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प्राइवेट (निजी) प्रतिरक्षा का अधिकार क्या है एवं यह किन मामलों में उपलब्ध है?: सम्बंधित प्रावधान एवं प्रमुख वाद (भाग 1)

SPARSH UPADHYAY
1 July 2019 7:59 AM GMT
प्राइवेट (निजी) प्रतिरक्षा का अधिकार क्या है एवं यह किन मामलों में उपलब्ध है?: सम्बंधित प्रावधान एवं प्रमुख वाद (भाग 1)
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आपराधिक मामलों में प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार एक अहम् एवं जरुरी अधिकार है। यह अधिकार व्यक्ति विशेष को स्वयं को या अपनी किसी संपत्ति के विरुद्ध हो रहे या हो सकने वाले अपराध को रोकने में मदद करता है। यह अधिकार, स्व संरक्षण (self-preservation) के सिद्धांत पर आधारित है। प्राइवेट प्रतिरक्षा के कानून की आवश्यकता यह नहीं है कि जब व्यक्ति पर हमला किया जाए या वह हमले की आशंका का सामना करे, तो वो भाग खड़ा हो। यह अधिकार उसे अपना बचाव करने के लिए प्रेरित करता है और यह प्रावधान उसे आवश्यक बल का उपयोग करके अपने हमलावर पर अपनी जीत को सुरक्षित करने का अधिकार देता है [जॉर्ज डोमिनिक वरके बनाम केरल राज्य (AIR 1971 SC 1208)]।

जैसा कि हम जानते हैं की हमारे आसपास मौजूद पुलिस व्यवस्था, अपराध को रोकने का सबसे जरुरी साधन है। हालाँकि यह अपेक्षा नहीं की जा सकती है कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक पुलिसकर्मी तैनात किया जाए, जिससे किसी भी प्रकार के अपराध होने से पहले उसे रोका जा सके। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को यह अधिकार दिया जा सकता है कि वह स्वयं या किसी संपत्ति के बचाव के लिए, प्राइवेट प्रतिरक्षा अधिकार का इस्तेमाल करे (कुछ विशिष्ट मामलों में, जिसे हम आगे समझेंगे)।

एक अच्छी तरह से सभ्य समाज में यह आमतौर पर माना जाता है कि राज्य की पुलिस एवं सुरक्षा व्यवस्था, अपने नागरिकों और उनकी सुरक्षा का ध्यान रखेगी और आम तौर पर ऐसे व्यक्तियों और उनकी संपत्तियों के संरक्षण के लिए कार्य करेगी। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि जब एक व्यक्ति को अचानक हुए हमले का सामना करना पड़े, तो उसे भाग खड़े होना चाहिए, बल्कि उसे अपनी खुद की रक्षा करनी चाहिए। वह हमले का विरोध करने और खुद का बचाव करने का हकदार है।

वैसी ही स्थिति तब भी होगी, अगर उसे अपनी संपत्ति पर हुए हमले का बचाव करना है। दूसरे शब्दों में, जहां एक नागरिक या उसकी संपत्ति को एक खतरे का सामना करना पड़ता है और राज्य मशीनरी से तत्काल सहायता आसानी से उपलब्ध नहीं हो सकती है, तो नागरिक को स्वयं की और अपनी संपत्ति की रक्षा करने का हक है। ऐसा होने के नाते, यह प्राइवेट प्रतिरक्षा के सिद्धांत के लिए एक आवश्यक कोरोलरी है कि जिस नागरिक ने खुद का या अपनी संपत्ति का बचाव किया है, वह उस अधिकार का उपयोग करने का उस हद तक ही हकदार है, जिस हद तक उस हमले से बचा या उसे टाला जा सके। या ध्यान रखने योग्य बात है कि निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग कभी भी प्रतिशोधी या दुर्भावनापूर्ण रूप से नहीं होना चाहिए। प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग खतरे से बचने के लिए है न कि खतरे को बुलाने के लिए या बेवजह खतरे को बढ़ाने या बदला लेने के लिए।

