ऑनलाइन मानहानि का मुकदमा केवल वहीं चलेगा, जहां प्रतिवादी स्थित हो या जहां वास्तविक नुकसान हुआ हो: दिल्ली हाईकोर्ट
Amir Ahmad
29 Jan 2026 3:40 PM IST

दिल्ली हाइकोर्ट ने आईआरएस अधिकारी समीर ज्ञानदेव वानखेड़े द्वारा नेटफ्लिक्स की वेब सीरीज़ Ba***ds of Bollywood के खिलाफ दायर मानहानि वाद को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि ऑनलाइन मानहानि का मुकदमा केवल उसी न्यायालय में दायर किया जा सकता है, जहां प्रतिवादी स्थित हो या जहां वास्तव में प्रतिष्ठा को क्षति पहुंची हो।
अदालत ने यह भी दोहराया कि इंटरनेट पर सामग्री की हर जगह उपलब्धता मात्र से किसी भी मंच पर मुकदमा दायर करने का असीमित अधिकार नहीं मिल जाता।
जस्टिस पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने कहा कि ऑनलाइन मानहानि से जुड़े मामलों में क्षेत्राधिकार तय करने के लिए यह देखना आवश्यक है कि कथित गलत कार्य कहां हुआ और वादी की प्रतिष्ठा को वास्तविक रूप से कहां नुकसान पहुंचा।
अदालत ने इस संदर्भ में अपने पूर्व निर्णय एस्कोर्ट बनाम तेजपाल सिंह सिसोदिया पर भरोसा किया, जिसमें ऑनलाइन मानहानि मामलों में क्षेत्राधिकार के सिद्धांत तय किए गए।
अदालत ने सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 19 का विश्लेषण करते हुए कहा कि इसमें गलत कार्य किए जाने के स्थान की बात की गई, न कि उस स्थान की जहां नुकसान होने की केवल आशंका हो।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिस स्थान पर वादी की कोई सामाजिक या पेशेवर प्रतिष्ठा ही नहीं है, वहां मानहानि का दावा नहीं किया जा सकता। अन्यथा यह केवल स्वयं की नजरों में आत्मसम्मान की क्षति होगी, न कि समाज की दृष्टि में प्रतिष्ठा का नुकसान।
समीर वानखेड़े, जो वर्तमान में चेन्नई में पदस्थ हैं और मुंबई के निवासी हैं, ने तर्क दिया कि दिल्ली में भी विवादित सामग्री देखी जा सकती है, जिससे राजधानी में उनके सीनियर अधिकारियों और सहयोगियों के बीच उनकी छवि प्रभावित हुई। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने कहा कि यदि कोई राष्ट्रीय स्तर की कंपनी, राजनेता या प्रसिद्ध व्यक्ति है, जिसकी प्रतिष्ठा देश के कई हिस्सों में है तो कुछ मामलों में यह आवश्यक नहीं हो सकता कि वह यह विशेष रूप से बताए कि किन-किन व्यक्तियों की नजर में उसकी प्रतिष्ठा घटी है। लेकिन यह सिद्धांत हर मामले में स्वतः लागू नहीं हो सकता।
जस्टिस कौरव ने यह भी कहा कि यदि कोई वाद क्षेत्राधिकार के अभाव में खारिज या वापस किया जाना चाहिए तो केवल चतुर ड्राफ्टिंग के जरिए उसे किसी विशेष अदालत में बनाए रखने की कोशिश स्वीकार्य नहीं है। यदि वादी जानबूझकर ऐसे तथ्यों को छुपाता है, जिनसे यह स्पष्ट होता है कि गलत कार्य उस स्थान पर भी हुआ है, जहां प्रतिवादी रहता है तो अदालत का दायित्व है कि वह वाद को सक्षम न्यायालय में प्रस्तुत करने के लिए वापस कर दे।
वानखेड़े ने यह भी दलील दी थी कि आरपीजी मीडिया ने एक वीडियो अपलोड किया, जिसमें उन्हें “इडियट” कहा गया। चूंकि यह संस्था दिल्ली में व्यवसाय करती है, इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट को क्षेत्राधिकार प्राप्त है।
इसके विपरीत, नेटफ्लिक्स ने तर्क दिया कि आरपीजी मीडिया को केवल मंच चयन के उद्देश्य से प्रतिवादी बनाया गया।
आरपीजी मीडिया की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि “आरपीएसजी लाइफस्टाइल मीडिया प्राइवेट लिमिटेड” नाम की कोई कानूनी इकाई अस्तित्व में ही नहीं है। वास्तविक कंपनी “बिज़नेस मीडिया प्राइवेट लिमिटेड” है, जो केवल एक ट्रेड नाम के तहत मीडिया डिवीजन संचालित करती है।
अदालत ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि आरपीजी लाइफस्टाइल मीडिया प्राइवेट लिमिटेड एक वैध कानूनी इकाई नहीं है।
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि आरपीजी मीडिया न तो इस वेब सीरीज़ की निर्माता थी और न ही प्रकाशक, जबकि मुख्य प्रतिवादी रेड चिलीज़ एंटरटेनमेंट और नेटफ्लिक्स दोनों मुंबई में स्थित हैं।
अदालत ने टिप्पणी की कि आरपीजी मीडिया को पक्षकार बनाना तेजपाल फैसले में निर्धारित शर्तों से बचने का प्रयास प्रतीत होता है।
अदालत ने कहा कि यदि गलत कार्य प्रतिवादी के निवास या व्यवसाय स्थल के अधिकार क्षेत्र में भी हुआ है तो वादी को उसी स्थान पर मुकदमा दायर करना होगा और किसी अन्य स्थान पर नहीं। इसे अदालत ने “मर्जर रूल” का अनुप्रयोग बताया।
अंततः हाईकोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि चूंकि वानखेड़े स्वयं मुंबई के निवासी हैं। मुख्य प्रतिवादी भी मुंबई में स्थित हैं और कथित मानहानि का नुकसान भी वहीं हुआ है, इसलिए इस मामले की सुनवाई का अधिकार केवल मुंबई की अदालतों को है।
इसी आधार पर दिल्ली हाइकोर्ट ने वाद को सुनने से इनकार करते हुए खारिज कर दिया।

