सुप्रीम कोर्ट मंथली राउंड अप : अक्टूबर, 2026

  • सुप्रीम कोर्ट मंथली राउंड अप : अक्टूबर, 2026

    सुप्रीम कोर्ट में अक्टूबर, 2026 में क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट मंथली राउंड अप। अक्टूबर महीने के सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

    1956 के उत्तराधिकार कानून के तहत हिंदू विधवा का सीमित अधिकार पूर्ण अधिकार बन गया: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14(1) के तहत कृषि भूमि में हिंदू विधवा का सीमित अधिकार पूर्ण स्वामित्व में बदल सकता है। उत्तराधिकार का निर्धारण उसकी मृत्यु के समय लागू व्यक्तिगत कानून को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

    जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने लगभग 45 बीघा कृषि भूमि को लेकर हुए विवाद पर सुनवाई की। यह विवाद एक महिला के पहले पति के परिवार के वारिसों और उसकी दूसरी शादी से हुए दो बेटों के बीच है।

    Case Title : Sultan Singh (Dead) Through LRs and Others v. The Financial Commissioner, Government of NCT of Delhi and Others

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    आरोपी ही नहीं, पीड़ित को भी स्पीडी ट्रायल का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश पलटा

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्पीडी ट्रायल का अधिकार केवल आरोपी तक सीमित नहीं है बल्कि पीड़ित को भी समय पर न्याय पाने का अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि मुकदमे की सुनवाई में हो रही देरी को लेकर पीड़ित पक्ष का अदालत का दरवाजा खटखटाना गलत नहीं है। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट का वह आदेश रद्द किया, जिसमें पीड़िता की याचिका खारिज करते हुए उस पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया था।

    जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की खंडपीठ ने कहा कि पीड़ित या उसका कानूनी अभिभावक मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाने के लिए याचिका दायर कर सकता है। इसके लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट का रुख किया जा सकता है।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Delhi Women Safety | सुप्रीम कोर्ट का आदेश: पुलिस पेट्रोलिंग बढ़ाएं, कैब-बस ड्राइवरों की जांच करें और गैर-कानूनी शराब की दुकानें बंद करें

    दिल्ली-NCR में हाल ही में हुई रेप की घटनाओं पर खुद संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (5 अक्टूबर) को दिल्ली पुलिस, स्थानीय प्रशासन और ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट को तुरंत बचाव के उपाय करने का निर्देश दिया। इन निर्देशों में बीट पेट्रोलिंग बढ़ाना, पब्लिक ट्रांसपोर्ट ड्राइवरों की सघन जांच और गैर-कानूनी शराब की दुकानों के खिलाफ कार्रवाई करना शामिल है।

    जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने चिंता जताते हुए कहा कि सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि सही निर्देश मौजूद हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या उन निर्देशों का ज़मीनी स्तर पर लगातार, दिखने वाला और वेरिफ़ाई किया जा सकने वाला असर हो रहा है।

    Case Title : In Re: Recent Rape Incidents in Delhi NCR

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    ज्यूडिशियल सर्विस के लिए बेंच क्लर्क का अनुभव लॉ क्लर्क के अनुभव के बराबर नहीं माना जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (6 अक्टूबर) को एक रिट याचिका खारिज की। इस याचिका में मांग की गई थी कि न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल होने के लिए ज़रूरी एक साल की कानूनी प्रैक्टिस की शर्त को पूरा करने के मकसद से, ज़िला न्यायपालिका में बेंच क्लर्क के अनुभव को लॉ क्लर्क के अनुभव के बराबर माना जाए। कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि बेंच क्लर्क का अनुभव "प्रशासनिक" (मिनिस्टीरियल) प्रकृति का होता है और लॉ क्लर्क के अनुभव से अलग होता है, इसलिए कोर्ट ने मामला खारिज किया।

    Case : TAPASMITA SUTAR Vs UNION OF INDIA | W.P.(C) No. 1224/2026 T

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    दादा की जगह पोता भी पा सकता है अनुकंपा नियुक्ति: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में दख़ल देने से किया इनकार

    सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश में दखल देने से इनकार किया, जिसमें रेलवे अधिकारियों को एक मृत रेलवे कर्मचारी के पोते को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने का निर्देश दिया गया।

    जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने भारत सरकार और रेलवे की उस याचिका को खारिज किया, जिसमें हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसमें रेलवे को प्रतिवादी (रेस्पॉन्डेंट) के अनुकंपा नियुक्ति के मामले पर विचार करने के लिए कहा गया।