भारत में प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार

दंड संहिता की धारा 96 से 106 में प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार को कानून की शक्ल दी गयी है। हम सबसे पहले इन सारी धाराओं को संक्षेप में समझेंगे जिसके पश्च्यात हम इनके बारे में विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे।

धारा 96 एक सामान्य नियम की बात करती है, कि प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार में की गयी कोई भी बात अपराध नहीं है, वहीँ धारा 97 के अंतर्गत यह कहा गया है कि यह अधिकार मानव शरीर एवं संपत्ति के बचाव में उपयोग किया जा सकता है। वहीँ धारा 98 के अंतर्गत, एक विकृत-चित्त के व्यक्ति के कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उपयोग किया जा सकता है। यह धारा, उन व्यक्तियों के कार्यों के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार देती है, जो व्यक्ति स्वयं आपराधिक दायित्व से मुक्त हैं। धारा 99, उन दशाओं की बात करती है जहाँ पर प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उपलब्ध नहीं है। यह धारा इस अधिकार की सीमाओं की बात करती है।

इसके बाद, धारा 102 (शरीर के बचाव हेतु) एवं 105 (संपत्ति के बचाव हेतु) के अंतर्गत, प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार की शुरुआत (प्रारंभ) और समाप्ति की बात की गयी है। अर्थात कब यह अधिकार जन्म लेता है/प्रारंभ होता है, और कब यह अधिकार समाप्त हो जाता है/बना रहता है।

वहीँ धारा 100 एवं 101 (शरीर के बचाव हेतु) और धारा 103 एवं 105 (संपत्ति के बचाव हेतु) के अंतर्गत हानि कारित करने की सीमाओं का उल्लेख है (इसके अंतर्गत वह मामले भी सम्मिलित हैं जहाँ इस अधिकार के अभ्यास में मृत्यु भी कारित की जा सकती है)।

धारा 96 एवं 97 भारतीय दंड संहिता, 1860

धारा 96 के अंतर्गत, एक साधारण नियम को कानूनी शक्ल दी गयी है कि, "कोई बात अपराध नहीं है, जो प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग में की जाती है"। इसके अंतर्गत एक सामान्य नियम दिया गया है कि कोई भी कार्य जो निजी प्रतिरक्षा के चलते किया जाए, उसे अपराध नहीं कहा जायेगा।

जैसे कि हमने समझा कि यह एक साधारण नियम है कि प्राइवेट प्रतिरक्षा के अभ्यास में की गयी कोई भी बात अपराध नहीं है, हालाँकि इस अधिकार की कुछ सीमाएं हैं, जिन्हें कुछ प्रमुख वादों में समझाया गया है:-

१) इस अधिकार का इस्तेमाल केवल संकट को दूर करने के लिए किया जा सकता है, न कि किसी व्यक्ति को दण्डित करने के लिए – देओ नारायण बनाम उत्तर प्रदेश राज्य AIR 1973 SC 473

२) एक मामले में शिकायतकर्ता के मवेशियों को अभियुक्त पार्टी ने पकड़ लिया और उसे तालाब के पास ले जाने लगे। यह जानते हुए शिकायतकर्ता पार्टी ने एक गुट बनाया और पूर्ण रूप से हथियारों से लैस होकर वे अपने मवेशियों को छुड़ाने के लिए आये। अदालत ने यह माना कि चूँकि शिकायतकर्ता पक्ष पूर्ण रूप से हथियारों से लैस होकर आया था, इसलिए अभियुक्त पक्ष का यह मानना उचित था कि उनके ऊपर खतरा है, और उनपर उन हथियारों और लाठियों से हमला हो सकता था और इसलिए यदि प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के तहत अभियुक्त पक्ष ने अपना बचाव करते हुए शिकायतकर्ता को चोटें पहुचायीं और एक व्यक्ति की मृत्यु भी कारित करी तो भी उनको उस अपराध के लिए दोषी नहीं माना जाएगा। अदालत ने अभियुक्त पक्ष को इस मामले के लिए दोषी नहीं माना - राम रतन बनाम बिहार राज्य (AIR 1965 SC 926)

