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फतवों और धार्मिक फरमानों की कानूनी वैधता

Live Law Hindi
15 July 2019 9:02 AM GMT
फतवों और धार्मिक फरमानों की कानूनी वैधता
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धर्म कई लोगों के जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. धर्म के नाम पर कही गयी हर बात फिर चाहे वह तर्क-शून्य और कभी-कभी गैर-कानूनी ही क्यों न हो, उसे स्वीकार्यता प्राप्त है. वे व्यक्ति और संस्थाएँ जो इन मामलों में रसूख रखते है वे धार्मिक जनता की इन्हीं प्रवृत्तियों का फायदा उठाकर मज़हबी फरमान जारी करते हैं.

हालाँकि कुछ फरमान सीधे-सीधे व्यक्ति के धार्मिक मामलों से जुड़े होते है, पर कुछ व्यक्तियों के मानव और मूलभूत अधिकारों जैसे जीवन जीने का अधिकार, निजता का अधिकार, आज़ादी का अधिकार, मर्यादा का अधिकार आदि का हरण करते हैं. हमारे देश में इन फरमानों के नाम पर कई भयानक अपराध हुए हैं.

यह लेख इन्हीं धार्मिक फरमानों की वैधता का समीक्षण करता है.

खाप पंचायत-

एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मार्च २०१८ में कहा कि खाप पंचायत द्वारा या अन्य किसी सभा/समूह द्वारा दो वयस्कों के बीच स्वेच्छा से हो रही शादी को रोकना या उसे रोकने का प्रयास करना पूरी तरह से गैर-कानूनी है. उस समय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा कि, किसी सभा/समूह (अन्य कोई नाम जिसके द्वारा वह जानी जाये) द्वारा इज़्ज़त ने नाम पर दी गयी किसी भी तरह की यातना, दुर्व्यवहार जो प्यार और शादी के मामले में एक व्यक्ति की चुनाव की स्वतंत्रता को हानि पहुँचाता हैं, वह गैर-कानूनी है और उसे एक क्षण के लिए भी अस्तित्व में रहने की अनुमति नहीं होनी चाहिए.

कोर्ट ने और आगे कहा कि खाप पंचयात और ऐसे किसी समूह को कानून को अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए और ये समूह कानून लागू करने वाली संस्थाओं का स्थान नहीं ले सकते क्योंकि क़ानून उन्हें ऐसी कोई शक्ति नहीं देता है. कोर्ट ने इस मामले में कई तरह के निर्देशन भी जारी किये.

शरिया कोर्ट और फतवा

५ साल पहले, ७ जुलाई २०१४ को सुप्रीम कोर्ट ने फतवों की कानूनी वैधता पर अपना फैसला सुनाया था.

विश्व लोचन मदन द्वारा दायर की गयी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की चंद्रमौलि क. प्रसाद और पिनाकी चंद्र घोष की पीठ ने निर्णय दिया कि कोई भी संस्था या व्यक्ति, किसी व्यक्ति के अधिकारों, उसकी वस्तु-स्थिति या उसकी बाध्यताओं पर किसी तरह का फैसला नहीं दे सकती या उस पर फतवा जारी नहीं कर सकती जब तक कि उसकी माँग उस व्यक्ति द्वारा नहीं की गयी हो.

कोर्ट ने और आगे कहा कि फतवों को कानूनी वैधता नहीं प्राप्त है, अत: इन्हें किसी तरह के बल प्रयोग/जोर जबरदस्ती द्वारा नहीं लागू किया जा सकता. पर कोर्ट ने धार्मिक मामलों और अन्य किसी मुद्दे पर फतवा जारी करने की परिपाटी पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया जब तक कि वह किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकारों का हरण नहीं करते.

"In a case the person involved or the person directly interested or likely to be affected by being incapacitated, by any person having some interest in the matter . एक मुस्लिम व्यक्ति के अधिकारों, उसकी बाध्यताओं और उसकी वस्तु स्थिति पर फतवा जारी करना, हमारे मतानुसार, सही नहीं होगा जब तक कि उस व्यक्ति विशेष ने स्वयं उसकी माँग न की हो या जब वह स्वयं ऐसी माँग करने में असमर्थ है तो किसी अन्य व्यक्ति द्वारा ऐसी माँग न की गयी हो. एक व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करने वाले फतवे अगर अनजान व्यक्तियों के कहने पर जारी किये गए तो अपूरणीय क्षति होने की संभावना होगी और ऐसा करना बिलकुल गैर-जरुरी है. यह मूलभूत मानवाधिकारों के विरुद्ध होगा. इसका इस्तेमाल बेगुनाहों को सजा देने के लिए नहीं किया जा सकता. कोई भी धर्म, जिसमें इस्लाम भी शामिल है, बेगुनाहों को सजा नहीं देता है. धर्म को पीड़ितों के प्रति निष्ठुर/ निर्दयी होने की अनुमति नहीं है. आस्था का प्रयोग अमानवीयता के यंत्र के तौर पर नहीं किया जा सकता. "

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने लगाया फतवों पर प्रतिबन्ध

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सहारा लेते हुए उत्तराखंड हाई कोर्ट की खंड पीठ ने राज्य में व्यक्तियों और संस्थाओं द्वारा फतवे जारी करने पर प्रतिबन्ध लगाया क्योंकि कोर्ट के अनुसार फतवे व्यक्तियों के कानूनी अधिकारों, मूलभूत अधिकारों, उनकी वस्तु स्थिति, उनकी बाध्यताओं और उनकी डिग्निटी का उल्लंघन करते हैं. जस्टिस राजीव शर्मा और जस्टिस शरद कुमार शर्मा की खंडपीठ ने यह फैसला स्वप्रेरणा से दायर की गयी जनहित याचिका में दिया. याचिका अखबार में प्रकाशित उस खबर के आधार पर थी जिसके अनुसार रुड़की गाँव में पंचायत ने एक बलात्कार पीड़ित महिला के परिवार के निष्कासन का फतवा जारी किया था.

बाद में, हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ जमात-उलेमा-ए-हिन्द की विशेष अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी और मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है.

फतवे लागू नहीं किये जा सकते पर वे अपने आप में गैर- कानूनी नहीं है

विश्व लोचन मदन मामले में याचिकाकर्ता ने इस घोषणा के लिए प्रार्थना की थी कि इन फतवों और फैसलों का भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में कोई स्थान नहीं है और ये फतवे पूर्ण रूपेण शून्य (void ab initio) होने के कारण लागू भी नहीं किये जा सकते.

बेंच ने फैसला दिया कि हालाँकि किसी भी व्यक्ति द्वारा फतवे लागू करने का प्रयास गैर-कानूनी है पर कोर्ट विशेष रूप से यह स्पष्ट किया कि फतवे जारी करना अपने आप में गैर-कानूनी नहीं है. फतवे अब भी निम्नलिखित मुद्दों पर जारी किये जा सकते है-

  • धार्मिक मुद्दों पर या ऐसे मुद्दों पर जहाँ किसी व्यक्ति के अधिकार नहीं हरण होते हो.
  • किसी अन्य व्यक्ति के दृष्टान्त पर समुदाय के लिए सार्वजानिक तौर पर जारी किया गया फतवा.
  • एक मुस्लिम व्यक्ति के अधिकारों, उसकी बाध्यताओं और उसकी वस्तु स्थिति पर जारी किये गए फतवे जिसके लिए उस व्यक्ति विशेष ने स्वयं माँग की है या जब वह स्वयं ऐसी माँग करने में असमर्थ है तो किसी अन्य व्यक्ति द्वारा ऐसी माँग की है.

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