हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Update: 2026-01-31 15:30 GMT
High Courts

देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (26 जनवरी, 2026 से 30 जनवरी, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

S.395 IPC | डकैती के दोषियों को प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट के तहत फायदा नहीं मिलेगा: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 (PO Act) के तहत प्रोबेशन का फायदा उन लोगों को नहीं दिया जा सकता, जिन्हें IPC की धारा 395 के तहत डकैती के अपराध के लिए दोषी ठहराया गया, क्योंकि यह अपराध उम्रकैद की सज़ा के लायक है। PO Act की धारा 4 अदालतों को कुछ अपराधियों को, जो मौत की सज़ा या उम्रकैद के लायक अपराध के दोषी नहीं हैं, अच्छे व्यवहार की शर्त पर प्रोबेशन पर रिहा करने का अधिकार देती है।

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अगर सक्षम कोर्ट ने शादी रद्द कर दी है तो IPC की धारा 498A के तहत महिला के खिलाफ क्रूरता का अपराध लागू नहीं होगा: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में एक आदमी और उसकी मां के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत क्रूरता का अपराध करने के आरोप में शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने पाया कि एक सक्षम कोर्ट द्वारा शादी रद्द किए जाने के कारण उसके और शिकायतकर्ता के बीच कोई वैध शादी नहीं हुई। जस्टिस सी. प्रदीप कुमार शिकायतकर्ता के पति और सास द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें उनके खिलाफ कार्यवाही रद्द करने की मांग की गई।

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ECIR में बाद में FIR जोड़ने से ED की गिरफ्तारी अवैध नहीं होती: पंजाब-हरियाणा हाइकोर्ट

पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट ने रामप्रस्था प्रमोटर्स एंड डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड के प्रमोटर-डायरेक्टर्स द्वारा प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यदि किसी FIR को बाद में ECIR में जोड़ा जाता है तो उससे पहले की गई गिरफ्तारी अवैध नहीं हो जाती। जस्टिस त्रिभुवन दहिया ने कहा कि केवल इस आधार पर कि दो FIR बाद में एडेंडम के माध्यम से ECIR का हिस्सा बनाई गईं, याचिकाकर्ताओं की गिरफ्तारी को दोषपूर्ण नहीं ठहराया जा सकता।

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18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों से सिर्फ दोस्ताना रिश्ते भी कानूनन मंज़ूर नहीं, इसी वजह से कई युवा जेलों में सड़ रहे हैं: गुजरात हाईकोर्ट

गुजरात हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में एक नाबालिग लड़की के कथित अपहरण के मामले में दो युवकों की सजा को रद्द करते हुए कहा कि वे 'गुड समैरिटन' (Good Samaritans) थे, जिन्होंने संकट में फंसी लड़की की मदद की, लेकिन इसके बदले उन्हें जेल जाना पड़ा। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ किसी भी प्रकार के संबंध— यदि वह मित्रतापूर्ण हों—को कानून की मंजूरी न होने के कारण कई युवा सख्त कानूनों के तहत जेलों में सड़ रहे हैं।

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कर्ज की वापसी की मांग को आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता: मध्यप्रदेश हाइकोर्ट

मध्यप्रदेश हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति द्वारा अपने कर्ज की रकम वापस मांगना या उसके बदले मृतक की मोटरसाइकिल अपने पास रखना, आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं माना जा सकता। हाइकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत लगाए गए आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप रद्द कर दिया।

जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की एकल पीठ ने कहा कि आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध तभी बनता है जब आरोपी की मंशा स्पष्ट रूप से मृतक को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने की हो। केवल कर्ज की वापसी की मांग को ऐसी मंशा नहीं माना जा सकता।

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चेक बाउंस मामले में यदि आरोपी की दलील प्रथम दृष्टया विश्वसनीय हो तो अंतरिम मुआवजा नहीं दिया जा सकता: गुवाहाटी हाइकोर्ट