    Case Title : UNION OF INDIA & ORS. VERSUS JITENDRA VERMA

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    राज्य मंदिर की ज़मीन का उपहार स्वीकार नहीं कर सकता; HR&CE Act के तहत सरकार मंदिर की संपत्तियों की केवल संरक्षक, मालिक नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार मंदिर की संपत्तियों की संरक्षक और नियामक (रेगुलेटर) है, न कि उनकी मालिक। इसलिए वह किसी ट्रस्टी से ऐसी संपत्ति का उपहार स्वीकार नहीं कर सकती, भले ही यह हस्तांतरण किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए ही क्यों न किया जा रहा हो।

    मद्रास हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने एक 'गिफ्ट डीड' (उपहार विलेख) को अमान्य घोषित किया। इस डीड के ज़रिए, तमिलनाडु के इरोड ज़िले में स्थित 'नागापालयम मरियम्मन-पोन्नाचियम्मन मंदिर' के अस्थायी ट्रस्टी ने मंदिर की 1 एकड़ और 10 सेंट ज़मीन, तालुक कार्यालय बनाने के लिए राज्य सरकार को सौंप दी थी।

    Case Title : K Ramalingam and Others v. Government of Tamil Nadu and Others

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    इंटरनेट का इस्तेमाल करना बच्चों समेत हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार, इससे पूरी तरह वंचित करना बेतुका होगा: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि इंटरनेट तक पहुंच और उसके इस्तेमाल का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस अधिकार में बच्चे भी शामिल हैं और उनकी उम्र चाहे जो भी हो, उन्हें इससे पूरी तरह वंचित नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि बच्चों को इंटरनेट इस्तेमाल करने के अधिकार से पूरी तरह वंचित करना उतना ही बेतुका होगा, जितना यह कहना कि एक निश्चित उम्र से कम बच्चों की अंतरात्मा की रक्षा करने या उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को महत्व देने की जरूरत नहीं है।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    ग़ैर-हिंदू धर्म अपनाने वाले लोग केवल धर्म परिवर्तन से पहले की अपनी स्थिति के आधार पर पिछड़े वर्ग के कोटे का दावा नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट का वह फैसला बरकरार रखा, जिसमें कहा गया कि इस्लाम अपनाने वाला कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन से पहले की अपनी स्थिति के आधार पर पिछड़े वर्ग के आरक्षण का हकदार नहीं है।

    जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने तमिलनाडु सरकार द्वारा हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर चुनौती को खारिज कर दिया। कोर्ट ने आदेश दिया: "कोई व्यक्ति जो इस्लाम अपनाता है, केवल इस कार्य से वह राज्य में अधिसूचित सात पिछड़े सामाजिक समुदायों में से किसी एक का सदस्य नहीं बन जाता। उसकी पुरानी जाति की स्थिति को मुस्लिम पिछड़े वर्ग की श्रेणी में नहीं जोड़ा जा सकता, और न ही उसका अपना धार्मिक निकाय यह तय कर सकता है कि वह इस दर्जे का हकदार है या नहीं।"

    Case : The Secretary to Government v Sameer Ahamed | Diary No. 39624/2026

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    भर्ती विज्ञापन में योग्यता की शर्त अस्पष्ट हो तो उम्मीदवार के पक्ष में होगा उसका अर्थ: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भर्ती विज्ञापन में निर्धारित पात्रता या योग्यता की शर्तों में अस्पष्टता होने पर उसका अर्थ ऐसे उम्मीदवार के पक्ष में लगाया जाना चाहिए, जो प्रथम दृष्टया आवश्यक योग्यता रखता हो। कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया, जिसमें भर्ती विज्ञापन में अनुभव संबंधी शर्तों की अस्पष्टता के बावजूद एक उम्मीदवार को लाइब्रेरियन के पद पर नियुक्ति के लिए अयोग्य ठहराया गया।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    सुप्रीम कोर्ट का रेलवे को निर्देश: ऑनलाइन टिकटों की तरह काउंटर से खरीदे गए टिकटों पर भी इंश्योरेंस कवर दें

    एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रेलवे को आदेश दिया कि वह 27 अक्टूबर से दो हफ़्ते के अंदर रेलवे रिज़र्वेशन काउंटर से खरीदे गए टिकटों पर भी इंश्योरेंस कवर दे। कोर्ट ने कहा कि इंश्योरेंस कवर वैसा ही होना चाहिए जैसा ऑनलाइन टिकट खरीदने पर मिलता है।

    जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने आम लोगों की सुरक्षा और ट्रेन यात्रा के दौरान होने वाली अप्रिय घटनाओं को रोकने से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। इस मामले में उठाए गए मुद्दों में से एक इंश्योरेंस कवर का था, जो अभी सिर्फ़ उन लोगों को मिलता है जो थोड़ी अतिरिक्त रकम देकर ऑनलाइन रेलवे टिकट खरीदते हैं।

    Case Title : UNION OF INDIA V RADHA YADAV

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    बिहार SIR फ़ैसले के समय नया फ़ॉर्म 6 मौजूद नहीं था, हमने इस पर कोई फ़ैसला नहीं दिया: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को साफ़ किया कि उसने नए फ़ॉर्म 6 डिक्लेरेशन (नए वोटरों के रजिस्ट्रेशन के लिए) को न तो मंज़ूरी दी और न ही इसे नामंज़ूर किया। इसकी वैधता पर अभी फ़ैसला होना बाकी है। कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) की पिछले हफ़्ते की टिप्पणी का मतलब सिर्फ़ यह बताना था कि मई 2026 के बिहार SIR फ़ैसले में नए फ़ॉर्म 6 की जांच नहीं की गई थी क्योंकि वह उस समय मौजूद ही नहीं था।

    CJI सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने भारत निर्वाचन आयोग से जुड़ी प्रिया मिश्रा की रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान ये मौखिक टिप्पणियां कीं।

    Case : Priya Mishra v. Union of India | WP (c) 1291/2026

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    ट्रायल से पहले की हिरासत को 'बिना ट्रायल के सजा' में नहीं बदला जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल से पहले की लंबी हिरासत को 'बिना ट्रायल के सजा' में नहीं बदला जा सकता। कोर्ट ने दोहराया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत विचाराधीन कैदी (अंडरट्रायल) को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जल्द ट्रायल का अधिकार है। वित्तीय गड़बड़ी के गंभीर आरोपों वाले मामलों में भी इस अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए।

    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने महेश चंद्र जोशी (पूर्व कांग्रेस मंत्री) और मुकेश पाठक को नियमित जमानत देते समय यह टिप्पणी की। इन दोनों पर राजस्थान में 'जल जीवन मिशन' के तहत सैकड़ों करोड़ रुपये के टेंडरों में कथित अनियमितताओं से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में आरोप हैं।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    BNSS में लोक सेवकों के लिए सुरक्षा उपायों का विस्तार: FIR दर्ज करने के न्यायिक आदेश से पहले मिलेगी सुरक्षा- पिनाराई विजयन केस में सुप्रीम कोर्ट ने किया स्पष्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (21 अक्टूबर) को कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(4) के तहत लोक सेवकों को मिलने वाले सुरक्षा उपायों का दायरा बढ़ाया गया। इसके तहत मजिस्ट्रेट द्वारा उनके खिलाफ जांच का आदेश देने से पहले उन्हें सुरक्षा मिलती है। यह CrPC की पुरानी धारा 156(3) से अलग है।

    जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ ने यह टिप्पणी तब की, जब उन्होंने केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन और अन्य याचिकाकर्ताओं को CMRL-एक्सलॉजिक (Exalogic) मामले में FIR दर्ज करने के केरल हाईकोर्ट के सिंगल जज के निर्देश को चुनौती देने की अनुमति दी।

    Case Title : Pinarayi Vijayan v Adv KM Shajahan

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    चुनाव में गलत हलफनामा देने वाले उम्मीदवारों के खिलाफ RP Act की धारा 125A के तहत निजी शिकायत दर्ज करा सकते हैं मतदाता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आम नागरिक, चुने गए उम्मीदवारों के खिलाफ 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951' (Representation of the People Act, 1951) की धारा 125A के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इसमें यह आरोप लगाया जा सकता है कि उम्मीदवार ने अपने चुनावी हलफनामे में गलत जानकारी दी है या कोई जानकारी छिपाई है।

    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने कहा कि ऐसी शिकायतों पर 'दंड प्रक्रिया संहिता, 1973' (CrPC) की धारा 195(1) के तहत लगी पाबंदियां लागू नहीं होतीं। धारा 195(1) के तहत कुछ खास अपराधों के लिए केवल संबंधित लोक सेवक (Public Servant) द्वारा ही शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।

    Case Title : Rajkumar Madki v. Dr. Shailendra Beldale

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    महाराष्ट्र में बिना लाइसेंस साहूकार नहीं चला सकेंगे चेक बाउंस का मुकदमा, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- शुरुआत में ही पेश करना होगा लाइसेंस

