैक जघन्य प्रकार का अपराध है जो पीड़ित के जीवन को अपरिवर्तनीय बनाता है।

आपराधिक कानून (संशोधन) विधेयक, 2013 19 मार्च, 2013 को लोकसभा द्वारा और 21 मार्च, 2013 को राज्यसभा द्वारा पारित किया गया, जो भारतीय दंड संहिता, भारतीय साक्ष्य अधिनियम और आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 में यौन अपराधों और अन्य अपराधों के लिए संशोधन का प्रावधान करता है। इसी के अंतर्गत धारा 100 में भी संशोधन के जरिये एक क्लॉज़ (सप्तम) जोड़ा गया, जहाँ एसिड हमले या देने का कार्य या प्रयास के सापेक्ष निजी प्रतिरक्षा के अधिकार के तहत हमलावर की मृत्यु भी कारित की जा सकती है।

धारा 101 (आखिर कब शरीर के प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार, किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करने की इजाजत नहीं देता है?)

इस धारा के मुताबिक शरीर पर होने वाले हमले से बचाव के लिए प्राइवेट प्रतिरक्षा का इस्तेमाल किया जा सकता है, हालाँकि इसके अंतर्गत किसी हमलावर की मृत्यु कारित नहीं की जा सकती है। यह उन मामलों से सम्बंधित है जो मामले धारा 100 के अंतर्गत नहीं आते हैं। दूसरे शब्दों में, किसी हमलावर की मृत्यु केवल धारा 100 में उल्लेखित मामलों के अंतर्गत कारित की जा सकती है, अन्य मामलों में कोई भी चोट पहुंचाई जा सकती है (मृत्यु कारित करने को छोड़कर)।

निजी प्रतिरक्षा का अधिकार: उपसंहार

जैसा कि हम यह जानते हैं कि जब किसी व्यक्ति पर हमला होता है (शरीर पर) तो उसे यह अधिकार होगा कि वह अपने ऊपर हो रहे हमले से खुदका बचाव करे और अपने या किसी अन्य के शरीर पर हो रहे हमले के विरुद्ध निजी प्रतिरक्षा का इस्तेमाल करे और पनप रहे या पनप चुके खतरे को खत्म करदे। हमारा कानून हमे कायरों की तरह खतरे से भाग खड़े होने की इजाजत नहीं देता है और न ही बदला लेने की इजाजत देता है [दर्शन सिंह बनाम पंजाब राज्य (AIR 2010 SC 1212)]।

अमजद खान बनाम राज्य (AIR 1952 SC 165) एवं बूटा सिंह बनाम पंजाब राज्य [(1991) 2 SCC 612] के मामलों में यह साफ़ किया गया कि जब किसी व्यक्ति पर कोई गंभीर खतरा पनपता है तो यह नहीं कहा जा सकता कि वह 'गोल्डन स्केल' पर चीज़ों को तौलने बैठे कि क्या वह अपने हमलावर के ऊपर किस हद तक हमला करे, और उसके बाद वह धारा 100 के अंतर्गत निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का इस्तेमाल करे।

अंत में हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि यह अधिकार धारा 99 का उपबंधो के अधीन है। हमने इस लेख में मृत्यु कारित करने तक के निजी प्रतिरक्षा अधिकार के बारे में बात की और उसे कई प्रसिद्ध वादों के दृष्टिकोण से समझा। अगले लेख में हम संपत्ति के बचाव हेतु प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के अभ्यास की बात करेंगे। तब तक आप इस श्रृंखला से जुड़े रहें।

श्रृंखला का भाग १ यहाँ पढ़े

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