Delhi Women Safety | सुप्रीम कोर्ट का आदेश: पुलिस पेट्रोलिंग बढ़ाएं, कैब-बस ड्राइवरों की जांच करें और गैर-कानूनी शराब की दुकानें बंद करें

  • Delhi Women Safety | सुप्रीम कोर्ट का आदेश: पुलिस पेट्रोलिंग बढ़ाएं, कैब-बस ड्राइवरों की जांच करें और गैर-कानूनी शराब की दुकानें बंद करें

    दिल्ली-NCR में हाल ही में हुई रेप की घटनाओं पर खुद संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (5 अक्टूबर) को दिल्ली पुलिस, स्थानीय प्रशासन और ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट को तुरंत बचाव के उपाय करने का निर्देश दिया। इन निर्देशों में बीट पेट्रोलिंग बढ़ाना, पब्लिक ट्रांसपोर्ट ड्राइवरों की सघन जांच और गैर-कानूनी शराब की दुकानों के खिलाफ कार्रवाई करना शामिल है।

    जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने चिंता जताते हुए कहा कि सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि सही निर्देश मौजूद हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या उन निर्देशों का ज़मीनी स्तर पर लगातार, दिखने वाला और वेरिफ़ाई किया जा सकने वाला असर हो रहा है।

    बेंच ने दिल्ली-NCR में नाबालिग लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों की कई घटनाओं की रिपोर्ट के बाद खुद संज्ञान लिया। इनमें आस्था कुंज पार्क में 17 साल की लड़की के साथ कथित गैंगरेप, स्वरूप नगर में एक टीनएज लड़की के साथ कथित गैंगरेप और हत्या, और चलती स्लीपर बस में नाबालिग लड़की के साथ कथित यौन उत्पीड़न की घटनाएं शामिल हैं। बस ग्रेटर नोएडा से दिल्ली तक 47 किलोमीटर से ज़्यादा चली और उसे कहीं रोका नहीं गया। बेंच ने कहा कि ये घटनाएं कानून लागू करने वाली एजेंसियों और पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की बुनियादी सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने में सिस्टम की विफलता को दिखाती हैं। उन्होंने कहा कि सिर्फ़ एकजुटता दिखाना काफ़ी नहीं है और अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।

    पिछले महीने, इन घटनाओं पर खुद संज्ञान लेने के बाद बेंच ने अंतरिम निर्देश जारी किए थे। सीनियर एडवोकेट लिज़ मैथ्यू को एमिकस (न्यायालय मित्र) नियुक्त किया गया।

    सोमवार को बेंच ने कहा,

    "इस कार्यवाही और इसमें जारी निर्देशों का मकसद प्रोटोकॉल बढ़ाना या प्रशासनिक अनुपालन की एक और परत बनाना नहीं है। बल्कि, यह पता लगाना है कि क्या पुलिस द्वारा पहले से बनाए गए सिस्टम बचावकारी पुलिसिंग के सक्रिय तरीकों के तौर पर काम कर रहे हैं या वे काफ़ी हद तक सिर्फ़ कागज़ी कार्रवाई तक ही सीमित रह गए।"

    बेंच के सामने मैथ्यू ने कहा कि पूरी दिल्ली में बीट पेट्रोलिंग बढ़ाने की तुरंत ज़रूरत है। उन्होंने 2020 की 'कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल' (CAG) की रिपोर्ट का भी ज़िक्र किया, जिसमें बीट पेट्रोलिंग और जांच जैसे कामों में पुलिस स्टाफ़ की लगभग 39% कमी बताई गई। यह जानकारी 15 पुलिस ज़िलों में से छह और 72 पुलिस स्टेशनों के ऑडिट से मिली थी।

    शिकायत निवारण के बारे में बात करते हुए मैथ्यू ने सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ी कमियों की शिकायतों के लिए कई प्लेटफ़ॉर्म बताए, जैसे कि मुख्यमंत्री जन सुनवाई पोर्टल, PWD सेवा 2.0, और हेल्पलाइन नंबर - 311 (दिल्ली नगर निगम), 311 (नई दिल्ली नगर निगम) और दिल्ली पुलिस 112 हेल्पलाइन। उन्होंने कहा कि इतने सारे प्लेटफ़ॉर्म होने से अनपढ़ और आम लोगों को यह समझने में उलझन होती है कि वे किस अधिकारी से संपर्क करें।

