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एनडीपीएस एक्ट, 1985 भाग 1: अधिनियम का संक्षिप्त परिचय

Shadab Salim
22 Nov 2022 4:32 AM GMT
एनडीपीएस एक्ट, 1985 भाग 1: अधिनियम का संक्षिप्त परिचय
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एनडीपीएस एक्ट (The Narcotic Drugs And Psychotropic Substances Act,1985) भारत के कठोर आपराधिक कानूनों में से एक है। इस एक्ट को विशेष वैज्ञानिक तरीके से एवं होने वाले अपराधों को ध्यान में रखते हुए नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के साथ गढ़ा गया है। नशा किसी भी समाज को पूरी तरह नष्ट कर देता है, यदि समाज ही नष्ट हो जाए तो फिर देश का कोई अर्थ नहीं रह जाता। व्यक्ति का शरीर प्राकृतिक रूप से ही नशे का अधीन हो जाता है फिर व्यक्ति का ऐसे नशे की पूर्ति के बगैर जीवित रह पाना एक प्रकार से असंभव हो जाता है।

भारत की पार्लियामेंट का उद्देश्य नशे के व्यापार को रोकना है जिससे नशीले पदार्थ आम जनता तक पहुंच ही नहीं पाए, इसलिए इस अधिनियम में नशा करने वाले व्यक्ति को कम दंड का प्रावधान किया गया है लेकिन व्यापारिक उद्देश्यों से नशीली साम्रगी अपने पास रखने वाले व्यक्ति को कठोर से कठोर दंड दिए जाने के प्रावधान किए गए हैं। इस आलेख में एनडीपीएस एक्ट (स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985) का परिचय प्रस्तुत किया जा रहा है।

कोई भी नशीला पदार्थ इस एक्ट के अधीन बनाई गई सूची में प्रतिबंधित घोषित किया जाता रहता है। समय समय पर ऐसे उत्पाद सामने आते रहते हैं लेकिन कुछ नशीले पदार्थ आम है और जो अनेक वर्षों से जाने जाते रहे हैं। जैसे अफीम, गांजा इत्यादि। इस एक्ट को दो चीजों में बांटा गया है, पहला नारकोटिक्स ड्रग्स और दूसरा साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस।

ड्रग्स में कुछ दवाइयां है जो मानव जीवन बचाने के लिए ज़रूरी है और साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस उनका कच्चा रूप है उनसे ही उन दवाइयों को तैयार किया जाता है। इस एक्ट में इन दोनों ही चीज़ों प्रतिबंधित किया गया है और सरकार ने अपने नियंत्रण में रखा है। इसकी खेती से लेकर इसका कब्ज़ा तक पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में है।

नशे की लत देश की तरुणाई को अकाल मौत की ओर ढकेल रही है। हमारे देश के कर्णधार जिनके ऊपर देश का सर्वागीण विकास निर्भर है वही नशे की चपेट में इस हद तक आ गये हैं कि देश हित तो दूर वह स्वयं को भी संभाल पाने में असमर्थ हो रहे हैं। ऐसी दशा में इस नैतिक पतन से देश हित व लोक स्वास्थ्य को होने वाले खतरे के प्रति शासन का सजग होना अति आवश्यक था।

इसी भावना को ध्यान में रखते हुए एनडीपीएस एक्ट, 1985 की विरचना की गयी है। यह विधान एक ओर जहाँ दोषी व्यक्तियों को कठोर दंड प्रावधानित कराता है वहीं दूसरी और किसी निर्दोष को अकारण ही किसी की हठधर्मिता का शिकार न होना पड़े इस दृष्टि से उसके हित के प्रति समुचित संरक्षण भी उपलब्ध कराता है। व्यसनी व्यक्ति के हित का भी ध्यान रखा गया है।