गुवाहाटी हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि चेक बाउंस मामले में ऐसे विवादित तथ्य हों जिनका निपटारा साक्ष्यों के माध्यम से किया जाना आवश्यक हो, तो उस अवस्था में परक्राम्य लिखत अधिनियम (NI Act) की धारा 143-ए के तहत अंतरिम मुआवजा देना उचित नहीं होगा। जस्टिस प्रांजल दास ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें आरोपी को चेक राशि का 20 प्रतिशत अंतरिम मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था। हाइकोर्ट ने कहा कि अंतरिम मुआवजा देने से पहले कोर्ट का यह संतुष्ट होना आवश्यक है कि शिकायतकर्ता के पक्ष में प्रथम दृष्टया मामला बनता है।

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Article 21 | आपात स्थिति में गैर-सूचीबद्ध अस्पताल में इलाज पर मेडिकल रिइम्बर्समेंट से इनकार नहीं किया जा सकता: पंजाब-हरियाणा हाइकोर्ट

पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट ने हरियाणा सरकार को निर्देश दिया कि वह एक सरकारी कर्मचारी की पत्नी के आपातकालीन इलाज पर गैर-सूचीबद्ध निजी अस्पताल में हुए शेष मेडिकल खर्च का भुगतान करे। हाइकोर्ट ने कहा कि बिना कारण बताए मेडिकल रिइम्बर्समेंट से इनकार करना मनमाना है और यह संविधान के आर्टिकल 21 के तहत जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।

जस्टिस संदीप मौदगिल ने कहा कि जीवन-रक्षक आपात परिस्थितियों में मरीज या उसके परिजन के पास PGIMER जैसे सरकारी अस्पताल में भर्ती होने की प्रतीक्षा करने का कोई वास्तविक विकल्प नहीं होता। आर्टिकल 21 के तहत जीवन का अधिकार समय पर और प्रभावी मेडिकल उपचार की गारंटी देता है। ऐसी स्थिति में यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी की जान बचाने के लिए मजबूरी में निजी अस्पताल में इलाज कराता है तो उसे पूरे खर्च की प्रतिपूर्ति से वंचित करना परिस्थितियों के लिए दंडित करने के समान है।

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बिना जांच के प्रोबेशनरी टीचर को नौकरी से निकालने के लिए स्टूडेंट को 'रोमांटिक' मैसेज भेजना काफी: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में यह फैसला सुनाया कि अगर कोई प्रोबेशन पर टीचर स्कूल के घंटों के बाद किसी स्टूडेंट के साथ लगातार मैसेजिंग करता है, जो उत्पीड़न के बराबर हो सकता है, ऐसी स्थिति में स्कूल मैनेजमेंट महाराष्ट्र प्राइवेट स्कूल कर्मचारी (सेवा की शर्तें) रेगुलेशन एक्ट, 1977 के प्रावधानों का इस्तेमाल करके बिना किसी जांच वगैरह के टीचर की सर्विस खत्म कर सकता है।

सिंगल-जज जस्टिस सोमशेखर सुंदरेशन ने गावित गुलाबसिंह सुका की याचिका पर सुनवाई की, जिन्होंने रायगढ़ जिले के म्हासाला के स्कूल के फैसले को चुनौती दी थी, जिसने 1 फरवरी, 2023 से उनकी प्रोबेशनरी सर्विस खत्म की और उन्हें एक महीने के नोटिस के बदले पेमेंट दिया गया।

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बार एसोसिएशन 'नियोक्ता' नहीं, POSH Act के अनुसार इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी का गठन नहीं कर सकता: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि कोल्लम बार एसोसिएशन द्वारा इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी (ICC) का गठन कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 [POSH Act] के उद्देश्य और आवश्यकता के खिलाफ है। जस्टिस पी.एम. मनोज ने तर्क दिया कि एक बार एसोसिएशन एक्ट के अर्थ में 'नियोक्ता' नहीं है। इसलिए गठित ICC एक्ट के अनुसार नहीं है।