    उन्होंने यह भी कहा कि हो सकता है कि कई लोगों के पास स्मार्टफ़ोन न हों या उन्हें डिजिटल जानकारी न हो। उन्होंने जवाबदेही पक्की करने के लिए ऑटोमेटेड टाइमस्टैम्पिंग और जियो-मैपिंग/जियो-फेंसिंग के साथ पुलिस पेट्रोलिंग की निगरानी के लिए QR कोड का भी सुझाव दिया।

    सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे ने केंद्र सरकार की ओर से बेंच को बताया कि दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA), MCD, NDMC और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अधिकारियों के साथ मिलकर बातचीत शुरू कर दी है। वे बेंच द्वारा पहले दिए गए अंतरिम निर्देशों का "तुरंत पालन" करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं।

    कोर्ट ने कहा कि इस कार्यवाही का मकसद अपराध रोकने और आपातकालीन स्थिति में कार्रवाई करने के मौजूदा सिस्टम में कमियों की पहचान करना और उन्हें दूर करना है। साथ ही प्रतिवादियों से यह भी कहा गया कि वे पॉलिसी और उसके लागू होने में किसी भी कमी की पहचान करें और उसे ठीक करें।

    ब्रोकन विंडोज़ थ्योरी

    प्रोफ़ेसर जेम्स क्यू. विल्सन और जॉर्ज एल. केलिंग की 'ब्रोकन विंडोज़ थ्योरी' को लागू करते हुए बेंच ने ये बातें कहीं:

    “खराब या अपर्याप्त स्ट्रीटलाइट, काम न करने वाला CCTV कैमरा, बिना निगरानी वाला अंधेरा इलाका, या जनता की अनसुनी शिकायत—ये सब अलग-अलग देखने पर छोटी-मोटी प्रशासनिक या बुनियादी ढांचे की कमियां लग सकती हैं। लेकिन, जब ऐसी कमियां लंबे समय तक बनी रहती हैं और उन पर ध्यान नहीं दिया जाता, तो वे मिलकर लापरवाही और कम सतर्कता का संकेत देती हैं।”

    बेंच ने आगे कहा,

    “जिन कमियों की पहचान की जा सकती है और जिन्हें ठीक किया जा सकता है, उन्हें तब तक नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि वे किसी वास्तविक अपराध का कारण न बन जाएं। मकसद यह होना चाहिए कि लापरवाही या असुरक्षा के संकेत मिलते ही कदम उठाए जाएं, ताकि लाइटिंग, निगरानी और गश्त में टाली जा सकने वाली कमियों के कारण सार्वजनिक जगहों पर अव्यवस्था न फैले या अपराध को बढ़ावा न मिले।”

    बेंच ने यह भी कहा कि अपराध का पता लगाना और उसे रोकना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि अपराध को सुलझाना और दोषियों पर मुकदमा चलाना। इसने समर्पित कंट्रोल-रूम कमांड सेंटर या वॉर रूम के जरिए पुलिस गश्त और CCTV की रियल-टाइम निगरानी पर जोर दिया, जिसका जुड़ाव फील्ड-लेवल रिस्पॉन्स सिस्टम से होना चाहिए।

    कोर्ट ने आगे कहा,

    “अपराध रोकने के लिए की जाने वाली पुलिसिंग (प्रिवेंटिव पुलिसिंग) को पुलिस की शक्तियों के मनमाने, अत्यधिक या जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल का बहाना नहीं बनाया जा सकता। जहां कानून के तहत दखल देना जरूरी हो, वहां पुलिस को सख्ती से काम करना चाहिए, लेकिन ऐसा दखल कानूनी दायरे, उचित अनुपात और जवाबदेही के भीतर होना चाहिए।”

    साथ ही कोर्ट ने चेतावनी दी कि अपराध रोकने की पुलिसिंग ज्यादती को सही नहीं ठहरा सकती। कोर्ट ने आगे कहा कि नागरिकों की सुरक्षा “न केवल अपराध से, बल्कि राज्य की शक्ति के गैर-कानूनी या जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल से भी” की जानी चाहिए।

    जारी किए गए निर्देश:

    खास बात यह है कि बेंच ने तुरंत निम्नलिखित उपाय करने के निर्देश दिए:

    दिल्ली भर में, खासकर शिक्षण संस्थानों और 'वल्नरेबिलिटी मैपिंग' (असुरक्षा वाले इलाकों की पहचान) के तहत चिह्नित क्षेत्रों में 'बीट पेट्रोलिंग' (पुलिस गश्त) बढ़ाई जाए, जैसा कि 28.09.2026 को निर्देश दिया गया था।

