हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Update: 2026-04-25 15:30 GMT

देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (20 अप्रैल, 2026 से 24 अप्रैल, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

अपनी खुद की शैक्षणिक योग्यता के बारे में गलत घोषणा करना RP Act की धारा 123(4) के तहत 'भ्रष्ट आचरण' नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि नामांकन हलफनामे में अपनी खुद की शैक्षणिक योग्यता के बारे में गलत घोषणा करना, Representation of the People Act, 1951 की धारा 123(4) के तहत "भ्रष्ट आचरण" नहीं माना जाएगा।

जस्टिस दिनेश मेहता और जस्टिस विनोद कुमार की एक डिवीज़न बेंच ने यह टिप्पणी तब की, जब वे 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में करोल बाग विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार के चुनाव को चुनौती देने वाली एक चुनाव याचिका से जुड़े एक संदर्भ का जवाब दे रहे थे।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

ब्लैकलिस्टिंग के 'कारण बताओ नोटिस' के खिलाफ कोई रिट याचिका दायर नहीं की जा सकती': पटना हाईकोर्ट

पटना हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि ब्लैकलिस्टिंग की कार्यवाही शुरू करने वाले 'कारण बताओ नोटिस' को आम तौर पर अनुच्छेद 226 के तहत चुनौती नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने इस बात को दोहराया कि जिस अधिकारी के पास अंतिम फैसला लेने की शक्ति है, वह प्रक्रिया शुरू करने के लिए भी उतना ही सक्षम है।

जस्टिस सुधीर सिंह और जस्टिस शैलेंद्र सिंह की एक डिवीज़न बेंच रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में 17.03.2026 को इंजीनियर-इन-चीफ-सह-रजिस्टरिंग अथॉरिटी द्वारा जारी किए गए एक 'कारण बताओ नोटिस' को चुनौती दी गई थी। इस नोटिस में टेंडर प्रक्रिया के दौरान कथित तौर पर गलत जानकारी देने के आरोप में याचिकाकर्ता को ब्लैकलिस्ट करने का प्रस्ताव रखा गया था।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के आदेश के खिलाफ हेबियस कॉर्पस याचिका नहीं चलेगी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के आदेश के तहत रखा गया तो उसके खिलाफ हेबियस कॉर्पस याचिका दाखिल नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में विधि के तहत अलग से अपील और पुनरीक्षण का प्रावधान मौजूद है।

जस्टिस संदीप जैन ने सुनवाई के दौरान कहा कि जब किसी व्यक्ति की हिरासत किसी सक्षम प्राधिकरण या चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के वैध आदेश के आधार पर होती है तो उसे हेबियस कॉर्पस याचिका के माध्यम से चुनौती नहीं दी जा सकती।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

महिला की संपत्ति पर भाई का दावा खारिज, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत पति के वारिसों को प्राथमिकता: बॉम्बे हाईकोर्ट का अहम फैसला

बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15(1) पूरी तरह लागू है और जब तक इसे असंवैधानिक घोषित नहीं किया जाता इसका पालन अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि किसी महिला की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति के उत्तराधिकार का क्रम इसी प्रावधान के अनुसार तय होगा।

जस्टिस फिरदौस पी. पूनीवाला ने यह फैसला उस अंतरिम आवेदन पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें मृत महिला के भाई ने खुद को एकमात्र वारिस बताते हुए संपत्ति के प्रबंधन का अधिकार मांगा था और अन्य पक्षों को संपत्ति से छेड़छाड़ करने से रोकने की मांग की थी।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

असम CM की पत्नी की FIR: गुवाहाटी हाईकोर्ट ने पवन खेड़ा को अग्रिम ज़मानत देने से किया इनकार

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज की। यह याचिका असम के CM हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी, रिनिकी भुइयां सरमा द्वारा दायर एक FIR के संबंध में थी, जिसमें रिनिकी पर कई पासपोर्ट रखने के आरोप लगाए गए थे। जस्टिस पार्थिवज्योति सैकिया की बेंच ने 21 अप्रैल को दोनों पक्षों की विस्तृत सुनवाई के बाद अपना अंतिम आदेश सुरक्षित रख लिया था।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