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महाराष्ट्र में बिना लाइसेंस के कर्ज देने वाले साहूकार चेक बाउंस के मामलों में कानूनी कार्रवाई नहीं कर सकते। ऐसे मामलों में उन्हें मुकदमे की शुरुआत में ही अपना साहूकारी लाइसेंस पेश करना होगा। कोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र में प्रॉमिसरी नोट के आधार पर दिए गए कर्ज की वसूली के लिए चेक बाउंस या दीवानी मुकदमा दायर करने पर संबंधित कानून के प्रावधान लागू होंगे।

    जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की खंडपीठ ने गुरुवार (29 अक्टूबर) को एक विविध आवेदन पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। यह आवेदन व्योमेश महीपात्राय शाह ने दायर किया था। आवेदक को आशंका थी कि सुप्रीम कोर्ट के मई 2026 के फैसले का हवाला देकर महाराष्ट्र में बिना लाइसेंस वाले साहूकार भी चेक बाउंस के मुकदमे चला सकते हैं।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    बैंक की लापरवाही से 'साइबर फ्रॉड' या 'डिजिटल अरेस्ट' का शिकार होने वालों को बैंक देगा मुआवजा: सुप्रीम कोर्ट

    'डिजिटल अरेस्ट' के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई क्लाइंट 'डिजिटल अरेस्ट' या साइबर फ्रॉड का शिकार होता है, और इसमें बैंक या उसके अधिकारियों की लापरवाही सामने आती है, तो बैंक को इसके लिए पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया जाएगा। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच 'डिजिटल अरेस्ट' स्कैम की बढ़ती घटनाओं पर स्वतः संज्ञान (suo motu) लेकर सुनवाई कर रही थी।

    Case Details : In Re: Victims of Digital Arrest Related to Forged Documents, SMW (Crl.) 3/2025

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Income Tax | अगर धारा 143(2) के तहत नोटिस जारी नहीं किया गया तो पुनर्मूल्यांकन कार्यवाही नहीं की जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर आयकर विभाग (Revenue) किसी करदाता को आयकर अधिनियम की धारा 143(2) के तहत नोटिस नहीं भेजता है, तो पुनर्मूल्यांकन की पूरी कार्यवाही अमान्य हो जाएगी।

    कोर्ट ने कहा, "अधिनियम की धारा 143(2) के तहत नोटिस देना अनिवार्य है, क्योंकि यह करदाता को ऐसे सबूत या जानकारी पेश करने का मौका देता है, जिसके आधार पर वह राहत का दावा कर रहा है। धारा 147 के तहत पुनर्मूल्यांकन की कार्यवाही शुरू करने के लिए धारा 143(2) का नोटिस होना एक अनिवार्य शर्त है। अगर धारा 143(2) के तहत नोटिस नहीं दिया गया तो आयकर विभाग आगे कोई कार्यवाही नहीं कर सकता।"

    Case Title : PRINCIPAL COMMISSIONER OF INCOME TAX, BHUBANESHWAR VERSUS ORISSA MINING CORPORATION LTD. (with connected matters)

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    पीड़िता और आरोपी के बीच केवल 'समझौते' के आधार पर रेप केस रद्द नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश खारिज किया। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते के आधार पर रेप केस रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों को केवल एक समझौते के आधार पर रद्द करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

    जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने यह टिप्पणी तब की, जब वे आरोपी को अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) दे रहे थे और मामले में ट्रायल (मुकदमा) आगे बढ़ाने का निर्देश दे रहे थे। कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि कैसे पैसों के लालच में झूठी शिकायतें दर्ज कराई जाती हैं, या फिर दबाव डालकर समझौते किए जाते हैं।

    Case Title : Gopal Lodhi v State of MP & Anr

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    कारगिल में तैनात सैनिक को 'युद्ध चोट पेंशन' देने का फैसला बक़रार, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की केंद्र सरकार की आपत्ति

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (28 अक्टूबर) को पूर्व सैनिक को 'युद्ध चोट पेंशन' (War Injury Pension) देने के फैसले को बरकरार रखा। यह पेंशन उन्हें उस बीमारी के लिए दी गई है, जो 'ऑपरेशन रक्षक' के तहत कारगिल में उनकी तैनाती के दौरान हुई थी।

    जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने केंद्र सरकार की उस अपील को खारिज किया, जिसमें हाईकोर्ट और आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत पूर्व सैनिक को 'विकलांगता पेंशन' (Disability Pension) की जगह 'युद्ध चोट पेंशन' देने का फैसला लिया गया था।

    Case Title : UNION OF INDIA & ORS. VERSUS NARENDER KUMAR

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story