पीड़िता और आरोपी के बीच केवल 'समझौते' के आधार पर रेप केस रद्द नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
28 Oct 2026 8:21 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश खारिज किया। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते के आधार पर रेप केस रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों को केवल एक समझौते के आधार पर रद्द करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने यह टिप्पणी तब की, जब वे आरोपी को अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) दे रहे थे और मामले में ट्रायल (मुकदमा) आगे बढ़ाने का निर्देश दे रहे थे। कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि कैसे पैसों के लालच में झूठी शिकायतें दर्ज कराई जाती हैं, या फिर दबाव डालकर समझौते किए जाते हैं।
याचिकाकर्ता ने भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धाराओं 64(1), 33(2) और 351(3), तथा SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धाराओं 3(1)(w)(i), 3(1)(w)(ii) और 3(2)(v) के तहत दर्ज एक मामले में अग्रिम जमानत मांगी थी।
अपने पिछले आदेश को देखते हुए बेंच ने पाया कि याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील वारिशा फरासत ने कोर्ट को बताया था कि मामले में समझौता हो गया। हाईकोर्ट ने अपनी अंतर्निहित शक्तियों (Inherent Powers) का इस्तेमाल करते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के तहत दायर आवेदन को स्वीकार कर लिया और समझौते के आधार पर केस रद्द कर दिया।
इस पर कोर्ट ने असहमति जताते हुए कहा,
"अपराध की गंभीरता को देखते हुए हम थोड़े चिंतित थे।"
कोर्ट ने उन फैसलों की समीक्षा की जिनका हवाला हाईकोर्ट ने दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि 'नरिंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य' और 'अनीता मारिया डायस व अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य' जैसे मामलों में पहले ही चेतावनी दी जा चुकी है कि केस रद्द करने की अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल उन मामलों में नहीं किया जाना चाहिए, जिनमें "जघन्य और गंभीर अपराध शामिल हों, जो मानसिक विकृति को दर्शाते हों, या फिर हत्या, रेप, डकैती जैसे अपराध हों—जिन्हें किसी भी तरह से 'निजी प्रकृति' का नहीं माना जा सकता।"
इसमें यह भी बताया गया कि 'ज्ञान सिंह बनाम पंजाब राज्य' मामले में पीठ ने यह माना था कि जब पक्षकार आपस में समझौता कर लेते हैं तो दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC, जो अब BNSS की धारा 528 है) की धारा 482 के तहत शक्तियों का इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन, यह तब लागू नहीं होगा जब अपराध बहुत गंभीर या जघन्य हों - जैसे कि मानसिक विकृति से जुड़े अपराध, हत्या, बलात्कार, डकैती, या 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988' के तहत आने वाले अपराध। 'शंभू खरवार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले के संदर्भ में, अदालत ने कहा कि उस मामले को इसलिए रद्द (Quash) कर दिया गया क्योंकि आरोपों से ही यह स्पष्ट था कि दोनों पक्षों के बीच संबंध आपसी सहमति से बने थे।
अदालत ने अग्रिम जमानत तो दी, लेकिन साथ ही यह भी कहा:
“हालांकि, केवल आपसी समझौते के आधार पर धारा 482 के तहत किसी मामले को रद्द करना - खासकर तब जब वह अपराध 'गैर-समझौता योग्य' (Non-Compoundable) हो - धारा 482 के अधिकार क्षेत्र से बाहर जाना होगा। साथ ही यह धारा 320 के तहत दी गई शक्तियों का भी उल्लंघन होगा। हमें न केवल उन समझौतों की चिंता है जो आरोपी द्वारा दबाव डालकर किए जा सकते हैं, बल्कि हमें इस बात का भी डर है कि भविष्य में समझौते के लालच में ऐसी कई झूठी शिकायतें दर्ज कराई जा सकती हैं।”
खंडपीठ ने कहा कि वह प्रथम दृष्टया (Prima Facie) इस बात से संतुष्ट नहीं है कि हाईकोर्ट द्वारा बताए गए मामलों के आधार पर बलात्कार जैसे जघन्य अपराध की शिकायत को केवल आपसी समझौते के दम पर रद्द किया जा सकता है। इसलिए, पीठ ने उच्च न्यायालय से इस मामले के रिकॉर्ड तलब किए।
इसके अलावा, खंडपीठ ने 'जिला विधिक सेवा प्राधिकरण' (District Legal Services Authority) के कार्यालय में, सचिव की मौजूदगी में पीड़िता से बातचीत की।
खंडपीठ ने दर्ज किया,
“पीड़िता ने एक ही बात में कई बातें कहीं: उसने बताया कि उस पर समझौते के लिए दबाव डाला गया था, वह समझौते के लिए तैयार नहीं है, और उसे समझौते के लिए पैसों की जरूरत है। उसने स्पष्ट रूप से कहा कि उसने जो शिकायत दर्ज कराई, उसमें उसने सच ही बताया था।”
साथ ही खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपों की सच्चाई की जांच ट्रायल (मुकदमे) के दौरान की जाएगी, और अभी इस पर कोई राय देना संभव नहीं है।
अदालत ने वित्तीय समझौते के लालच में लगाए गए झूठे आरोपों और दबाव डालकर किए गए समझौतों, दोनों ही मामलों को लेकर अपनी चेतावनी दोहराई:
“हम इस बिंदु पर कानून पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि केवल समझौते के आधार पर गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों को रद्द नहीं किया जा सकता; हम इसे स्वीकार नहीं कर सकते। हमने उन फैसलों में अंतर स्पष्ट किया, जिनका हवाला सिंगल जज ने दिया था।”
उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया और मुकदमे को आगे बढ़ाने का निर्देश दिया। साथ ही, अदालत ने कुछ शर्तों के साथ आरोपी को अग्रिम जमानत भी दी।
Case Title : Gopal Lodhi v State of MP & Anr

