ज्यूडिशियल सर्विस के लिए बेंच क्लर्क का अनुभव लॉ क्लर्क के अनुभव के बराबर नहीं माना जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
6 Oct 2026 12:26 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (6 अक्टूबर) को एक रिट याचिका खारिज की। इस याचिका में मांग की गई थी कि न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल होने के लिए ज़रूरी एक साल की कानूनी प्रैक्टिस की शर्त को पूरा करने के मकसद से, ज़िला न्यायपालिका में बेंच क्लर्क के अनुभव को लॉ क्लर्क के अनुभव के बराबर माना जाए।
कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि बेंच क्लर्क का अनुभव "प्रशासनिक" (मिनिस्टीरियल) प्रकृति का होता है और लॉ क्लर्क के अनुभव से अलग होता है, इसलिए कोर्ट ने मामला खारिज किया।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस मोहना की बेंच ने ज़िला न्यायपालिका में काम करने वाली एक बेंच क्लर्क की याचिका पर सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियां कीं। याचिकाकर्ता चाहती थी कि बेंच क्लर्क के तौर पर उसके अनुभव को पहले से कानूनी प्रैक्टिस करने की योग्यता शर्त के तहत गिना जाए।
कोर्ट ने लॉ क्लर्क और बेंच क्लर्क की भूमिका के बीच अंतर बताते हुए याचिका स्वीकार करने से इनकार किया।
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि लॉ क्लर्क की भूमिका "अनोखी" होती है और उनके अनुभव को कानूनी प्रैक्टिस के बराबर मानने का एक तार्किक आधार है।
जस्टिस बागची ने कहा,
"लॉ क्लर्क के अनुभव को प्रैक्टिस के बराबर मानने में एक स्पष्ट तार्किक संबंध है, जिसे कोर्ट में मदद करने वाले अन्य प्रशासनिक कर्मचारियों के अनुभव के साथ मिलाकर नहीं देखा जा सकता और न ही इसे उन तक बढ़ाया जा सकता है।"
जब वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा किए गए कामों पर भी विचार किया जा सकता है तो जस्टिस बागची ने कहा कि वे काम "प्रशासनिक थे, बौद्धिक नहीं"। उन्होंने आगे कहा कि बेंच क्लर्क का पद एक क्लर्क का पद है और इसकी तुलना लॉ क्लर्क की भूमिका से नहीं की जा सकती।
वकील ने बताया कि याचिकाकर्ता पहले 2023 में हुई न्यायिक परीक्षा में शामिल हुई, लेकिन अब वह कानून की प्रैक्टिस नहीं कर पा रही है, क्योंकि वह ज़िला न्यायपालिका में बेंच क्लर्क के तौर पर काम कर रही है।
जस्टिस मोहना ने भी दोनों पदों के बीच अंतर बताया।
उन्होंने कहा,
"आप बेंच क्लर्क के तौर पर काम जारी रखना चाहती हैं। फिर चाहती हैं कि इसे कोर्ट में प्रैक्टिस के तौर पर गिना जाए। दोनों के बीच बहुत बड़ा अंतर है।"
वकील ने दलील दी कि याचिकाकर्ता द्वारा किए जाने वाले कामों की प्रकृति पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
हालांकि, जस्टिस बागची ने कहा कि बेंच क्लर्क के अनुभव को लॉ क्लर्क के अनुभव के बराबर मानने का मतलब होगा कि लॉ क्लर्क को मिलने वाला फ़ायदा अदालतों में मदद करने वाले दूसरे मिनिस्ट्रियल स्टाफ़ को भी दिया जाए।
जस्टिस बागची ने कहा,
"यह एक उचित वर्गीकरण है। लॉ क्लर्क की भूमिका खास होती है और उनकी तुलना बेंच क्लर्क से नहीं की जा सकती। आपको शामिल करने का एकमात्र तरीका बेंच क्लर्क को लॉ क्लर्क के बराबर मानना है, जो हम नहीं करना चाहते।"
चीफ़ जस्टिस ने यह भी कहा कि कोर्ट युवा उम्मीदवारों के लिए अवसर बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन एक साल की प्रैक्टिस की शर्त को हटाया नहीं जा सकता।
आखिरकार कोर्ट ने याचिका खारिज की।
बता दें, मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने ज्यूडिशियल सर्विस परीक्षा में शामिल होने के लिए 3 साल की लॉ प्रैक्टिस की शर्त को फिर से लागू किया था। उस फ़ैसले में कोर्ट ने साफ़ किया था कि लॉ क्लर्क के तौर पर मिले अनुभव को लिटिगेशन प्रैक्टिस में गिना जाएगा।
इस साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने लॉ प्रैक्टिस की शर्त में ढील देते हुए इसे 1 साल कर दिया।
Case : TAPASMITA SUTAR Vs UNION OF INDIA | W.P.(C) No. 1224/2026 T

