राज्य मंदिर की ज़मीन का उपहार स्वीकार नहीं कर सकता; HR&CE Act के तहत सरकार मंदिर की संपत्तियों की केवल संरक्षक, मालिक नहीं: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
17 Oct 2026 7:01 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार मंदिर की संपत्तियों की संरक्षक और नियामक (रेगुलेटर) है, न कि उनकी मालिक। इसलिए वह किसी ट्रस्टी से ऐसी संपत्ति का उपहार स्वीकार नहीं कर सकती, भले ही यह हस्तांतरण किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए ही क्यों न किया जा रहा हो।
मद्रास हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने एक 'गिफ्ट डीड' (उपहार विलेख) को अमान्य घोषित किया। इस डीड के ज़रिए, तमिलनाडु के इरोड ज़िले में स्थित 'नागापालयम मरियम्मन-पोन्नाचियम्मन मंदिर' के अस्थायी ट्रस्टी ने मंदिर की 1 एकड़ और 10 सेंट ज़मीन, तालुक कार्यालय बनाने के लिए राज्य सरकार को सौंप दी थी।
कोर्ट ने कहा कि यह उपहार 'तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम (HR&CE Act), 1959' की धारा 41 का उल्लंघन करता है। यह धारा किसी धार्मिक संस्थान के भरण-पोषण या रखरखाव के लिए दी गई 'इनाम' (दान की गई) ज़मीन को उपहार के रूप में देने पर रोक लगाती है।
फैसला लिखने वाले जस्टिस अराधे ने कहा,
"1959 के अधिनियम के तहत आयुक्त (कमिश्नर) और अन्य अधिकारियों के माध्यम से काम करने वाला राज्य, मंदिर की संपत्तियों का केवल संरक्षक और नियामक है, न कि उनका मालिक।"
कोर्ट ने आगे कहा,
"भले ही किसी सार्वजनिक उद्देश्य को पूरा करने के लिए मंदिर की ज़मीन का उपहार लिया जा रहा हो, लेकिन राजस्व विभाग के किसी अधिकारी द्वारा ऐसा उपहार स्वीकार करना 1959 के अधिनियम के मूल उद्देश्य के खिलाफ है।"
कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को यह भी निर्देश दिया कि वह इस ज़मीन के लिए 8 मार्च, 2019 से 31,000 रुपये का मासिक किराया दे और तीन महीने के भीतर बकाया राशि का भुगतान करे। साथ ही कोर्ट ने राज्य पर 1 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया, जो मंदिर को दिया जाना है।
मंदिर की संपत्ति देवता के लिए होती है, न कि मनमाने ढंग से किसी को सौंपने के लिए
यह विवाद तब शुरू हुआ जब 30 अगस्त, 2017 को अस्थायी ट्रस्टी ने 'गिफ्ट डीड' के ज़रिए मंदिर की ज़मीन, तालुक कार्यालय बनाने के लिए तमिलनाडु सरकार को सौंप दी। इस ट्रांसफर को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि ट्रस्टी के पास HR&CE Act के तहत कानूनी सुरक्षा उपायों का पालन किए बिना मंदिर की संपत्ति को हस्तांतरित करने का अधिकार नहीं था।
मद्रास हाईकोर्ट ने मार्च 2019 में इस लेन-देन को चुनौती देने वाली रिट याचिका खारिज की। कोर्ट ने माना कि एक्ट की धारा 34 में उपहार (गिफ्ट) या समझौते का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं है, इसलिए यह उपहार के जरिए संपत्ति के हस्तांतरण पर रोक नहीं लगाती है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान, तमिलनाडु सरकार ने स्वीकार किया कि यह जमीन 'इनाम' (inam) संपत्ति थी, जो देवता के भरण-पोषण और रखरखाव के लिए दी गई। राज्य सरकार ने यह भी माना कि धारा 41 उपहार देने पर रोक लगाती है और राजस्व विभाग इस जमीन को केवल एक पट्टेदार (lessee) के रूप में ही अपने पास रख सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि संपत्ति की प्रकृति को देखते हुए यह लेन-देन HR&CE एक्ट की धारा 34 के बजाय धारा 41 के दायरे में आता है।