३) अभियुक्त पक्ष ने एक दूसरे गाँव (अहरोड़) में एक जमीन खरीदी, अहरोड़ के निवासियों को यह बात ठीक नहीं लगी क्यूंकि वह उन्हें अजनबी समझते थे। जब अभियुक्त पक्ष अपने खेत में हथियारों से लैस होकर कार्य कर रहा है था तभी वहां अहरोड़ के निवासी भी हथियारों से लैस होकर आये जिससे वो उस जमीन पर स्वयं कब्ज़ा कर सकें। अभियुक्त पक्ष ने निजी प्रतिरक्षा के अधिकार के अभ्यास में हमला किया और एक व्यक्ति (अमीन लाल) की मृत्यु कारित कर दी। यह देखते हुए बाकी सब लोग भाग खड़े हुए, और उस जमीन पर अभियुक्त पक्ष के अलावा और कोई नहीं बचा। हालाँकि अहरोड़ गाँव के निवासियों पर भागते हुए अभियुक्त पक्ष ने हमला किया और 2 अन्य लोगों को गोली मार दी और उनकी मृत्यु हो गयी। उच्चतम न्यायालय ने यह माना कि अभियुक्त पक्ष केवल अमीन लाल के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का इस्तेमाल कर सकते थे, और भागते हुए 2 गाँव वालों पर हमला करना, प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के तहत नहीं आता है क्यूंकि वहां कोई भी खतरा बाकी नहीं था – जय देव बनाम पंजाब राज्य (AIR 1963 SC 612)

धारा 97 के अंतर्गत, प्राइवेट प्रतिरक्षा की विषयवस्तु एवं इसकी सीमा दी गयी है। धारा 97 यह बताती है कि, "धारा 99 में अंतर्विष्ट निर्बन्धनों के अध्यधीन, हर व्यक्ति को अधिकार है कि, वह -
1. मानव शरीर पर प्रभाव डालने वाले किसी अपराध के विरुद्ध अपने और किसी अन्य व्यक्ति के शरीर की प्रतिरक्षा करे;
2. किसी ऐसे कार्य के विरुद्ध, जो चोरी, लूट, रिष्टि या आपराधिक अतिचार की परिभाषा में आने वाला अपराध है, या जो चोरी, लूट, कुचेष्टा या आपराधिकअतिचार करने का प्रयत्न है, अपनी या किसी अन्य व्यक्ति की, चल-अचल संपत्ति की प्रतिरक्षा करे।"

दूसरे शब्दों में, धारा 97 के अंतर्गत एक व्यक्ति को यह अधिकार दिया गया है कि वह अपने और किसी अन्य व्यक्ति के शरीर की (मानव शरीर पर प्रभाव डालने वाले किसी अपराध के विरुद्ध) एवं अपनी या किसी अन्य व्यक्ति की, चल अचल संपत्ति संपत्त की (चोरी, लूट, रिष्टि या आपराधिक अतिचार कीपरिभाषा में आने वाला अपराध या उसके प्रयास के विरुद्ध) प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का इस्तेमाल कर सके।

धारा 96 एवं धारा 97 को एक साथ पढ़ा जा सकता है और यह एक साधारण नियम को बताते हैं जहाँ एक व्यक्ति को प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार मिलता है। दोनों को यदि एक साथ समझना हो तो यह कहा जा सकता है कि प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के अंतर्गत किया गया कार्य अपराध नहीं होगा, यदि वहमानव शरीर एवं चल-अचल संपत्ति के बचाव में किया जाए।

