BREAKING | अरविंद केजरीवाल के मामले की सुनवाई से नहीं हटेंगी जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा, याचिका खारिज

Shahadat

20 April 2026 9:45 PM IST

  • BREAKING | अरविंद केजरीवाल के मामले की सुनवाई से नहीं हटेंगी जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा, याचिका खारिज

    दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रमुख अरविंद केजरीवाल और अन्य आरोपियों द्वारा दायर उन अर्जियों को खारिज किया, जिनमें शराब नीति मामले की सुनवाई से जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के हटने की मांग की गई थी।

    जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने टिप्पणी की कि सिर्फ इसलिए कि उनके बच्चे केंद्र सरकार के पैनल वकील हैं, यह नहीं माना जा सकता कि उनके मन में केजरीवाल के प्रति कोई पूर्वाग्रह है।

    जज ने आगे कहा कि किसी राजनेता को न्यायिक क्षमता का आकलन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

    "किसी जज की क्षमता का फैसला हाईकोर्ट करता है, न कि कोई वादी... किसी राजनेता को अपनी सीमा पार करने और न्यायिक क्षमता का आकलन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती... हो सकता है कि कोई वादी हमेशा सफल न हो, और केवल हाईकोर्ट ही यह तय कर सकता है कि कोई फैसला गलत है या एकतरफा। जिला कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट सही ठहरा सकता है। यही बात हाईकोर्ट पर भी लागू होती है, जिसके फैसले को सुप्रीम कोर्ट देखता है। वादी की यह सामान्य आशंका कि शायद यह अदालत उसे राहत न दे, जज पर पूर्वाग्रह का आरोप लगाने का आधार नहीं बन सकती।"

    जस्टिस शर्मा ने आगे कहा कि आरोपों का सामना होने पर कोई जज अपनी न्यायिक जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता।

    उन्होंने कहा,

    "कोई जज किसी वादी के मन में पूर्वाग्रह को लेकर पैदा हुए बेबुनियाद शक को दूर करने या मनगढ़ंत आरोपों के आधार पर सुनवाई से खुद को अलग नहीं कर सकता... जज पर किए गए निजी हमले असल में पूरी संस्था पर किए गए हमले होते हैं... यह न केवल मुझ पर (जो कि एक जज हूं) हमला होगा, बल्कि पूरी संस्था पर भी हमला होगा। इस तरह का खतरा न केवल हाईकोर्टस् तक पहुंचेगा, बल्कि जिला कोर्ट तक भी जाएगा... अगर यह अदालत सुनवाई से हटने का फैसला सुनाकर यह संदेश देती है कि किसी वादी के दबाव में आकर वह ऐसा कर सकती है तो इससे जनता के मन में यह धारणा बन जाएगी कि जज किसी राजनीतिक दल के पक्ष में काम करते हैं..."

    जज ने आगे कहा कि सुनवाई से हटने की अर्जियों में जो "कहानी" गढ़ी गई, वह पूरी तरह से "अटकलों" पर आधारित पाई गई। इसके अलावा, सुनवाई से हटने की अर्जी के साथ कोई सबूत पेश नहीं किया गया, बल्कि उसमें जज की ईमानदारी और निष्पक्षता पर "आक्षेप, इशारे और संदेह" ही व्यक्त किए गए।

    उन्होंने कहा,

    "अगर मैं इन अर्जियों को मान लेती तो इससे एक परेशान करने वाली मिसाल कायम हो जाती। अब यह मेरा पक्का फ़र्ज़ बन जाता है कि मैं इसका बेखौफ़ होकर जवाब दूं। बदकिस्मती से आज मुझे दो मुक़दमेबाज़ों के बीच का झगड़ा नहीं, बल्कि एक मुक़दमेबाज़ और मेरे—एक जज—के बीच का झगड़ा सुलझाना है। इस अदालत के सामने जो दलीलें पेश की गईं, वे खुद को केस से अलग करने (Recusal) के कानून के तहत ज़रूरी सबूतों से कमज़ोर साबित हुईं। कोई भी जज, किसी मुक़दमेबाज़ के मन में पक्षपात को लेकर पैदा हुए बेबुनियाद शक को दूर करने के लिए, या मनगढ़ंत आरोपों के आधार पर खुद को केस से अलग नहीं कर सकता... यह अदालत अपने और इस संस्था के सम्मान के लिए खड़ी रहेगी, भले ही यह मुश्किल क्यों न लगे। इस अदालत ने जो चोगा पहना है, वह इतना हल्का नहीं है। अगर ऐसे आधारों पर खुद को केस से अलग करने की बात मान ली जाती है तो इससे हमारी न्याय प्रक्रिया पर खतरा पैदा हो जाएगा। तब इसे 'मैनेज्ड जस्टिस' (प्रबंधित न्याय) कहा जाएगा।"

    अब इस मुख्य मामले की सुनवाई 29 और 30 अप्रैल को होगी, जिसमें CBI अपनी दलीलें पेश करेगी। उसके बाद अदालत प्रतिवादियों (Respondents) की बात सुनेगी।

    Title: CBI v. Kuldeep Singh & Ors

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