जानिए हमारा कानून
एनडीपीएस एक्ट, 1985 भाग 6: अफीम से संबंधित प्रावधानों का उल्लंघन करने पर दंड
एनडीपीएस एक्ट (The Narcotic Drugs And Psychotropic Substances Act,1985) अत्यंत वैज्ञानिक एवं तार्किक रूप से बनाया गया है। एनडीपीएस एक्ट की धारा 8 नशीले पदार्थों को प्रतिबंधित करती है एवं अलग अलग धाराएं अलग अलग पदार्थों के संबंध में दंड का उल्लेख करती है, जैसे पिछले आलेख में अफीम के पौधे के संबंध में दंड पर चर्चा की गई थी। धारा 18 में अफीम फल एवं अफीम के संबंध में दंड का उल्लेख है। पौधे में उगने वाले फल के रस को सुखाकर ही अफीम तैयार की जाती है। इस आलेख में धारा 18 पर चर्चा की जा रही है।यह अधिनियम...
एनडीपीएस एक्ट, 1985 भाग 5: अधिनियम में पोस्त तृण(अफीम का पौधा) के संबंध में दंड
एनडीपीएस एक्ट (The Narcotic Drugs And Psychotropic Substances Act,1985) की धारा 15 पोस्त तृण के संबंध में दंड का उल्लेख करती है। इस एक्ट में सभी नशीले पदार्थ धारा 8 में प्रतिबंधित किए गए हैं एवं सभी पदार्थो के लिए दंड अलग अलग धाराओं में अधिरोपित किए गए हैं। धारा 15 में पोस्त तृण के लिए दंड अधिरोपित किया गया है। अफीम के पौधे में डोडा का फल उगता है एवं इस पौधे के तने एवं सुखी पत्तियों को तृण कहते हैं। इस आलेख के अंतर्गत धारा 15 पर टिप्पणी प्रस्तुत की जा रही है।यह अधिनियम में प्रस्तुत धारा का मूल...
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट के तहत पर्याप्त भ्रूण असामान्यताएं क्या हैं? दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया
दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को मेडिकल बोर्ड की राय को खारिज करते हुए ने एक 26 वर्षीय महिला को 33 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दी।महिला के पहली तीन अल्ट्रासाउंड रिपोर्टों में भ्रूण में कोई असामान्यता नहीं पाई गई थी, जबकि 12 नवंबर की रिपोर्ट में "मस्तिष्क के बाएं पांर्श्व वेंट्रिकल को फैला हुआ" पाया गया। सेरेब्रल एबनॉर्मलटी के बावजूद, लोक नायक जय प्रकाश अस्पताल के एक मेडिकल बोर्ड ने सोमवार को महिला के मामले को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि भ्रूण उन्नत अवस्था में है।जस्टिस प्रतिभा...
एनडीपीएस एक्ट, 1985 भाग 4: अधिनियम के तहत अपराधों का अप्रमाणित होना
एनडीपीएस एक्ट (The Narcotic Drugs And Psychotropic Substances Act,1985) की धारा 8 सरकार द्वारा घोषित किसी भी नशीले पदार्थ के संबंध में सभी गतिविधियों को प्रतिबंधित करती है। इस धारा के तहत घोषित किए गए अपराध साबित होने पर आरोपियों को दंडित किया जाता है। अनेक मौके ऐसे होते हैं जहां अभियोजन अपराध साबित नहीं कर पाता है। इस आलेख के अंतर्गत ऐसे ही मामलों पर विश्लेषण प्रस्तुत किया जा रहा है।अपराध अप्रमाणितस्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 के अंतर्गत अभियुक्त से जप्त प्रतिषिद्ध वस्तु को...
एनडीपीएस एक्ट, 1985 भाग 3: अधिनियम के तहत प्रतिबंधित कार्य
एनडीपीएस एक्ट (The Narcotic Drugs And Psychotropic Substances Act,1985) की धारा 8 सबसे महत्वपूर्ण धारा है, कुछ यूं समझ लिया जाए कि इस धारा के लिए ही सारा अधिनियम गढ़ा गया है। इस अधिनियम को बनाने का उद्देश्य नशीले पदार्थ को प्रतिबंधित करना था जो इस धारा 8 में कर दिया गया है। यह धारा इस अधिनियम का मील का पत्थर है। इस ही धारा में समस्त उन पदार्थों को प्रतिबिंबित कर दिया गया जिन्हें प्रतिबंधित करने के उद्देश्य से अधिनियम बनाया गया था। इस धारा में उन प्रतिबंधित पदार्थों का किसी भी तरह से व्यक्ति के...
