सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र
सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (20 अप्रैल, 2026 से 24 अप्रैल, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।
मस्जिद से जुड़ी 'सर्विस इनाम' ज़मीन वक्फ़ संपत्ति, इसे बेचा नहीं जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (24 अप्रैल) को कहा कि मस्जिदों से जुड़ी जिन ज़मीनों को 'सर्विस इनाम' कहा जाता है, वे वक्फ़ संपत्ति का हिस्सा होती हैं, और इसलिए उन्हें बेचा नहीं जा सकता।
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा, "यह बात बिना किसी विवाद के तय है कि धार्मिक या चैरिटी के कामों के लिए 'सर्विस इनाम' के तौर पर दी गई ज़मीनें दान की गई संपत्ति (Endowed Property) का रूप ले लेती हैं और उन पर सार्वजनिक या धार्मिक ट्रस्ट का अधिकार होता है, जिससे उन्हें बेचने या किसी और को देने पर रोक लग जाती है।"
Cause Title: A.P. STATE WAKF BOARD THROUGH CHAIRPERSON VERSUS JANAKI BUSAPPA
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पुलिस शिकायत वाले मामलों में आरोपी को तब तक गिरफ्तार नहीं कर सकती, जब तक समन के साथ-साथ गैर-जमानती वारंट जारी न हो जाए: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (23 अप्रैल) को बिहार और झारखंड में गंभीर प्रक्रियात्मक अनियमितता की ओर ध्यान दिलाया। कोर्ट ने पाया कि शिकायत वाले मामलों में मुकदमेबाज़ इस आशंका से सेशंस कोर्ट / हाई कोर्ट में अग्रिम ज़मानत के लिए जाते हैं कि केवल प्रक्रिया (process) जारी होने से ही उनकी गिरफ्तारी हो जाएगी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक बार प्रक्रिया जारी हो जाने के बाद मुकदमेबाज़ को केवल उस प्रक्रिया का पालन करना होता है, क्योंकि शिकायत वाले मामले में तब तक गिरफ्तारी नहीं हो सकती, जब तक प्रक्रिया को लागू करने के लिए गैर-जमानती वारंट जारी न किया गया हो।
Cause Title: OM PRAKASH CHHAWNIKA @ OM PRAKASH CHABNIKA @ OM PRAKASH CHAWNIKA VERSUS THE STATE OF JHARKHAND & ANR.
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अपील कोर्ट आरोपी की अपील के बिना भी सज़ा को पलट/बदल सकता है: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अगर आरोपी सज़ा को चुनौती देने वाली अपील नहीं भी करता है तो भी अपील कोर्ट को सज़ा पलटने से रोका नहीं जा सकता। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा, “अपील कोर्ट को यह अधिकार है कि वह ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज किए गए नतीजों और सज़ा की सच्चाई की जांच करे और न्याय के हित में उसे पलटे, बदले या पक्का करे।”
Cause Title: THE STATE OF ASSAM VERSUS MOINUL HAQUE @ MONU
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नगर सीमा निर्धारण का विवाद सिविल कोर्ट नहीं तय कर सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि नगर सीमा (Municipal Limits) के निर्धारण से जुड़े विवादों पर सिविल कोर्ट सुनवाई नहीं कर सकते, क्योंकि यह विषय संबंधित कानूनों के तहत तय किया जाता है और विधायी क्षेत्राधिकार में आता है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए यह स्पष्ट किया।
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यूपी ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम के तहत ज़मीन का वर्गीकरण बदलने का SDO के पास कोई अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 के तहत एक उप-विभागीय अधिकारी (SDO) के पास सार्वजनिक उपयोग की ज़मीन के तौर पर दर्ज ज़मीन का वर्गीकरण बदलने का कोई अधिकार नहीं है, ताकि उस पर भूमिधरी अधिकार दिए जा सकें।
कोर्ट ने टिप्पणी की, "वैसे भी, उन्मूलन अधिनियम उप-विभागीय अधिकारी को ज़मीन की श्रेणी बदलने का कोई अधिकार नहीं देता है ताकि उसे धारा 132 के निषेधात्मक दायरे से बाहर लाया जा सके। ज़मीन की श्रेणी में किसी भी बदलाव के लिए उन्मूलन अधिनियम में एकमात्र तरीका धारा 117(6) में बताया गया, जो राज्य सरकार—और केवल राज्य सरकार—को यह अधिकार देता है कि वह गाँव सभा से ज़मीन वापस ले ले और एक नई घोषणा करके ऐसी ज़मीन को किसी स्थानीय प्राधिकरण को सौंप दे।"
Case Title – Babu Singh v. Consolidation Officer and Others
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सिर्फ़ ज़्यादा क्वालिफ़िकेशन होना, कम-से-कम अनुभव की शर्त की जगह नहीं ले सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी विज्ञापित पद के लिए ज़रूरी क्वालिफ़िकेशन से सिर्फ़ इसलिए समझौता नहीं किया जा सकता, क्योंकि उम्मीदवार के पास उससे ज़्यादा क्वालिफ़िकेशन है। जस्टिस जे. के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने उम्मीदवार की अपील पर सुनवाई की। इस उम्मीदवार ने हिमाचल प्रदेश बोर्ड ऑफ़ स्कूल एजुकेशन के तहत कंप्यूटर हार्डवेयर इंजीनियर के पद के लिए आवेदन किया था।
हालाँकि उसने चयन प्रक्रिया में टॉप किया था और उसके पास M. Tech की डिग्री भी थी, लेकिन वह इस पद के लिए तय पाँच साल के काम के अनुभव की अनिवार्य शर्त को पूरा नहीं करती थी। फिर भी, उसने भर्ती और प्रमोशन नियमों के तहत काम के अनुभव में छूट की माँग की।
Cause Title: HIMAKSHI VERSUS RAHUL VERMA & ORS. (with connected matter)
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लगातार सेवा में छोटे-मोटे ब्रेक से एड-हॉक कर्मचारी रेगुलराइजेशन के लिए अयोग्य नहीं होगा: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एड-हॉक सेवा में सिर्फ़ छोटे-मोटे ब्रेक से सेवा की निरंतरता पर कोई असर नहीं पड़ेगा, जिससे कोई कर्मचारी सेवा के रेगुलराइजेशन के फ़ायदे के लिए अयोग्य हो जाए।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया, जिसमें अपील करने वालों को रेगुलराइजेशन देने से मना कर दिया गया था। इन लोगों को 1995-96 में पंजाब सरकार के वित्त विभाग में चपरासी और क्लर्क के तौर पर एड-हॉक आधार पर नियुक्त किया गया। उन्हें रेगुलराइजेशन से सिर्फ़ इस आधार पर मना किया गया कि उनके सर्विस रिकॉर्ड में 5 से 187 दिनों तक के ब्रेक दिख रहे थे।
Cause Title: PREM CHAND AND OTHERS VERSUS STATE OF PUNJAB AND ANOTHER