उन्होंने कहा: “बार एसोसिएशन के संबंध में एकमात्र उल्लेख केरल एडवोकेट्स वेलफेयर फंड एक्ट, 1980 में मिलता है। वह पूरी तरह से उन व्यक्तियों का रोल बनाए रखने के उद्देश्य से है, जो केरल बार काउंसिल के रोल में भी हैं... नियोक्ता का गठन करने वाला प्राधिकरण अनिवार्य रूप से वह व्यक्ति होता है, जो अपने कर्मचारियों के संबंध में संविदात्मक दायित्वों का निर्वहन करता है। जहां तक एक वकील का संबंध है, याचिकाकर्ता की भूमिका उक्त प्रावधानों में उल्लिखित किसी भी प्राधिकरण के तहत योग्य नहीं है। इसलिए ICC का गठन POSH Act की धारा 4 के जनादेश के तहत योग्य नहीं है।”

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ऑनलाइन मानहानि का मुकदमा केवल वहीं चलेगा, जहां प्रतिवादी स्थित हो या जहां वास्तविक नुकसान हुआ हो: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाइकोर्ट ने आईआरएस अधिकारी समीर ज्ञानदेव वानखेड़े द्वारा नेटफ्लिक्स की वेब सीरीज़ Ba***ds of Bollywood के खिलाफ दायर मानहानि वाद को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि ऑनलाइन मानहानि का मुकदमा केवल उसी न्यायालय में दायर किया जा सकता है, जहां प्रतिवादी स्थित हो या जहां वास्तव में प्रतिष्ठा को क्षति पहुंची हो। अदालत ने यह भी दोहराया कि इंटरनेट पर सामग्री की हर जगह उपलब्धता मात्र से किसी भी मंच पर मुकदमा दायर करने का असीमित अधिकार नहीं मिल जाता।

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नोटरी के समक्ष दिए गए हलफनामे से विवाह विच्छेद संभव नहीं: गुवाहाटी हाईकोर्ट

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी विवाह को केवल नोटरी के समक्ष दिए गए हलफनामे के माध्यम से भंग नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 के प्रावधानों का विधिवत पालन किए जाने का कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया जाता, तब तक केवल एक नोटरीकृत हलफनामे के आधार पर तलाक का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

जस्टिस प्रांजल दास ने यह टिप्पणी उस आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें बारपेटा के प्रधान जज, फैमिली कोर्ट द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत पति को पत्नी को 3,000 प्रति माह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया।

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प्रोबेशन पर कार्यरत कर्मचारी भी 'वर्कमैन'; बर्खास्तगी वैध होने पर भी धारा 17-B का वेतन वापस नहीं लिया जा सकता: दिल्ली हाइकोर्ट

दिल्ली हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रोबेशन पर कार्यरत कर्मचारी भी औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 2(स) के अंतर्गत वर्कमैन की परिभाषा में आते हैं। हाइकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी प्रोबेशनरी कर्मचारी की सेवाएं साधारण बर्खास्तगी के रूप में बिना कलंक लगाए समाप्त की जाती हैं, तो उसके लिए पूर्ण विभागीय जांच आवश्यक नहीं है और ऐसी बर्खास्तगी कानूनन वैध मानी जाएगी। चीफ जस्टिस डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की पीठ ने एकल जज के आदेश में आंशिक संशोधन करते हुए यह फैसला सुनाया।

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भर्ती विज्ञापन में शर्त न होने पर पीजी अतिरिक्त पंजीयन के आधार पर डॉक्टरों को नहीं कर सकता खारिज: मध्यप्रदेश हाइकोर्ट

मध्यप्रदेश हाइकोर्ट ने मेडिकल ऑफिसर (ग्रेड-I) और विशेषज्ञ डॉक्टरों की भर्ती प्रक्रिया में मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा अभ्यर्थियों की उम्मीदवारी खारिज किए जाने को असंवैधानिक करार देते हुए स्पष्ट किया कि भर्ती विज्ञापन में उल्लेख न की गई किसी अतिरिक्त योग्यता के आधार पर उम्मीदवारों को बाहर नहीं किया जा सकता।