एनडीपीएस एक्ट, 1985 भाग 2: अधिनियम के तहत दी गई परिभाषा
एनडीपीएस एक्ट (The Narcotic Drugs And Psychotropic Substances Act,1985) थोड़ा विस्तृत और तकनीकी विषय है। इसका परिभाषा खंड यदि ध्यानपूर्वक पढ़ लिया जाए तो इस अधिनियम को समझना आसान होगा। अधिनियम में प्रस्तुत किए गए प्रावधानों के अर्थ परिभाषा में मिल जाते है। इस अधिनियम की धारा 2 परिभाषा प्रस्तुत करती है। यह धारा अत्यंत विस्तृत धारा है जिसमे अधिकतर शब्दों के अर्थ स्पष्ट कर दिए गए हैं। इस आलेख के अंतर्गत स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 की धारा 2 का विस्तार से विश्लेषण किया जा रहा...
एनडीपीएस एक्ट, 1985 भाग 1: अधिनियम का संक्षिप्त परिचय
एनडीपीएस एक्ट (The Narcotic Drugs And Psychotropic Substances Act,1985) भारत के कठोर आपराधिक कानूनों में से एक है। इस एक्ट को विशेष वैज्ञानिक तरीके से एवं होने वाले अपराधों को ध्यान में रखते हुए नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के साथ गढ़ा गया है। नशा किसी भी समाज को पूरी तरह नष्ट कर देता है, यदि समाज ही नष्ट हो जाए तो फिर देश का कोई अर्थ नहीं रह जाता। व्यक्ति का शरीर प्राकृतिक रूप से ही नशे का अधीन हो जाता है फिर व्यक्ति का ऐसे नशे की पूर्ति के बगैर जीवित रह पाना एक प्रकार से असंभव हो जाता है। भारत...
आपराधिक अदालतों की शक्तियां
आपराधिक अदालतें आपराधिक मुकदमे सुनती है, इन अदालतों को कुछ शक्तियां दी गई है। इन शक्तियों में दंड देने की शक्तियां महत्वपूर्ण है। इस आलेख के अंतर्गत ऐसी ही शक्तियों का उल्लेख किया जा रहा है। आपराधिक अदालतों की अधिकारिता अर्थात दंड देने की शक्तियों का उल्लेख दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 26 से 31 तक में किया गया है।अपराधी का विचारण-संहिता की धारा 26 में अपराधों के विचारण के बारे में प्रावधान किया गया है। इसके अनुसार- भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की परिधि में आने वाले अपराधों का विचारण निम्नांकित...
आपराधिक अदालत किसे कहा गया है? जानिए प्रावधान
आपराधिक अदालतों को दंड न्यायालय कहा जाता है। यह ऐसी अदालत होती है जहां कोई आपराधिक मुकदमा चलाया जाता है और सिद्धदोष होने पर अभियुक्त को दंडित किया जाता है। इस आलेख में दंड प्रक्रिया संहिता के अधीन बनाई गई आपराधिक अदालतों पर चर्चा की जा रही है।दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 6 में दण्ड न्यायालयों के निम्नांकित वर्ग बताये गये हैं जो इस प्रकार है-(i) सेशन कोर्ट या सत्र न्यायालय(ii) प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट एवं महानगर मजिस्ट्रेट,(iii) द्वितीय वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट तथा(iv) कार्यपालक...
क्या आपराधिक मामलों में राजीनामा किया जा सकता है? जानिए प्रावधान
कोई भी आपराधिक प्रकरण पुलिस रिपोर्ट पर या व्यथित पक्षकार के मजिस्ट्रेट को दिए आवेदन पर संस्थित किया जाता है। आपराधिक प्रकरण दर्ज करवाने हेतु यह दो रास्ते एक पीड़ित व्यक्ति के पास होते हैं।कोई भी अपराध जब भी घटित होता तब वह राज्य के विरुद्ध होता है, किसी भी अपराध में केवल पीड़ित और अभियुक्त के बीच ही रिश्ता नहीं होता है अपितु राज्य पीड़ित के साथ होता है। पीड़ित के आवेदन पर राज्य अपनी ओर से आपराधिक प्रकरण दर्ज करता है। बड़े आपराधिक मामले में पीड़ित के पास यह अधिकार नहीं होता है कि वह अभियुक्त के साथ...