लेटर ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन जारी करने के लिए पूरी कोर्ट फीस तभी देनी होगी, जब अर्जी मंजूर हो जाए: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि जब लेटर ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन जारी करने के लिए अर्जी दी जाती है तो सिर्फ़ 25 रुपये की कोर्ट फीस देनी होती है। कोर्ट ने कहा कि पूरी कोर्ट फीस तभी देनी होगी, जब कोर्ट उस अर्जी को मंजूर कर ले।

जस्टिस संदीप जैन ने फैसला दिया: “इंडियन सक्सेशन एक्ट की धारा 276 के तहत लेटर ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन मांगने वाली अर्जी देते समय 25 रुपये की टोकन राशि देनी होती है, और जब कोर्ट उस अर्जी को मंजूर कर लेता है, तभी याचिकाकर्ता को लेटर ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन असल में जारी करवाने के लिए पूरी कोर्ट फीस जमा करनी होती है। यह साफ़ है कि याचिकाकर्ता को लेटर ऑफ़ एडमिनिस्ट्रेशन जारी करवाने के लिए ऊपर बताई गई अर्जी देते समय पूरी फीस जमा करने की ज़रूरत नहीं है।”

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

जाति प्रमाण पत्र रद्द करने से पहले 'कारण बताओ नोटिस' देने की शर्त सिर्फ़ फ़ोन कॉल करने से पूरी नहीं होती: उत्तराखंड हाईकोर्ट

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फ़ैसला दिया कि किसी व्यक्ति को सिर्फ़ फ़ोन कॉल करना, जाति प्रमाण पत्र रद्द करने से पहले 'कारण बताओ नोटिस' जारी करने की शर्त को पूरा नहीं करता। कोर्ट ने कहा कि जाति प्रमाण पत्र रद्द करने से, जिससे नागरिक अधिकार मिलते हैं, प्रभावित व्यक्ति को सुनवाई का उचित और सही मौक़ा मिलना ज़रूरी है।

जस्टिस पंकज पुरोहित रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस याचिका में तहसीलदार द्वारा 09.07.2025 को जारी उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें याचिकाकर्ता का OBC जाति प्रमाण पत्र रद्द किया गया था। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि प्रमाण पत्र रद्द करने से पहले उसे सुनवाई का कोई मौक़ा नहीं दिया गया।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

CrPC की धारा 125 के तहत अंतिम भरण-पोषण आदेश हिंदू विवाह अधिनियम के तहत अंतरिम राहत पर प्रभावी होगा: कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक ही अवधि के लिए पति पर दो अलग-अलग मामलों में भरण-पोषण का बोझ नहीं डाला जा सकता। अदालत ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत दिया गया अंतिम भरण-पोषण आदेश हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) की धारा 24 के तहत दिए गए अंतरिम भरण-पोषण आदेश पर प्राथमिकता रखेगा।

जस्टिस डॉ. के. मनमधा राव की सिंगल बेंच ने कहा कि धारा 125 के तहत पारित आदेश साक्ष्यों के आधार पर अंतिम निर्णय होता है।इसलिए इसे प्रमुखता दी जानी चाहिए।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

कल्याणकारी योजना के तहत आंगनवाड़ी सेविका के पद पर चयन से कोई लागू करने योग्य वैधानिक अधिकार नहीं मिलता: पटना हाईकोर्ट

पटना हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) योजना के तहत आंगनवाड़ी सेविका के पद पर चयन या नियुक्ति से कोई लागू करने योग्य वैधानिक अधिकार नहीं मिलता। ऐसे चयन से जुड़े विवादों में आमतौर पर रिट अधिकार क्षेत्र के तहत हस्तक्षेप की ज़रूरत नहीं होती है।

जस्टिस सुधीर सिंह और जस्टिस शैलेंद्र सिंह की डिवीज़न बेंच 10.02.2023 को सिंगल जज द्वारा C.W.J.C. No. 10524 of 2017 में दिए गए फैसले को चुनौती देने वाली इंट्रा-कोर्ट अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें अपीलकर्ता द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया गया था।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