धारा 41 के अनुसार, किसी धार्मिक संस्थान के भरण-पोषण या रखरखाव के लिए दी गई 'इनाम' जमीन का उपहार 'शून्य' (null and void) माना जाता है। हालांकि यह प्रावधान सरकार को कुछ ऐसे लेन-देनों को मंजूरी देने की अनुमति देता है, जो संस्थान के लिए जरूरी या फायदेमंद हों, लेकिन इसमें उपहारों को स्पष्ट रूप से उन लेन-देनों से बाहर रखा गया, जिन्हें मंजूरी दी जा सकती है।
कोर्ट ने कहा,
"इस तरह विधायिका ने जानबूझकर 'इनाम' संपत्ति के उपहार को ऐसी स्थिति में रखा है, जहां कमिश्नर या सरकार द्वारा बाद में भी इसे वैध नहीं ठहराया जा सकता।"
कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसा उपहार 'शुरुआत से ही शून्य' (void ab initio) होता है और बाद में किसी भी मंजूरी के जरिए इसे वैध नहीं बनाया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि तमिलनाडु में लागू 'रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908' की धारा 22-A के तहत जरूरी कानूनी मंजूरी के अभाव में इस उपहार विलेख (gift deed) का वैध तरीके से पंजीकरण नहीं किया जा सकता।
अगर धारा 34 लागू भी होती, तब भी यह लेन-देन अमान्य ही रहता, क्योंकि इसके लिए कमिश्नर की जरूरी मंजूरी और सरकार की पूर्व अनुमति नहीं ली गई।
राज्य सरकार मंदिर की जमीन को अपनी संपत्ति नहीं मान सकती
इस तर्क को खारिज करते हुए कि यह ट्रांसफर जनहित में किया गया, कोर्ट ने जोर देकर कहा कि मंदिर की संपत्तियों पर राज्य सरकार का नियामक अधिकार (Regulatory Authority) होने का मतलब यह नहीं है कि वह उनकी मालिक बन गई। इसमें यह देखा गया कि किसी देवता को समर्पित संपत्ति अब दानकर्ता की नहीं रहती, बल्कि वह उस देवता और उन उपासकों के समुदाय के लिए हो जाती है, जिनकी सेवा के लिए वह संपत्ति दी गई।
फैसले में कहा गया,
"हर संरक्षक इसे केवल देवता और उन भक्तों की अमानत के रूप में रखता है, जिनकी वह सेवा करता है।"
अदालत ने स्पष्ट किया कि HR&CE Act की धारा 27 और 28 के तहत ट्रस्टियों को धार्मिक संस्थानों और उनकी संपत्तियों का प्रबंधन उसी सावधानी से करना चाहिए, जैसी कोई समझदार व्यक्ति अपने निजी मामलों के प्रबंधन में बरतता है।
चूंकि उपहार (गिफ्ट) बिना किसी प्रतिफल (बदले में कुछ लिए बिना) के दिया जाता है, इसलिए इसे आमतौर पर 'समझदारी भरा प्रबंधन' नहीं माना जा सकता, क्योंकि इससे संस्थान को कोई लाभ नहीं मिलता है।
अदालत ने कहा,
"मंदिर की संपत्ति देवता के लिए होती है, न कि ट्रस्टी के पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा मनमाने ढंग से बांटने के लिए—भले ही उसका इरादा कितना भी नेक क्यों न हो।"
अदालत ने आगे कहा कि राज्य, संरक्षक होने के नाते अपनी जिम्मेदारियों से केवल इसलिए नहीं बच सकता, क्योंकि वह एक संप्रभु सत्ता (Sovereign) भी है।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के आचरण की आलोचना की
अदालत ने इस बात पर गौर किया कि राज्य ने 'गिफ्ट डीड' (उपहार विलेख) का बचाव तब भी जारी रखा, जब उसके अपने 'हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त विभाग' (Hindu Religious and Charitable Endowments Department) ने यह स्पष्ट कर दिया कि जमीन देवता की है और ट्रस्टी को इसे हस्तांतरित करने का कोई अधिकार नहीं है।
राजस्व विभाग ने जमीन को 'तालुक कार्यालय' के नाम पर दर्ज (म्यूटेशन) किया, इसे सरकारी जमीन के रूप में वर्गीकृत कर दिया और सार्वजनिक धन का उपयोग करके वहां निर्माण कार्य भी शुरू किया।
राज्य ने अपना रुख तब बदला, जब सुप्रीम कोर्ट ने बंदोबस्त विभाग के प्रभारी सचिव को यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया कि क्या कोई ट्रस्टी मंदिर की संपत्ति को उपहार में दे सकता है।
