ट्रायल से पहले की हिरासत को 'बिना ट्रायल के सजा' में नहीं बदला जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

  • ट्रायल से पहले की हिरासत को बिना ट्रायल के सजा में नहीं बदला जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल से पहले की लंबी हिरासत को 'बिना ट्रायल के सजा' में नहीं बदला जा सकता। कोर्ट ने दोहराया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत विचाराधीन कैदी (अंडरट्रायल) को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जल्द ट्रायल का अधिकार है। वित्तीय गड़बड़ी के गंभीर आरोपों वाले मामलों में भी इस अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए।

    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने महेश चंद्र जोशी (पूर्व कांग्रेस मंत्री) और मुकेश पाठक को नियमित जमानत देते समय यह टिप्पणी की। इन दोनों पर राजस्थान में 'जल जीवन मिशन' के तहत सैकड़ों करोड़ रुपये के टेंडरों में कथित अनियमितताओं से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में आरोप हैं।

    कोर्ट ने कहा कि हालांकि किसी जन-कल्याणकारी परियोजना को लागू करने में बड़े पैमाने पर वित्तीय गड़बड़ी और मिलीभगत के आरोपों की गंभीरता से जांच होनी चाहिए, लेकिन केवल इन आरोपों की गंभीरता के आधार पर जमानत से जुड़े अन्य पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और न ही अनिश्चित काल तक ट्रायल से पहले हिरासत में रखा जा सकता है।

    कोर्ट ने कहा,

    "जैसा कि इस अदालत ने बार-बार जोर दिया, ट्रायल से पहले की लंबी हिरासत को 'बिना ट्रायल के सजा' में नहीं बदला जा सकता। ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत विचाराधीन कैदी के व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जल्द ट्रायल के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा।"

    बेंच ने कहा,

    "'जल जीवन मिशन' जैसी जन कल्याणकारी परियोजना को लागू करने में बड़े पैमाने पर वित्तीय गड़बड़ी और मिलीभगत के आरोप गंभीर हैं और इनकी गहन जांच होनी चाहिए। हमारा मानना ​​है कि ऐसे बड़े आपराधिक मामलों में शामिल होने के आरोपी व्यक्तियों को जमानत दिए जाने का विरोध करना राज्य का सही कदम है। फिर भी आरोपों की गंभीरता चाहे कितनी भी अधिक क्यों न हो, केवल इसके आधार पर जमानत से जुड़े अन्य सभी पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और न ही अनिश्चित काल तक ट्रायल से पहले हिरासत में रखा जा सकता है।"

    बेंच ने गौर किया कि दोनों आरोपियों के खिलाफ जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। अभियोजन पक्ष का मामला मुख्य रूप से दस्तावेजी रिकॉर्ड और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों पर आधारित है। इनमें टेंडर फाइलें, आधिकारिक पत्र-व्यवहार, बैंक स्टेटमेंट, जब्त किए गए मोबाइल उपकरणों की फोरेंसिक रिपोर्ट और बातचीत की रिकॉर्डिंग शामिल हैं। ये सभी चीजें पहले से ही जांच एजेंसी की कस्टडी में हैं।

    अदालत ने माना कि अपीलकर्ताओं से अब और पूछताछ करने या उनसे कुछ बरामद करने की जरूरत नहीं है और दस्तावेजी या इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के साथ छेड़छाड़ किए जाने का डर भी काफी हद तक खत्म हो गया।

    अदालत ने आरोपियों द्वारा जेल में बिताई गई अवधि पर भी ध्यान दिया। लगभग 72 साल के वरिष्ठ नागरिक जोशी, 7 मई 2026 से इस मामले में पांच महीने से अधिक समय तक हिरासत में रहे। पाठक 18 फरवरी 2026 से, यानी लगभग आठ महीने से लगातार हिरासत में थे।

    एक और अहम बात यह थी कि मुकदमे (ट्रायल) में कितना समय लग सकता है। इस मामले में 22 आरोपी, तीन चार्जशीट, अभियोजन पक्ष के 124 गवाह और 20,000 पन्नों में फैले 192 दस्तावेज शामिल हैं। अदालत ने गौर किया कि अभी तक आरोप तय (चार्ज फ्रेम) नहीं हुए हैं और मुकदमा शुरू होना बाकी है। कुछ सह-आरोपियों की कथित संलिप्तता की जांच भी अभी चल रही है, जबकि कई अन्य आरोपी, जिनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किए गए थे, अभी भी फरार हैं।

    सबूतों की भारी मात्रा और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए, अदालत ने माना कि मुकदमे को पूरा होने में काफी लंबा समय लग सकता है।

    खंडपीठ ने यह भी ध्यान दिया कि इन्हीं आरोपों से जुड़े अन्य मामलों में दोनों अपीलकर्ताओं को जमानत मिल चुकी है। इस मामले के कई अन्य सह-आरोपियों को भी जमानत या अंतरिम सुरक्षा दी जा चुकी है।

    अदालत ने कहा,

    "इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि अपीलकर्ताओं को मुकदमे से पहले और अधिक समय तक जेल में रखने की कोई जरूरत नहीं है। अभियोजन पक्ष की किसी भी जायज चिंता को उचित शर्तें लगाकर दूर किया जा सकता है।"

    Case Title : Mahesh Chandra Joshi v. State of Rajasthan and Mukesh Pathak v. State of Rajasthan

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