सुप्रीम कोर्ट मंथली राउंड अप : अप्रैल, 2026

Shahadat

9 May 2026 1:30 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट मंथली राउंड अप : अप्रैल, 2026

    सुप्रीम कोर्ट में अप्रैल, 2026 में क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट मंथली राउंड अप। अप्रैल महीने के सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

    स्वतंत्र सहकारी समितियां अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य' नहीं हैं; उनकी चुनाव प्रक्रिया रिट अधिकार क्षेत्र के अधीन नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    राजस्थान में जिला दुग्ध संघों की प्रबंधन समिति के चुनाव से जुड़े विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फैसला सुनाया कि जिला दुग्ध संघ स्वतंत्र सहकारी समितियां हैं, जो हाईकोर्ट के रिट अधिकार क्षेत्र के अधीन नहीं हैं।

    जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि राजस्थान हाईकोर्ट ने जिला दुग्ध संघों द्वारा बनाए गए उप-नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करके गलती की, क्योंकि जिला दुग्ध संघों को संविधान के अनुच्छेद 12 के अर्थ के भीतर "राज्य के उपकरण" के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है।

    Case Title: RAM CHANDRA CHOUDHARY & ORS VERSUS ROOP NAGAR DUGDH UTPADAK SAHAKARI SAMITI LIMITED AND OTHERS, CIVIL APPEAL NO. 4352 OF 2026

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    वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फिर दोहराया कि न तो वोट देने का अधिकार और न ही चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार है। ये दोनों अधिकार एक-दूसरे से अलग हैं और चुनाव लड़ने का अधिकार ज़्यादा सख़्त नियमों के अधीन है, जैसे कि योग्यता, अयोग्यता और संस्थागत ज़रूरतों के मामले में।

    जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने राजस्थान में ज़िला दुग्ध संघों से जुड़े एक चुनावी विवाद पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।

    Case Title: RAM CHANDRA CHOUDHARY & ORS VERSUS ROOP NAGAR DUGDH UTPADAK SAHAKARI SAMITI LIMITED AND OTHERS, CIVIL APPEAL NO. 4352 OF 2026

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    मालिकाना हक की घोषणा के लिए बाद में दायर किया गया कोई भी मुकदमा CPC की धारा 11 के स्पष्टीकरण IV के तहत वर्जित होगा: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (9 अप्रैल) को यह स्पष्ट किया कि मालिकाना हक की घोषणा के लिए बाद में दायर किया गया कोई भी मुकदमा CPC की धारा 11 के स्पष्टीकरण IV (रचनात्मक रेस ज्यूडिकाटा) के तहत वर्जित होगा, यदि वादी ने स्थायी निषेधाज्ञा के लिए दायर पहले के मुकदमे में, जहां मालिकाना हक विवादित था, मालिकाना हक की घोषणा की मांग करना छोड़ दिया था।

    कोर्ट ने यह माना कि चूंकि मालिकाना हक का दावा प्राथमिक मुकदमे में उठाया जा सकता था और उठाया जाना भी चाहिए था, इसलिए संबंधित पक्ष को नए मुकदमे में उस मुद्दे पर दोबारा मुकदमा चलाने से रोक दिया गया।

    Cause Title: CHANNAPPA (D) THR. LRS. VS. PARVATEWWA (D) THR. LRS.

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    कई अपराधों के लिए जब जेल की सज़ाएं एक साथ चलती हैं तो जुर्माना भी एक साथ ही चलता है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (8 अप्रैल) को यह टिप्पणी की कि जहां अलग-अलग अपराधों के लिए दी गई सज़ाओं को एक साथ (Concurrently) चलाने का निर्देश दिया गया हो, वहां हर अपराध के लिए अलग से जुर्माना नहीं लगाया जा सकता। कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि दो अपराधों की सज़ा के हिस्से के तौर पर अलग से लगाया गया जुर्माना भी, जेल की सज़ाओं के साथ-साथ ही माना जाएगा।