जस्टिस जय कुमार पिल्लई की एकल पीठ ने मंगलवार को डॉक्टरों द्वारा दायर याचिकाओं के समूह को स्वीकार करते हुए कहा कि दस्तावेज़ सत्यापन या अस्थायी परिणाम घोषित होने के बाद किसी नई योग्यता की शर्त लागू करना “खेल शुरू होने के बाद नियम बदलने” के समान है, जो निष्पक्षता, पारदर्शिता और वैध अपेक्षा के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।

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POCSO Act | झूठे यौन उत्पीड़न के आरोप पर धारा 22 के तहत अभियोजन नहीं चलेगा: केरल हाइकोर्ट

केरल हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि POCSO Act की धारा 22 के तहत झूठी शिकायत के लिए अभियोजन केवल उन्हीं मामलों में चलाया जा सकता है, जहां झूठी सूचना अधिनियम की धारा 3, 5, 7 या 9 के अंतर्गत आने वाले गंभीर यौन अपराधों से संबंधित हो। केवल 'यौन उत्पीड़न' (धारा 12) से जुड़े कथित झूठे आरोप पर धारा 22 के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती।

जस्टिस सी. प्रतीप कुमार ने यह निर्णय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका में दो व्यक्तियों के विरुद्ध POCSO Act की धारा 22 के अंतर्गत शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गई।

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बिना बच्चों वाली विधवा को दोबारा शादी के बाद भी फैमिली पेंशन मिलते रहने वाला नियम उचित: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंट्रल सिविल सर्विसेज (पेंशन) रूल्स, 1972 के नियम 54 की संवैधानिक वैधता को सही ठहराया, जिसके तहत बिना बच्चों वाली विधवा को दोबारा शादी के बाद भी फैमिली पेंशन मिलती रहेगी।

जस्टिस अनिल क्षत्रपाल और जस्टिस अमित महाजन की डिवीजन बेंच ने एक मृत CRPF जवान के माता-पिता द्वारा दायर एक रिट याचिका खारिज की, जिसमें उन्होंने अपने बेटे की विधवा की दोबारा शादी के बाद खुद को फैमिली पेंशन देने की मांग की थी।

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म्यूटेशन की कार्यवाही तय करने वाला 'कार्यकारी अधिकारी' जजों (संरक्षण) अधिनियम, 1985 के उद्देश्यों के लिए 'जज' है: पटना हाईकोर्ट

पटना हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि पटना नगर निगम में कार्यकारी अधिकारी, म्यूटेशन की कार्यवाही तय करते समय, जजों (संरक्षण) अधिनियम, 1985 के दायरे में आएगा। कोर्ट ने साफ किया कि कोई भी व्यक्ति जो कानूनी कार्यवाही के दौरान, एक निश्चित और निर्णायक फैसला देने के लिए कानूनी रूप से अधिकृत है, उसे 1985 के अधिनियम के उद्देश्यों के लिए 'जज' माना जाएगा।

जस्टिस संदीप कुमार की बेंच ने इस तरह CrPC की धारा 482 के तहत याचिका को मंज़ूरी दी, जिसमें बिहार सरकार के कानून विभाग द्वारा IPC की धारा 420, 467, 468, 471, और 120-B के तहत दी गई अभियोजन की मंज़ूरी को रद्द करने की मांग की गई।

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धारा 215 BNSS | न्यायालयीन कार्यवाही से जुड़े अपराधों में पुलिस सीधे FIR दर्ज नहीं कर सकती; अभियोजन की पहल न्यायालय को ही करनी होगी: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि किसी न्यायालयीन कार्यवाही के दौरान या उससे संबंधित अपराध किए जाने का आरोप हो, तो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 215 और 379 में निर्धारित प्रक्रिया का कड़ाई से पालन किया जाना अनिवार्य है। ऐसे मामलों में संबंधित न्यायालय को पहले स्वयं अपना विवेक लागू करना होगा और लिखित शिकायत किए बिना पुलिस को सीधे एफआईआर दर्ज करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।

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