इस एक्ट की प्रस्तावना कुछ इस प्रकार का संदेश देती है-

"स्वापक औषधियों से सम्बन्धित विधि का समेकन और संशोधन करने के लिए, स्वापक औषधियों और मनःप्रभावी पदार्थों से सम्बन्धित संक्रियाओं के नियन्त्रण और विनियमन के लिए स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थों के '[अवैध व्यापार से प्राप्त या उसमें प्रयुक्त सम्पत्ति के समपहरण का उपबन्ध करने के लिए, स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थों पर अन्तरराष्ट्रीय कन्वेंशन के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए] तथा उससे सम्बन्धित विषयों के लिए कड़े उपबन्ध करने के लिए अधिनियम"

भारत गणराज्य के छत्तीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो-

इस एक्ट की प्रस्तावना यह स्पष्ट कर देती है कि यह एक कठोर एक्ट है जो इंटरनेशनल स्तर पर हुए सुधारों को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है। यह एक्ट 1985 का 61 एक्ट है अर्थात 1985 में 61 संख्या पर इसे राष्ट्रपति द्वारा अनुमोदित किया गया है। 16 सितंबर 1985 से यह अनुमोदित हुआ है और कुछ हिस्से भिन्न भिन्न राज्यों के अनुसार लागू हुए है। यह एक्ट एक सेंट्रल एक्ट है और अब पूरी तरह समस्त भारत में लागू है। इस एक्ट में 83 सेक्शन और एक शेड्यूल है, इस एक्ट से संबंधित कई नियम और विनियम एवं अधिसूचना भी है लेकिन मूल एक्ट यही है, स्त्रोत इसे ही माना गया है।

यूनियन ऑफ इंडिया बनाम राम, 2000 (1) 18 सुप्रीम कोर्ट के मामले में भारत के सुप्रीम कोर्ट द्वारा एन डी पी एस संबंधी गतिविधियों पर चिंता व्यक्त की गई। सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्त किया कि इसके लिए बुद्धिमतता से पार्लियामेंट ने एन डी पी एस के रूप में विधान की विरचना की है जिसमें कि निरोध व जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

न्यूनतम निरोध व जुर्माने का इसमें आदेशात्मक प्रावधान किया गया है। स्वापक औषधि को नियंत्रित करने के लिए पार्लियामेंट ने यह प्रावधानित किया है कि एक्ट के अंतर्गत अपराध होने की दशा में अभियुक्त को विचारण के दौरान जमानत पर निर्मुक्त नहीं किया जाएगा जब तक कि अधिनियम की धारा 37 के आदेशात्मक तथ्यों की संतुष्टि न हो जाए।

स्वर्णकी बनाम स्टेट ऑफ केरल, 2006 क्रि. लॉ ज. 65 केरल के मामले में कहा गया है कि एन डी पी एस एक्ट के प्रावधानों से असंगत होने की दशा में दंड प्रक्रिया संहिता का संबंधित प्रावधान एक्ट के तहत कार्यवाही में प्रयोज्य नहीं होगा। इस मामले में व्यक्त किया गया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 58 की प्रक्रिया एन डी पी एस एक्ट के तहत गिरफ्तारी एवं निरुद्ध किए जाने के मामले में प्रयोज्य नहीं होती है क्योंकि यह अधिनियम के अन्य प्रावधानों से असंगत है।

जितेन्द्र पांचाल बनाम इंटेलीजेंस ऑफिसर एन.सी.बी. 2009 (1) सुप्रीम 777:2009 (1) के मामले में एन डी पी एस के संबंध में भारत में विचारण किया जा रहा था। आपराधिक कार्यवाही को आक्षेपित किया गया था। अभियुक्त की अमेरिका में की गई दोषसिद्धि एन डी पी एस जिसके संबंध में भारत में विचारण था से अलग थी।

मामले में न तो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 300 (1) और न ही भारतीय संविधान का अनुच्छेद 20 (ख) आकर्षित होना पाया गया। परिणामतः अभियुक्त के तर्क को अस्वीकार कर दिया गया। इस एक्ट में भारत से बाहर किये अपराधों का विचारण भी भारत में चलाया जा सकता है।

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