* इस अधिकार का उपयोग, व्यक्ति द्वारा उस स्थिति में नहीं किया जा सकता है जहाँ वह स्वयं आक्रमणकारी (Aggressor) हो, अर्थात जहाँ व्यक्ति द्वारा स्वयं किसी हानि को कारित किया गया हो - चाको बनाम केरल राज्य [(2001) 10 SCC 640]

* 'फ्री फाइट' के दौरान भी प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उपलब्ध नहीं होता है। एक 'फ्री फाइट' तब होती है जब दोनों पक्ष शुरू से हमला या हानि पहुँचाने के उद्देश्य के लिए एक दूसरे से लड़ते हैं, वे लड़ने के लिए ही एक दुसरे के संपर्क में आते हैं और लड़ाई होती है। इस तरह की लड़ाई में कौन हमला करता है, और कौन बचाव करता है, यह सवाल पूरी तरह से सारहीन होता है अर्थात इन बातों का निर्धारण नहीं किया जा सकता है – गजानंद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (AIR 1954 SC 695)

धारा 98 भारतीय दंड संहिता, 1860

धारा 98 के अंतर्गत, विकृतचित्त आदि व्यक्ति के खिलाफ प्राइवेट प्रतिरक्षा के सिद्धांत को समझाया गया है। यह धारा कहती है, जब कि कोई कार्य जो अन्यथा कोई अपराध होता, उस कार्य को करने वाले व्यक्ति के बालकपन, समझ की परिपक्वता के अभाव, चित्तविकॄति या मत्तता के कारण, या उस व्यक्ति के किसी भ्रम के कारण, वही अपराध नहीं है, तब हर व्यक्ति उस कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का वही अधिकार रखता है, जो वह उस कार्य के वैसा अपराध होने की दशा में रखता।

यह धारा यह साफ़ करती है कि कि भले ही कोई व्यक्ति अपने कार्य की प्रकृति न समझता हो (बालकपन, समझ की परिपक्वता के अभाव, चित्तविकॄति या मत्तता के कारण) और एक अपराध करता हो, जो वैसे तो बालकपन, समझ की परिपक्वता के अभाव, चित्तविकॄति या मत्तता के कारण अपराध नहीं होगी, परन्तु ऐसे व्यक्ति के उस कार्य के विरुद्ध भी प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार किसी व्यक्ति को उपलब्ध है।

यह धारा इस बात को स्पष्ट करती है की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार किसी आपराधिक संकट के विरुद्ध इस्तेमाल किया जाता है, न कि किसी व्यक्ति की आपराधिक मनोदशा के अनुसार।

उस मामले में जहाँ एक मादक पदार्थ लेने के चलते नशे में रहने वाले व्यक्ति ने कानून तोडा और या तो किसी व्यक्ति पर या उसकी संपत्ति पर हमला किया, उस दशा में भले ही आपराधिक मनोदशा के अभाव में उस व्यक्ति का कोई आपराधिक दायित्व नहीं बनता है, लेकिन फिर भी जिस व्यक्ति के शरीर पर या संपत्ति पर इस व्यक्ति द्वारा हमला किया जा रहा है वह व्यक्ति प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार इस्तेमाल कर सकता है – मनिक्रिकी बनाम एम्परर (AIR 1925 Rang। 121)