गवाहों का परीक्षण के लिए कमीशन कैसे निकाला जाता है?
सामान्यतः साक्षियों की परीक्षा न्यायालय में मजिस्ट्रेट अथवा पीठासीन न्यायाधीश के निदेशन में और अभियुक्त की उपस्थिति में की जाती है। यह एक सामान्य प्रचलन अर्थात् परिपाटी है, लेकिन कई बार ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती है कि साक्षी न्यायालय में उपस्थित नहीं हो पाता है अथवा उपस्थित होने में विलंभ,व्यय, अथवा असुविधा होने की संभावना रहती है।इस कारण कमीशन जारी किए जाते हैं और कमीशन के सामने गवाहों का परीक्षण होता है। इस आलेख में कानून के इस ही प्रावधान पर चर्चा की जा रही है।इससे मामले का विचारण एवं...
जमानत मुचलका किसे कहा जाता है? जानिए इससे संबंधित प्रावधान
प्रतिभूति एवं मुचलका जमानत से जुड़ा विषय है। किसी भी व्यक्ति को अदालत द्वारा एक निश्चित शर्त पर जेल से रिहा किया जाता है इसमे महत्वपूर्ण जमानत मुचलके होते हैं जो अभियुक्त की ओर से प्रस्तुत किये जाते हैं। यह अभियुक्त और प्रतिभूओं का बंध पत्र होता है। साधारण बोलचाल की भाषा में इसे 'जमानत मुचलके' कहा जाता है। जमानत प्रतिभू (Surety) द्वारा दी जाती है, जबकि मुचलका अभियुक्त की ओर से पेश किया जाता है। जमानत का आदेश प्रतिभू सहित या रहित हो सकता है। इस आलेख में इस ही अभियुक्त मुचलका एवं प्रतिभू द्वारा दिए...
कानूनों का निर्वचन किसे कहा गया है एवं इसके सिद्धांत क्या है
निर्वचन (Interpretation) को 'व्याख्या' अथवा 'अर्थान्ययन' भी कहा जाता है। न्याय निर्णयन में निर्वचन की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। संविधियों की व्याख्या न्याय निर्णयन को प्रभावित करती है। कानून में निर्वचनों के कुछ नियम है। कोई भी केस लॉ कानून की व्याख्या के बाद ही हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया जाता है। इस आलेख में कानूनों का निर्वचन क्या है और उसके नियम क्या है इस विषय पर चर्चा की जा रही है।निर्वाचन क्या हैन्यायालयों द्वारा संविधियों की भाषा, शब्दों एवं अभिव्यक्तियों के अर्थ- निर्धारण की...
आपराधिक कानून में नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का क्या महत्व है
कानून पार्लियामेंट द्वारा बनाया जाता है। इसे सामान्य बोध में विधायिका द्वारा कानून निर्माण कहा जाता है। लेकिन कानून केवल वही नहीं होता जो विधायिका द्वारा बना दिया जाए अपितु उसमे नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का भी दखल होता है। यह वैश्विक अवधारणा है कि कोई भी कानून इस प्रकार नहीं बनाया जाएगा कि उसमे नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का अभाव हो। न्याय प्रशासन में प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्तों का महत्वपूर्ण स्थान है। न्याय की सार्थकता प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्तों पर ही निर्भर करती है। प्राकृतिक न्याय...
केस लॉ किसे कहा गया है?
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पूर्व निर्णय अधीनस्थ न्यायालयों के निर्णय पर काफी वजन रखते है। किसी बड़ी अदालत का दिया कोई निर्णय उसकी अधीनस्थ अदालत पर लागू होता है, अधीनस्थ अदालत अपनी उच्च अदालत के दिए निर्णय से परे नहीं हो सकती, इसलिए कानून में पूर्व निर्णय अति महत्वपूर्ण हो जाते हैं। सामान्य बोलचाल की भाषा में इन्हें रुलिंग अथवा केस लॉ कहा जाता है। बहस के दौरान वकील द्वारा अपने-अपने पक्ष समर्थन में ऐसे निर्णय न्यायालय के समक्ष पेश किये जाते हैं जो न्यायनिर्णयन में न्यायालयों का मार्गदर्शन...
