बैंक की लापरवाही से 'साइबर फ्रॉड' या 'डिजिटल अरेस्ट' का शिकार होने वालों को बैंक देगा मुआवजा: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
29 Oct 2026 8:23 PM IST

'डिजिटल अरेस्ट' के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई क्लाइंट 'डिजिटल अरेस्ट' या साइबर फ्रॉड का शिकार होता है, और इसमें बैंक या उसके अधिकारियों की लापरवाही सामने आती है, तो बैंक को इसके लिए पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच 'डिजिटल अरेस्ट' स्कैम की बढ़ती घटनाओं पर स्वतः संज्ञान (suo motu) लेकर सुनवाई कर रही थी।
CJI ने बुधवार को ऐसे अपराधों के आरोपियों पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर कानून इजाजत दे तो वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बनाने वाले ऐसे "क्रूर अपराधियों" को ट्रायल से पहले ही सजा मिलनी चाहिए।
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने गुरुवार को कोर्ट को बताया कि इस समस्या से निपटने के लिए कई कदम उठाए गए। साथ ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) कुछ ऐसे रेगुलेटरी उपाय लाने पर विचार कर रहा है, जिन्हें दिसंबर तक लागू किया जा सकता है।
सीनियर एडवोकेट एनएस नप्पिनई (एमिक्स क्यूरी) ने बताया कि कोर्ट द्वारा मामले का संज्ञान लेने और कई निर्देश जारी करने के बावजूद, 'डिजिटल अरेस्ट' की घटनाएं धड़ल्ले से हो रही हैं (हाल ही में एक हफ्ते पहले ऐसी घटना सामने आई थी)। इस पर बेंच ने सवाल किया कि RBI अभी भी बैंकों से सलाह-मशविरा क्यों कर रहा है?
CJI ने टिप्पणी की,
"समस्या यह है कि इसमें बैंक अधिकारी भी शामिल हैं। जब हम [कदम उठाने के लिए] कह रहे हैं, तब भी RBI बैंकों से ही सलाह ले रहा है!"
CJI ने अटॉर्नी जनरल से यह भी पूछा कि जिन बैंकों के पास लोगों के अकाउंट्स में मौजूद रकम का पूरा रिकॉर्ड होता है, वे पैसे मांगने वाले संदिग्ध या फर्जी संदेशों को रोकने के लिए दखल क्यों नहीं देते?
कहा गया,
"उन्हें अच्छी तरह पता होता है कि खाताधारक कौन है। जैसे ही उन्हें पता चले कि खाते में रकम है तो बैंकों को एक सुरक्षा कवच (Protective Umbrella) तैयार करना चाहिए। बैंक पैसे मांगने वाले संदेशों को रोकते क्यों नहीं हैं? जैसे ही कोई संदिग्ध ट्रांजैक्शन आता है, तो उसे रोका क्यों नहीं जा सकता?"
अटॉर्नी जनरल ने बताया कि कोर्ट के दखल के बाद कई कदम उठाए गए हैं और बैंक अब संदिग्ध ट्रांजैक्शन की पहचान कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि RBI, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और दूरसंचार विभाग (DoT) जरूरी उपाय लागू करने के लिए बड़े स्तर पर काम कर रहे हैं। उन्होंने सभी बैंकों को एक साथ लाने (व्यवस्था के अनुरूप ढालने) के लिए कुछ और समय मांगा।
AG ने आगे कहा कि बैंकिंग अधिकारियों की जवाबदेही (यदि वे 'डिजिटल अरेस्ट' के आरोपियों के साथ मिलीभगत में पाए जाते हैं) का पहलू भी विचाराधीन है।
हालांकि, CJI ने टिप्पणी की,
"जब तक बैंकों के लिए कोई सख्त दंडात्मक निर्देश नहीं होगा, तब तक वे अपना रवैया नहीं बदलेंगे!"
उन्होंने आगे कहा,
"देश की अर्थव्यवस्था पर सबसे बड़ा वित्तीय फ्रॉड 'डिजिटल अरेस्ट' के जरिए हुआ है... हजारों करोड़ रुपये चले गए... बैंकों को अपने खातों को 3-4 समूहों में वर्गीकृत करने के लिए क्यों नहीं कहा जा सकता? क्या नियमों में ऐसा कोई प्रावधान है कि किसी असामान्य ट्रांजैक्शन (लेन-देन) की स्थिति में, बैंक उसे रोक दें और स्थानीय पुलिस स्टेशन को सूचित करें? और फिर कोई पुलिस अधिकारी जाकर आपसे [ग्राहक से] पूछे कि क्या वाकई आपने ही वह ट्रांजैक्शन किया?"
बेंच ने यह भी पूछा कि क्या प्रस्तावित नियमों में व्हाट्सएप जैसे मध्यस्थों (Intermediaries) की भूमिका को शामिल किया गया, जिनके जरिए ऐसे फ्रॉड तेजी से हो रहे हैं। CJI ने यह भी कहा कि ऐसा लगता है कि बैंक इस समस्या को सुलझाने में हिचकिचा रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनके कारोबार पर असर पड़ेगा।
गौरतलब है कि बेंच ने यह भी कहा कि 'डिजिटल अरेस्ट' के मामले में पीड़ित के अकाउंट से डेबिट (पैसे की निकासी) शून्य होनी चाहिए और इसकी पूरी जिम्मेदारी बैंक या वित्तीय संस्थान की होनी चाहिए।
CJI ने कहा कि कोर्ट एक ऐसा आदेश पारित करना चाहता है, जिसके तहत, जहां भी ऐसा फ्रॉड हो, वहां बैंक पीड़ितों को मुआवजा दें (जो उनके द्वारा खोई गई रकम से कम न हो) और साथ ही उन्हें कानूनी कार्रवाई का सामना भी करना पड़े।
जस्टिस बागची ने कहा कि कोर्ट वित्तीय संस्थानों पर 'सख्त जवाबदेही' (Strict Liability) लागू करने का प्रस्ताव दे रहा है। हालांकि RBI कुछ दिशा-निर्देश या उपाय लाने का प्रस्ताव दे रहा है, लेकिन यह देखना होगा कि इन नियमों में कितनी 'दम' है—यानी, ये किस हद तक सुरक्षा प्रदान करते हैं, आदि।
CJI ने कहा कि एक अनिवार्य व्यवस्था होनी चाहिए, जिसके तहत जब तक ट्रांजैक्शन के असली होने की लिखित पुष्टि न हो जाए, तब तक उसे रोक दिया जाना चाहिए।
आदेश में दर्ज किया गया:
"हम फिर दोहराते हैं कि RBI द्वारा प्रस्तावित नियामक उपायों में वित्तीय संस्थानों के लिए यह अनिवार्य होना चाहिए कि वे 'डिजिटल अरेस्ट' या साइबर फ्रॉड के पीड़ितों को मुआवजा दें। यह मुआवजा उनके द्वारा खोई गई रकम से कम नहीं होना चाहिए, और यह तब लागू होगा जब यह पाया जाए कि यह फ्रॉड वित्तीय संस्थान द्वारा 'उचित सावधानी' (due diligence) न बरतने के कारण हुआ।"
Case Details : In Re: Victims of Digital Arrest Related to Forged Documents, SMW (Crl.) 3/2025