    Cause Title: HEM RAJ VERSUS THE STATE OF HIMACHAL PRADESH

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    अनारक्षित श्रेणी में PwD के लिए क्षैतिज रूप से आरक्षित पद SC/ST/OBC दिव्यांग उम्मीदवारों के लिए भी खुले हैं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (7 अप्रैल) को यह टिप्पणी की कि जब किसी अनारक्षित सीट पर क्षैतिज आरक्षण लागू होता है तो उस अनारक्षित सीट के लिए प्रतिस्पर्धा करने का अधिकार उन सभी उम्मीदवारों को होता है जिनके पास वह क्षैतिज विशेषता (Horizontal Attribute) मौजूद है, चाहे वे SC, ST, OBC या सामान्य श्रेणी के हों।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। इस मामले में वेस्ट बंगाल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी ट्रांसमिशन कंपनी लिमिटेड में जूनियर सिविल इंजीनियर के एक पद को यूआर (PWD-LV) के तहत अधिसूचित किया गया। यह एक अनारक्षित पद है, जिसे दिव्यांग व्यक्तियों (कम दृष्टि/दृष्टिहीनता) के लिए क्षैतिज रूप से आरक्षित किया गया। प्रतिवादी नंबर 3 OBC-A (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) श्रेणी से संबंधित है, जिसमें PWD-LV की विशेषताएं मौजूद हैं। उसे कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा इस पद के लिए चयनित होने से वंचित कर दिया गया, जबकि उसने UR (PWD-LV) श्रेणी के उम्मीदवार की तुलना में अधिक अंक प्राप्त किए।

    Cause Title: THE WEST BENGAL STATE ELECTRICITY TRANSMISSION CO.LTD & ORS. VERSUS DIPENDU BISWAS & ORS.

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    दरगाह के सज्जादानशीन और वक्फ के मुतवल्ली एक जैसे नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दोहराया कि दरगाह के सज्जादानशीन का पद वक्फ के मुतवल्ली के पद से मूल रूप से अलग है। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सज्जादानशीन का पद मुख्य रूप से एक आध्यात्मिक पद है, जबकि मुतवल्ली का पद एक धर्मनिरपेक्ष प्रशासनिक भूमिका है।

    जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कर्नाटक की दरगाह के सज्जादानशीन पद के उत्तराधिकार से जुड़े एक विवाद पर फैसला सुनाते हुए यह टिप्पणी की।

    Case Title: SYED MOHAMMED GHOUSE PASHA KHADRI versus SYED MOHAMMED ADIL PASHA KHADRI & ORS. ETC., CIVIL APPEAL NOS. 13345 - 13346 OF 2015

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    किसी को 'बास्टर्ड' कहना IPC की धारा 294 के तहत अश्लीलता का अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (6 अप्रैल) को कहा कि सिर्फ़ गाली-गलौज या अश्लील भाषा का इस्तेमाल करना, जिसमें कोई यौन या कामुक तत्व न हो, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 294 के तहत अश्लीलता का अपराध नहीं माना जाएगा।

    जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने IPC की धारा 294(b) के तहत दो आरोपियों की सज़ा रद्द की। इन आरोपियों पर आरोप था कि उन्होंने पारिवारिक संपत्ति विवाद को लेकर हुई तीखी बहस के दौरान "बास्टर्ड" (हरामखोर) शब्द का इस्तेमाल किया था।

    Cause Title: SIVAKUMAR VERSUS STATE REP. BY THE INSPECTOR OF POLICE (with connected case)

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    ज़मानत की शर्त के तौर पर आरोपी की संपत्ति बेचने का आदेश नहीं दिया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ज़मानत की शर्तें दंडात्मक या निर्णायक प्रकृति की नहीं होनी चाहिए, और वे किसी आरोपी को ज़मानत की शर्त के तौर पर उसकी संपत्ति बेचने की मांग करके, उसकी संपत्ति का इस्तेमाल करने के अधिकार से वंचित नहीं कर सकतीं।

    जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने मद्रास हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया। उस आदेश में धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात के मामले में ज़मानत देने की शर्त के तौर पर आरोपी की अचल संपत्तियों को बेचने की शर्त रखी गई।