    सरकारी और निजी बसों, कैब, टैक्सी और रिक्शा के ड्राइवरों और सहायकों का सख्ती से वेरिफिकेशन किया जाए, चाहे वे ओला, उबर और रैपिडो जैसे ऐप-आधारित एग्रीगेटर्स से जुड़े हों या निजी तौर पर चल रहे हों। निर्देश दिया गया कि “केवल विधिवत पंजीकृत और सत्यापित व्यक्तियों को ही ऐसे वाहन चलाने की अनुमति दी जाएगी।” इसमें आगे यह भी निर्देश दिया गया कि ऐसी सभी गाड़ियों में वेरिफ़ाई किए गए ड्राइवर और असिस्टेंट के नाम और फ़ोटो इस तरह से दिखाए जाएं कि वे यात्रियों को साफ़ दिखें, और संबंधित इलाके के रोड ट्रांसपोर्ट ऑफ़िसर की यह ज़िम्मेदारी होगी कि वह इसे पक्का करे।

    शिकायत दर्ज करने के लिए एक खास सुविधा दी जानी चाहिए, खासकर सरकारी बसों, प्राइवेट बसों, कैब, टैक्सी और उन रिक्शों के लिए जो ऐप-बेस्ड सर्विस से जुड़े नहीं हैं। यूनिफ़ॉर्म या पहचान के लिए कोई दूसरी साफ़ दिखने वाली चीज़ तय की जानी चाहिए और जहां पहले से तय है, वहां उसे रोज़ पहनना ज़रूरी होना चाहिए।

    किसी और को काम पर रखने या गाड़ी किराए पर देने (सब-लेटिंग) से पहले रजिस्ट्रेशन और वेरिफ़िकेशन ज़रूरी होना चाहिए, और बिना वेरिफ़ाई किए गए ड्राइवर को गाड़ी देना मना होना चाहिए। वेरिफ़िकेशन के लिए गाड़ी की जांच करने वाली जगहों (चेकपॉइंट) का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, जिसमें समय-समय पर और अचानक की जाने वाली जांच भी शामिल हो।

    अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे 'एस. राजशेखरन बनाम भारत संघ और अन्य' मामले में गाड़ी ट्रैकिंग सिस्टम डिवाइस के बारे में दिए गए निर्देशों के लागू होने की जांच करें और यह देखें कि ऐसी निगरानी को पुलिस के इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम के साथ कैसे जोड़ा गया, जिसमें समय-समय पर और अचानक की जाने वाली जांच भी शामिल हो।

    SOS सिस्टम को चालू करने के बारे में बेंच ने कहा कि "जब तक किसी को यह ठीक से पता न हो कि SOS बटन दबाने पर क्या मदद मिलेगी, तब तक उसे इस्तेमाल करने में हिचकिचाहट हो सकती है।" इसलिए, अधिकारियों को मौजूदा SOS रिस्पॉन्स प्रोटोकॉल, ज़िम्मेदार कर्मचारी या यूनिट, कार्रवाई में लगने वाला समय (अगर कोई हो) और नियमों के पालन की निगरानी के तरीके का ब्यौरा रिकॉर्ड पर रखना चाहिए।

    बेंच ने यह भी निर्देश दिया कि ऐसे ट्रक, भारी गाड़ियां और दूसरी गाड़ियां जो अक्सर गलत तरीके से पार्क की जाती हैं और जिनसे देखने में रुकावट आती है, 'ब्लाइंड स्पॉट' बनते हैं या जिनमें बिना इजाज़त वाले लोग रहते हैं, उनकी पहचान करके उन्हें हटाया जाए।

    शराब की दुकानों के मामले में कोर्ट ने गैर-कानूनी शराब की दुकानों और ठिकानों की पहचान करने और उन पर कार्रवाई करने का निर्देश दिया, खासकर उन खाने-पीने की जगहों पर जो गैर-कानूनी तरीके से शराब बेचती हैं। बीट अधिकारियों को यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया कि शराब की दुकानों के आसपास फालतू घूमने वाले या भीड़ लगाने वाले लोगों को तुरंत हटाया जाए।

    नागरिकों की भागीदारी और ट्रेनिंग:

    इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस और स्थानीय प्रशासन को एक तय अधिकारी की देखरेख में नागरिकों के साथ नियमित बैठकें करने पर विचार करना चाहिए, ताकि शिकायतें सीधे मिल सकें और उन पर की गई कार्रवाई की निगरानी हो सके। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि नागरिकों को भरोसा दिलाया जाना चाहिए कि उनकी जानकारी "संवेदनशीलता से ली जाएगी, उस पर तुरंत कार्रवाई की जाएगी और जहां ज़रूरी हो, उसे गोपनीय रखा जाएगा।"

    कोर्ट ने खास तौर पर शिक्षण संस्थानों और युवा महिलाओं व लड़कियों के लिए बने पेइंग-गेस्ट आवासों के आस-पास के इलाकों का ज़िक्र किया।

    कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि संवेदनशील इलाकों में संयुक्त गश्त (पेट्रोलिंग) को मज़बूत किया जाए और सीनियर अधिकारी बीट पेट्रोलिंग अधिकारियों के साथ नियमित बैठकें करें। बीट पेट्रोलिंग के नियमों, जिसमें PCR वैन की तैनाती और उनके रुकने की जगह शामिल है, की समीक्षा की जानी चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिसकर्मियों की भर्ती के समय ही उन्हें 'प्रिवेंटिव पुलिसिंग' (अपराध रोकने वाली पुलिसिंग) की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए और समय-समय पर और ट्रेनिंग देकर इसे मज़बूत किया जाना चाहिए।

    रिपोर्ट मांगी गई:

    पुलिस कमिश्नर और मुख्य सचिव से एक संयुक्त रिपोर्ट मांगी गई है कि क्या दिल्ली में खास कंट्रोल-रूम कमांड सेंटर हैं, उनकी संख्या और कवरेज क्या है, और रियल-टाइम तालमेल और इमरजेंसी में तैनाती के नियम क्या हैं।

    पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया गया कि वे पिछले तीन महीनों में सौंपी गई साप्ताहिक रिपोर्ट की कॉपी और उनका एक मिला-जुला विश्लेषण रिकॉर्ड पर रखें, क्योंकि बेंच यह जानना चाहती है कि "क्या 'शिष्टाचार स्क्वाड' सिर्फ़ कागज़ों पर मौजूद हैं," या वे असल में कितने सक्रिय रहे हैं और उन पर क्या कार्रवाई की गई।

    'ऑपरेशन निर्भीक' और 'नाज़ुक स्कीम' के बारे में, बेंच ने शिकायत करने वालों की सुरक्षा और बचाव के तरीकों, उनकी पहचान और गोपनीयता की सुरक्षा, और बदले की कार्रवाई, डराने-धमकाने, परेशान करने या किसी भी तरह के बुरे असर को रोकने के उपायों पर एक विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट मांगी है।

    कोर्ट ने पुलिस में स्टाफ की स्थिति पर भी रिपोर्ट मांगी, जिसमें CAG की टिप्पणियों पर ध्यान दिया जाए, और 'मैथ्यूज QR कोड मॉडल' के लागू होने की संभावना पर भी रिपोर्ट मांगी। पिछले महीने, दिल्ली हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल से दिल्ली में फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) और POCSO स्पेशल कोर्ट के बारे में एक हलफनामा (Affidavit) दाखिल करने को कहा गया। इसमें चालू कोर्ट की संख्या, हर कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या, पिछले तीन सालों में मामलों के निपटारे की सालाना दर और अंतिम निपटारे में लगने वाले औसत समय की जानकारी देनी थी। रजिस्ट्रार जनरल को 06.11.2026 को या उससे पहले यह रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया।

    उल्लेखनीय है कि बेंच ने निर्देश दिया है कि यह जानकारी दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव और दिल्ली पुलिस कमिश्नर द्वारा दाखिल किए जाने वाले हलफनामों में शामिल की जानी चाहिए।

    बेंच ने कहा,

    "अगर किसी भी चरण में हमें पता चलता है कि हमारे निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है, उन्हें लागू नहीं किया जा रहा है या उन्हें उतनी गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है जितनी ज़रूरी है, तो इन दोनों अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया जाएगा।"

    इस मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर, 2026 को होगी। साथ ही, कोर्ट ने बेंच के सामने मौजूद अधिकारियों को अगली तारीख पर भी मौजूद रहने का निर्देश दिया।

    Case Title : In Re: Recent Rape Incidents in Delhi NCR

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