अदालत ने कहा कि मंदिर की संपत्ति का वैधानिक संरक्षक होने के नाते, राज्य को शुरू से ही कानूनी स्थिति को समझ लेना चाहिए।
फैसले में कहा गया,
"राज्य द्वारा देर से अपनी गलती मानने से यह तथ्य नहीं छिप जाता कि चार साल से अधिक समय तक मंदिर की संपत्ति को सरकारी संपत्ति माना गया। यह सब एक ऐसे दस्तावेज (डीड) के आधार पर हुआ, जिसे राज्य ने खुद स्वीकार किया कि उसे कानून की कोई मान्यता प्राप्त नहीं थी।"
हालांकि अदालत ने 'गिफ्ट डीड' को अमान्य घोषित किया, लेकिन उसने राज्य के पक्ष में बनी लीज (पट्टे) रद्द करने से इनकार किया। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि तालुक कार्यालय का निर्माण पहले ही सार्वजनिक धन से हो चुका था और वह उस क्षेत्र की प्रशासनिक जरूरतों को पूरा कर रहा था।
हालांकि, अदालत ने मंदिर को दिए जाने वाले किराए की समीक्षा करना जरूरी समझा।
शुरुआत में समिति ने इसका मासिक किराया 13,235 रुपये तय किया। राज्य सरकार के तय फॉर्मूले को लागू करते हुए - जिसके तहत धार्मिक संस्थानों की ज़मीन का मूल्य उसकी गाइडलाइन वैल्यू या मार्केट वैल्यू (जो भी ज़्यादा हो) के 225% पर आंका जाता है - कोर्ट ने ज़मीन और इमारत की कुल कीमत ₹3.04 करोड़ तय की।
समिति के फॉर्मूले के अनुसार, कुल कीमत का 0.1% किराया तय करते हुए कोर्ट ने मासिक किराया लगभग ₹30,438 निकाला, जिसे राउंड ऑफ करके ₹31,000 कर दिया गया।
यह बढ़ा हुआ किराया 8 मार्च, 2019 से लागू होगा (पिछली तारीख से), जब निर्माण कार्य के लिए ज़मीन सौंपी गई। राज्य सरकार को पहले से भुगतान की गई रकम को घटाकर बाकी बची बकाया राशि का भुगतान तीन महीने के भीतर करना होगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मंदिर ट्रस्ट के पास HR&CE Act के अनुसार लीज़ की अवधि, उसके नवीनीकरण और अन्य शर्तों को तय करने का अधिकार होगा, जिसमें मंदिर के हितों को सबसे ऊपर रखा जाएगा। किराए की समीक्षा हर तीन साल में एक बार होनी चाहिए और इसे ₹31,000 प्रति माह से कम नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और HR&CE विभाग को निर्देश दिया कि धार्मिक संस्थानों की संपत्ति से जुड़े किसी भी लेन-देन को मंज़ूरी देने या लागू करने से पहले वे 1959 के एक्ट की धारा 34, 34-A और 41, तथा उनके तहत बने नियमों का सख्ती से पालन करें।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि धार्मिक और धर्मार्थ संस्थानों की संपत्तियों से जुड़े फैसले लेते समय सरकार की प्रशासनिक सुविधा के बजाय संस्थान के हितों और लाभ को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
कोर्ट ने कहा,
"एक संरक्षक (कस्टोडियन) के रूप में राज्य न तो खुद इन धार्मिक/धर्मार्थ संस्थानों की संपत्ति हड़प सकता है, और न ही अपने किसी अधिकारी को ऐसा करने की अनुमति दे सकता है, जिनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी राज्य पर है।"
कोर्ट ने आगे कहा कि अगर कोई लेन-देन इस सिद्धांत का उल्लंघन करता है तो उसे रद्द किया जा सकता है - भले ही उसे कोई भी नाम दिया गया हो या उसका कोई भी सार्वजनिक उद्देश्य बताया गया हो।
कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट का फैसला पलट दिया, 'गिफ्ट डीड' (उपहार विलेख) को अमान्य घोषित किया, बकाया किराए का भुगतान करने का निर्देश दिया और राज्य सरकार पर ₹1 लाख का जुर्माना लगाया, जिसका भुगतान आठ सप्ताह के भीतर मंदिर को किया जाना है।
Case Title : K Ramalingam and Others v. Government of Tamil Nadu and Others