संक्षिप्त विचारण क्या होता है और किन मामलों में यह लागू होता है जानिए प्रावधान
आपराधिक मामलों का त्वरित विचारण आवश्यक है। विचारण में अत्यधिक विलम्ब से प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के मूल अधिकार का अतिक्रमण होता है। मामलों का उचित एवं त्वरित विचारण न्याय प्रशासन की एक अहम आवश्यकता एवं अपेक्षा है। यहां पर असमंजस की स्थिति का जन्म होता है क्योंकि एक तरफ उचित ट्रायल भी करना है और दूसरी तरफ मामलों को शीघ्र निपटाने की भी मांग है। कानूनी प्रक्रिया विशद होती है, उचित न्याय के लिए इस प्रक्रिया से गुजरना होता है। जल्दी विचारण समाप्त कर देगा थोड़ा कठिन कार्य है लेकिन दंड प्रक्रिया...
निःशुल्क विधिक सहायता के संबंध में कानून
निःशुल्क कानूनी सहायता प्रत्येक निर्धन व्यक्ति का अधिकार होता है। आपराधिक मामलों में यदि एक अभियुक्त को कानूनी मदद नहीं मिले और वे अपना बचाव नहीं कर पाए यह नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। आज के समय में न्याय अत्यंत खर्चीला है, ऐसे में एक निर्धन अभियुक्त अपने बचाव से विरत रह जाता है। इस समस्या से निपटने के लिए ही निःशुल्क विधिक सहायता की अवधारणा अस्तित्व में आई है। जहां एक निर्धन अभियुक्त को अपना बचाव करने के लिए सरकार द्वारा अपने खर्च से अधिवक्ता उपलब्ध कराया जाता है जो अभियुक्त की ओर...
अग्रिम जमानत से संबंधित कानून
भारतीय कानून में गिरफ्तारी के बाद ही नहीं अपितु गिरफ्तारी के पहले भी जमानत दिए जाने के प्रावधान है। दंड प्रक्रिया संहिता में ऐसी जमानत देने की शक्ति सेशन न्यायालय और उच्च न्यायालय को दी गई है। यह दोनों न्यायालय किसी अपराध में आरोपी को गिरफ्तारी के पूर्व ही जमानत दे सकते हैं। इस प्रावधान का मूल उद्देश्य असत्य रूप से मुकदमे में फंसाए गए आरोपी को जेल की पीड़ा से बचाना है। अगर न्यायालय किसी मुकदमे में यह पाता है कि अभियुक्त को गलत और असत्य आधारों पर फंसा दिया गया है और मामले में प्रथम दृष्टया कोई...
अजमानतीय अपराध की दशा में कब जमानत मिलती है
अजमानतीय अपराधों में अभियुक्त जमानत का एक अधिकार के रूप में दावा नहीं कर सकता है। ऐसे मामलों में जमानत देना या नहीं देना न्यायालय के विवेक पर निर्भर करता है। अपराधों को दो प्रकार में बांटा गया है पहला जमानतीय अपराध और अजमानतीय अपराध। जमानतीय अपराधों में अधिकारपूर्वक जमानत मिलती है जबकि अजमानतीय अपराध की दशा में जमानत देना न्यायालय के विवेक पर निर्भर करता है। इस आलेख में अजमानतीय अपराधों की दशा में कानून के संबंध में उल्लेख किया जा रहा है।दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 437 में इस संबंध में...
आपराधिक मामलों में पुनरीक्षण क्या होता है? जानिए प्रावधान
अपीलीय न्यायालय के पास केवल अपील की ही शक्ति नहीं होती है अपितु वह पुनरीक्षण और पुनर्विलोकन भी कर सकता है। आपराधिक मामलों में अपील के साथ पुनरीक्षण भी होता है, यहां भान रहे कि किसी भी आपराधिक मामले में पुनर्विलोकन की व्यवस्था नहीं है। किसी भी आपराधिक निर्णय, आदेश की केवल अपील हो सकती है या फिर पुनरीक्षण होता है। इस आलेख में पुनरीक्षण पर चर्चा की जा रही है।सिविल मामलों की तरह आपराधिक मामलों के पुनरीक्षण (Revision) की व्यवस्था भी की गई है। वस्तुतः पुनरीक्षण अपील का विकल्प है अर्थात् यह ऐसे मामलों...













