नोटरी के समक्ष दिए गए हलफनामे से विवाह विच्छेद संभव नहीं: गुवाहाटी हाईकोर्ट

Amir Ahmad

29 Jan 2026 2:48 PM IST

  • नोटरी के समक्ष दिए गए हलफनामे से विवाह विच्छेद संभव नहीं: गुवाहाटी हाईकोर्ट

    गुवाहाटी हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी विवाह को केवल नोटरी के समक्ष दिए गए हलफनामे के माध्यम से भंग नहीं किया जा सकता।

    हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 के प्रावधानों का विधिवत पालन किए जाने का कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया जाता, तब तक केवल एक नोटरीकृत हलफनामे के आधार पर तलाक का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस प्रांजल दास ने यह टिप्पणी उस आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें बारपेटा के प्रधान जज, फैमिली कोर्ट द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत पति को पत्नी को 3,000 प्रति माह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया।

    हाइकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि प्रतिवादी महिला का पूर्व विवाह विधिक रूप से समाप्त हुआ था, यह साबित नहीं किया जा सका।

    हाइकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यह निर्विवाद है कि किसी विवाह को नोटरी के समक्ष दिए गए हलफनामे से भंग नहीं किया जा सकता।

    न्यायालय ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, जिससे यह दर्शाया जा सके कि प्रतिवादी ने अपने पूर्व पति मणिक अली के साथ वैवाहिक संबंध समाप्त करने के लिए मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939 के अंतर्गत कोई प्रक्रिया अपनाई हो।

    इसके विपरीत, उसने केवल यह कहा कि उसने अपनी ओर से तलाक दे दिया। इसके समर्थन में एक हलफनामे की प्रति प्रस्तुत करने की बात कही, जबकि मूल हलफनामा उसके पास ही रखा गया।

    हाइकोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि प्रतिवादी का मणिक अली के साथ पूर्व विवाह एक स्वीकार्य तथ्य है, लेकिन फैमिली कोर्ट की कार्यवाही के दौरान वह यह साबित करने में असफल रही कि उक्त विवाह विधिक रूप से भंग हो चुका है और वह अब मणिक अली की कानूनी पत्नी नहीं रही।

    मामले के तथ्यों के अनुसार प्रतिवादी पत्नी ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण की मांग करते हुए यह दावा किया था कि उसका विवाह याचिकाकर्ता से इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ, वह उसके साथ रही और बाद में उत्पीड़न व धन की मांग के चलते उसे घर से निकाल दिया गया।

    वहीं, याचिकाकर्ता पति ने वैवाहिक संबंध से इनकार करते हुए कहा कि प्रतिवादी का पूर्व विवाह विधिक रूप से समाप्त नहीं हुआ था।

    साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए हाइकोर्ट ने यह भी नोट किया कि प्रतिवादी ने जिरह के दौरान स्वयं स्वीकार किया कि उसने वर्ष 2000 में याचिकाकर्ता से विवाह किया और उससे तीन बच्चे हुए। उसने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने उसे तलाक नहीं दिया था, बल्कि उसने स्वयं वर्ष 2017 में तलाक दिया था।

    हालांकि दोनों पक्षों ने तलाक से संबंधित एक हलफनामे की फोटोप्रति का उल्लेख किया, लेकिन हाइकोर्ट ने पाया कि उक्त दस्तावेज़ को न तो विधिवत प्रदर्शित किया गया और न ही उसे साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया गया।

    न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल जिरह में ऐसे हलफनामे का उल्लेख करना या उसकी प्रति प्रस्तुत करने की बात करना, पूर्व विवाह के विधिक विच्छेद का पर्याप्त प्रमाण नहीं माना जा सकता।

    इसके अलावा, किसी भी स्थिति में नोटरी के समक्ष दिया गया ऐसा हलफनामा विवाह विच्छेद का वैध आधार नहीं हो सकता।

    इन परिस्थितियों में हाइकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने इस महत्वपूर्ण पहलू की अनदेखी करते हुए प्रतिवादी को याचिकाकर्ता की पत्नी मान लिया जो एक गंभीर त्रुटि है।

    न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि प्रतिवादी स्वयं को याचिकाकर्ता की विधिक पत्नी सिद्ध नहीं कर सकी। इसलिए वह उससे भरण-पोषण की हकदार नहीं है।

    इसके परिणामस्वरूप गुवाहाटी हाइकोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा पारित भरण-पोषण का आदेश रद्द और निरस्त करते हुए पुनर्विचार याचिका स्वीकार कर ली।

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