धारा 99 भारतीय दंड संहिता, 1860

धारा 99, किसी व्यक्ति के प्राइवेट प्रतिरक्षा की सीमाओं को निर्धारित करती है। इसके अंतर्गत उन दशाओं के बारे में बताया गया है जहाँ प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार, उपलब्ध नहीं होगा। यह धारा कहती है कि, यदि कोई कार्य, जिससे मॄत्यु या घोर उपहति की आशंका युक्तियुक्त रूप से कारित नहीं होती, सद्भावपूर्वक अपने पदाभास में कार्य करते हुए लोक सेवक द्वारा किया जाता है या किए जाने का प्रयत्न किया जाता है तो उस कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है, चाहे वह कार्य विधि-अनुसार सर्वथा न्यायानुमत न भी हो ।
यदि कोई कार्य, जिससे मॄत्यु या घोर उपहति की आशंका युक्तियुक्त रूप से कारित नहीं होती, सद्भावपूर्वक अपने पदाभास में कार्य करते हुए लोक सेवक के निदेश से किया जाता है, या किए जाने का प्रयत्न किया जाता है, तो उस कार्य विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है, चाहे वह निदेश विधि-अनुसार सर्वथा न्यायानुमत न भी हो ।
उन दशाओं में, जिनमें संरक्षा के लिए लोक प्राधिकारियों की सहायता प्राप्त करने के लिए समय है, प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है ।
इस अधिकार के प्रयोग का विस्तार--किसी दशा में भी प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार उतनी अपहानि से अधिक अपहानि करने पर नहीं हैं, जितनीप्रतिरक्षा के प्रयोजन से करनी आवश्यक है ।
स्पष्टीकरण 1--कोई व्यक्ति किसी लोक सेवा द्वारा ऐसे लोक सेवक के नाते किए गए या किए जाने के लिए प्रयतित, कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के वंचित नहीं होता, जब तक कि वह यह न जानता हो, या विश्वास करने का कारण न रखता हो, कि उस कार्य को करने वाला व्यक्ति ऐसा लोक सेवक है ।
स्पष्टीकरण 2--कोई व्यक्ति किसी लोक सेवक के निदेश से किए गए, या किए जाने के लिए प्रयतित, किसी कार्य के वरिद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार से वंचित नहीं होता, जब तक कि वह यह न जानता हो, या विश्वास करने का कारण न रखता हो, कि उस कार्य को करने वाला व्यक्ति ऐसे निदेश से कार्य कर रहा है, जब तक कि वह व्यक्ति उस प्राधिकार का कथन न कर दे, जिसके अधीन वह कार्य कर रहा है, या यदि उसके पास लिखित प्राधिकार है, तो जब तक कि वह ऐसे प्राधिकार को मांगे जाने पर पेश न कर दे ।"

धारा 99 के अंतर्गत, एक लोक-सेवक द्वारा सद्भावपूर्वक अपने पदाभास में कार्य करते हुए किये गए कार्य के विरूद्ध कोई भी प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उपलब्ध नहीं है। हाँ इसके लिए यह जरुर है कि, अगर किसी व्यक्ति को यह न पता हो कि वह कार्य एक सेवक द्वारा किया जा रहा है या एक लोकसेवक के आदेश के अंतर्गत कोई कार्य किया जा रहा हो, तो भी एक व्यक्ति के पास प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार बरक़रार रहता है - एम्परर बनाम किशेंला (AIR 1924 All 645)।

इसके अलावा अगर लोक सेवक द्वारा किये जा रहे कार्य से, मॄत्यु या घोर उपहति की आशंका युक्तियुक्त रूप से कारित होती है, और भले ही वह कार्य सद्भावपूर्वक रूप से अपने पदाभास में किया जा रहा हो, तो भी प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार बरक़रार रहता है - कँवर सिंह बनाम दिल्ली एडमिनिस्ट्रेशन [AIR 1965 SC 871]