    Cause Title: FEROZE BASHA & ANR. VERSUS STATE OF TAMIL NADU

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    पति के खिलाफ दहेज लेने की शिकायत के आधार पर पत्नी और उसके परिवार पर 'दहेज देने' के लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (16 अप्रैल) को फैसला सुनाया कि किसी महिला या उसके परिवार के सदस्यों पर 'दहेज लेने वालों' के खिलाफ अपनी शिकायत में किए गए दावों के आधार पर 'दहेज देने' के लिए दहेज निषेध अधिनियम के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती।

    जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने एक पति द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपनी पत्नी और उसके परिवार के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग की थी।

    Cause Title: Rahul Gupta versus Station House Officer and others

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    आपसी सहमति से तलाक के लिए समझौते के बाद सहमति वापस नहीं ले सकता जीवनसाथी : सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि भले ही आपसी सहमति से तलाक के मामलों में कोई भी पक्ष अंतिम डिक्री से पहले अपनी सहमति वापस ले सकता है, लेकिन यदि पति-पत्नी के बीच सभी विवादों का पूर्ण और अंतिम समझौता (Full & Final Settlement) हो चुका हो, तो उस समझौते की शर्तों से पीछे हटना स्वीकार्य नहीं है।

    जस्टिस राजेश बिंडल और जस्टिस विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस मामले में की, जिसमें पत्नी द्वारा अदालत-मान्य मध्यस्थता समझौते से पीछे हटने पर कड़ी नाराज़गी जताई गई।

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    S.156(3) CrPC/S.175(3) BNSS | आरोपी के बचाव पर भरोसा करके मजिस्ट्रेट के जांच का आदेश रद्द नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट अपनी अंतर्निहित विवेकाधीन शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए मजिस्ट्रेट द्वारा निर्देशित पुलिस जांच को तब तक नहीं रोक सकते, जब तक कि शिकायत में पहली नज़र में कोई संज्ञेय अपराध सामने न आता हो।

    कोर्ट ने कहा कि इस चरण पर कोर्ट को शिकायत में लगाए गए आरोपों और शिकायतकर्ता द्वारा पेश की गई सामग्री तक ही सीमित रहना चाहिए। साथ ही आरोपी द्वारा पेश किए गए बचावों की जांच करने के लिए उनसे आगे नहीं जाना चाहिए।

    Cause Title : ACCAMMA SAM JACOB VERSUS THE STATE OF KARNATAKA & ANR. ETC.

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    West Bengal SIR | जिन लोगों की अपीलें पेंडिंग, उन्हें 2026 के चुनावों में वोट देने की इजाज़त नहीं दी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इस बात पर हिचकिचाहट ज़ाहिर की कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए , उन्हें आने वाले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में वोट देने की इजाज़त दी जाए, जबकि उनकी अपीलें अभी अपीलीय ट्रिब्यूनलों के सामने पेंडिंग हैं। पिछले हफ़्ते भी कोर्ट ने कुछ ऐसी ही राय ज़ाहिर की थी।

    हालांकि, कोर्ट ने संकेत दिया कि वह उस अर्ज़ी पर विचार कर सकता है, जिसमें सप्लीमेंट्री लिस्ट जारी करने की इजाज़त मांगी गई ताकि उन लोगों को शामिल किया जा सके, जिनकी अपीलें विधानसभा चुनावों से पहले मंज़ूर हो जाती हैं। ये चुनाव 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में होने हैं।

    Case Title – Mostari Banu v. Election Commission of India and Ors and connected cases.

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    मस्जिद से जुड़ी 'सर्विस इनाम' ज़मीन वक्फ़ संपत्ति, इसे बेचा नहीं जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (24 अप्रैल) को कहा कि मस्जिदों से जुड़ी जिन ज़मीनों को 'सर्विस इनाम' कहा जाता है, वे वक्फ़ संपत्ति का हिस्सा होती हैं, और इसलिए उन्हें बेचा नहीं जा सकता।

    जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा, "यह बात बिना किसी विवाद के तय है कि धार्मिक या चैरिटी के कामों के लिए 'सर्विस इनाम' के तौर पर दी गई ज़मीनें दान की गई संपत्ति (Endowed Property) का रूप ले लेती हैं और उन पर सार्वजनिक या धार्मिक ट्रस्ट का अधिकार होता है, जिससे उन्हें बेचने या किसी और को देने पर रोक लग जाती है।"