पहली मैटरनिटी लीव के 2 साल के अंदर दूसरी मैटरनिटी लीव पर कोई रोक नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि पहली मैटरनिटी लीव के 2 साल के अंदर किसी महिला द्वारा दूसरी मैटरनिटी लीव मांगने पर कोई रोक नहीं है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के पिछले फैसले, 'अनुपम यादव और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य' पर भरोसा करते हुए जस्टिस करुणेश सिंह पवार ने कहा, "अनुपम यादव (उपर्युक्त) मामले में जैसा कि फैसले को पढ़ने से साफ पता चलता है, किसी कर्मचारी के लिए पहली मैटरनिटी लीव मिलने के दो साल के अंदर दूसरी मैटरनिटी लीव का लाभ मांगने पर कोई रोक नहीं है।"

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

सर्विस रिकॉर्ड निजी जानकारी, RTI Act के तहत इसका खुलासा करने से छूट: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि सर्विस रिकॉर्ड निजी जानकारी होती है, जिसे सूचना का अधिकार (RTI Act) के तहत सार्वजनिक करने से छूट मिली हुई। कोर्ट ने कहा कि ऐसी जानकारी को सार्वजनिक करने का आदेश तब तक नहीं दिया जा सकता, जब तक कि संबंधित अथॉरिटी इस बात से संतुष्ट न हो जाए कि व्यापक जनहित के लिए ऐसा करना ज़रूरी है।

जस्टिस आबासाहेब डी. शिंदे एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस याचिका में राज्य सूचना आयोग के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस के सर्विस रिकॉर्ड को सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया। याचिका के जवाब में प्रतिवादी ने RTI Act के तहत याचिकाकर्ता के सर्विस रिकॉर्ड से जुड़ी जानकारी मांगी, जिसमें उसकी नौकरी से संबंधित विवरण भी शामिल थे। सूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय अथॉरिटी दोनों ने ही इस आवेदन को खारिज कर दिया। हालांकि, दूसरी अपील में राज्य सूचना आयोग ने इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया और जानकारी को सार्वजनिक करने का निर्देश दिया।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

अंतरदेशीय गोद लेने में 'NOC' देना जरूरी, केवल सपोर्ट लेटर से काम नहीं चलेगा: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि अंतरदेशीय गोद लेने के मामलों में केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कारा को विदेशी मंजूरियां सुनिश्चित कर अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) जारी करना अनिवार्य है केवल सपोर्ट लेटर देकर दायित्व पूरा नहीं किया जा सकता।

जस्टिस सचिन दत्ता ने यह आदेश उस याचिका पर दिया, जिसमें दत्तक माता-पिता ने अपने बच्चे को कनाडा ले जाने के लिए NOC की मांग की थी। दंपत्ति ने हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत विधिसम्मत रूप से बच्चे को गोद लिया और बाद में विदेश में बसने के लिए आवश्यक प्रक्रिया पूरी करना चाहते हैं।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

अरविंद केजरीवाल के मामले की सुनवाई से नहीं हटेंगी जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा, याचिका खारिज

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रमुख अरविंद केजरीवाल और अन्य आरोपियों द्वारा दायर उन अर्जियों को खारिज किया, जिनमें शराब नीति मामले की सुनवाई से जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के हटने की मांग की गई थी। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने टिप्पणी की कि सिर्फ इसलिए कि उनके बच्चे केंद्र सरकार के पैनल वकील हैं, यह नहीं माना जा सकता कि उनके मन में केजरीवाल के प्रति कोई पूर्वाग्रह है।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

आउटसोर्स कर्मचारी को विभाग सीधे नहीं कर सकता बर्खास्त: राजस्थान हाईकोर्ट का अहम फैसला

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी सरकारी विभाग में आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से कार्यरत कर्मचारी को विभाग स्वयं सीधे बर्खास्त नहीं कर सकता। ऐसे मामलों में विभाग केवल संबंधित एजेंसी को कार्रवाई के लिए अनुशंसा कर सकता है।

जस्टिस मुनुरी लक्ष्मण की पीठ यह मामला सुन रही थी, जिसमें याचिकाकर्ता पंचायत राज विभाग के राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान के तहत ई-गवर्नेंस में राज्य समन्वयक के रूप में कार्यरत था। उसकी नियुक्ति एक आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से हुई थी लेकिन विभाग ने सीधे उसके सेवाएं समाप्त कीं।

आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags:    

Similar News