धारा 99 के अंतर्गत जो मुख्य बात है वह यह है कि जहाँ पर किसी व्यक्ति के पास यह अवसर हो कि वह संरक्षा के लिए लोक प्राधिकारियों की सहायताप्राप्त कर सके, तो वहां प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उपलब्ध नहीं होगा। यह प्रतिबन्ध इसलिए लगाया गया है कि प्राइवेट प्रतिरक्षा का मूल सिद्धांत ही यह है कि जहाँ किसी व्यक्ति को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़े जहाँ वह किसी संकट को रोक न सके, तो वह स्वयं या अपनी संपत्ति को बचाने हेतु इस अधिकार का इस्तेमाल कर सकता है। लेकिन जहाँ उसकी मदद के लिए राज्य की पुलिस व्यवस्था उपलब्ध है, या हो सकती है वहां उसे कानून स्वयं के हाथ में लेने का अधिकार नहीं दिया जा सकता है। यह अधिकार केवल विषम परिस्थितियों से जूझने के लिए है, न कि कानून अपने हाथ में लेने की स्वतंत्रता के लिए [अमजद खान बनाम राज्य (AIR 1952 SC 165)]।

राम नारायण बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (AIR 1972 SC 2544) के मामले में इस धारा के अंतर्गत यह साफ़ किया गया कि प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार वहां उपलब्ध नहीं होगा जहाँ एक व्यक्ति भाग रहा था और उसे दौड़ा कर उसपर हमला किया जाए। ऐसे मामले में आपराधिक दायित्व बनाया जायेगा और हमला करने वाले को इस अधिकार का लाभ नहीं दिया जायेगा।

ओंकारनाथ सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (AIR 1974 SC 1550) के मामले में, अभियुक्त पक्ष एवं शिकायतकर्ता पक्ष के बीच धक्कामुक्की हुई, जिसके बाद शिकायतकर्ता पक्ष वहां से भागने लगा लेकिन अभियुक्त पक्ष ने उनका पीछा किया और उनपर जानलेवा हमला किया। उच्चतम न्यायालय ने यह माना कि धक्कामुक्की की घटना और बाद में किया गया जानलेवा हमला, दोनों एक दूसरे से अलग घटनाएँ हैं और अलग जगह पर एवं अलग समय पर घटी हैं और दोनों घटनाओं के बीच कोई संबंध नहीं था जिससे किये गए जानलेवा हमले को सही ठहराया जा सके।

हमे यह भी ध्यान में रखना है कि जहाँ खतरा खत्म हो चुका है, वहां प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार भी खत्म हो जाता है। इसके साथ ही जरुरत से ज्यादा प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार भी एक व्यक्ति को हासिल नहीं है। दूसरे शब्दों में, यह अधिकार उतनी अपहानि कारित करने तक ही सीमित है जितनी अपहानि प्रतिरक्षा के प्रयोजन से करनी आवश्यक है इसका सीधा अर्थ है कि जरुरत से ज्यादा बल का प्रयोग या अपहानि कारित करने की इजाजत यह अधिकार नहीं देता है [उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राम स्वरुप (AIR 1974 SC 1570)]।

पाटिल हरी मेघजी बनाम गुजरात राज्य (AIR 1983 SC 488) के वाद में अभियुक्त द्वारा प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार में एक व्यक्ति को जमीन पर गिरा दिया गया, और जब वह निहत्था हो गया और उसके द्वारा अपहानि कारित करने की सभी संभावनाएं खत्म हो गयी, उसके बाद भी अभियुक्त द्वारा उसपर हमला करना जारी रखा गया, इस मामले में यह माना गया कि अभियुक्त के पास प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उपलब्ध नहीं था।

प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार: निष्कर्ष

हमने इस लेख में धारा 96 से 99 के बीच के आपसी सम्बन्ध को समझा और यह जाना कि आखिर किस स्थिति में प्राइवेट प्रतिरक्षा के इस अधिकार का उपयोग एक व्यक्ति कर सकता है। यह अधिकार किन परिस्थितियों में शुरू होता है और कहाँ खत्म होता है, हालाँकि आगे की धाराओं को समझते हुए हम इस अधिकार को और विस्तार एवं समग्र रूप से समझेंगे। श्रृंखला के अगले भाग में हम धारा 100 से लेकर धारा 106 को समझेंगे, जोकि इसी लेख का अभिन्न हिस्सा है।

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