    Cause Title: A.P. STATE WAKF BOARD THROUGH CHAIRPERSON VERSUS JANAKI BUSAPPA

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    अपील कोर्ट आरोपी की अपील के बिना भी सज़ा को पलट/बदल सकता है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अगर आरोपी सज़ा को चुनौती देने वाली अपील नहीं भी करता है तो भी अपील कोर्ट को सज़ा पलटने से रोका नहीं जा सकता। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा, “अपील कोर्ट को यह अधिकार है कि वह ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज किए गए नतीजों और सज़ा की सच्चाई की जांच करे और न्याय के हित में उसे पलटे, बदले या पक्का करे।”

    Cause Title: THE STATE OF ASSAM VERSUS MOINUL HAQUE @ MONU

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    नगर सीमा निर्धारण का विवाद सिविल कोर्ट नहीं तय कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि नगर सीमा (Municipal Limits) के निर्धारण से जुड़े विवादों पर सिविल कोर्ट सुनवाई नहीं कर सकते, क्योंकि यह विषय संबंधित कानूनों के तहत तय किया जाता है और विधायी क्षेत्राधिकार में आता है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस के. वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए यह स्पष्ट किया।

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    यूपी ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम के तहत ज़मीन का वर्गीकरण बदलने का SDO के पास कोई अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950 के तहत एक उप-विभागीय अधिकारी (SDO) के पास सार्वजनिक उपयोग की ज़मीन के तौर पर दर्ज ज़मीन का वर्गीकरण बदलने का कोई अधिकार नहीं है, ताकि उस पर भूमिधरी अधिकार दिए जा सकें।

    कोर्ट ने टिप्पणी की, "वैसे भी, उन्मूलन अधिनियम उप-विभागीय अधिकारी को ज़मीन की श्रेणी बदलने का कोई अधिकार नहीं देता है ताकि उसे धारा 132 के निषेधात्मक दायरे से बाहर लाया जा सके। ज़मीन की श्रेणी में किसी भी बदलाव के लिए उन्मूलन अधिनियम में एकमात्र तरीका धारा 117(6) में बताया गया, जो राज्य सरकार—और केवल राज्य सरकार—को यह अधिकार देता है कि वह गाँव सभा से ज़मीन वापस ले ले और एक नई घोषणा करके ऐसी ज़मीन को किसी स्थानीय प्राधिकरण को सौंप दे।"

    Case Title – Babu Singh v. Consolidation Officer and Others

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    CrPC की धारा 156(3) के तहत FIR दर्ज करने का निर्देश देने के लिए मजिस्ट्रेट को पहले से मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि न्यायिक मजिस्ट्रेट को CrPC की धारा 156(3) के तहत FIR दर्ज करने का निर्देश देने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 196/197 के तहत पहले से मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं होती।

    कोर्ट ने कहा, "CrPC की धारा 196 और 197 (या BNSS में संबंधित प्रावधानों) के तहत पहले से मंज़ूरी की ज़रूरत, संज्ञान लेने के चरण पर लागू होती है। यह CrPC की धारा 156(3)/BNSS की धारा 175(3) के तहत FIR दर्ज करने या जांच करने के संज्ञान-पूर्व चरण तक विस्तारित नहीं होती।"

    Case Title: Brinda Karat v.State of NCT of Delhi and others SLP(Crl) 5107/2023 (and connected cases)

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    जाली वसीयत पर आधारित संपत्ति खरीदने वाला खरीदार आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी जाली वसीयत (Will) के आधार पर खरीदी गई संपत्ति के मामले में, यदि खरीदार को उस जालसाजी की जानकारी नहीं थी, तो उसे आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने एक खरीदार के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब खरीद के समय खरीदार को कथित फर्जी वसीयत की जानकारी नहीं थी और वह संबंधित अवधि में विदेश में था, तो उसे धोखाधड़ीपूर्ण लेन-देन के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

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