पति के खिलाफ दहेज लेने की शिकायत के आधार पर पत्नी और उसके परिवार पर 'दहेज देने' के लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

17 April 2026 10:59 AM IST

  • पति के खिलाफ दहेज लेने की शिकायत के आधार पर पत्नी और उसके परिवार पर दहेज देने के लिए मुकदमा नहीं चलाया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (16 अप्रैल) को फैसला सुनाया कि किसी महिला या उसके परिवार के सदस्यों पर 'दहेज लेने वालों' के खिलाफ अपनी शिकायत में किए गए दावों के आधार पर 'दहेज देने' के लिए दहेज निषेध अधिनियम के तहत कार्रवाई नहीं की जा सकती।

    जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने एक पति द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपनी पत्नी और उसके परिवार के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग की थी।

    पति ने तर्क दिया कि चूंकि उसकी पत्नी ने उसके खिलाफ अपनी ही कानूनी शिकायत में दहेज देने की बात स्वीकार की थी, इसलिए उसने प्रभावी रूप से दहेज निषेध अधिनियम (DP Act) की धारा 3 के तहत एक अपराध कबूल कर लिया है, जो दहेज 'देने' को दंडनीय बनाता है। हालांकि, अदालत ने उसके इस प्रयास को खारिज कर दिया कि वह पत्नी के आरोपों को उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का आधार बनाए।

    DP Act की धारा 7(3) पर भरोसा करते हुए, जो दहेज देने वाले को मुकदमे से सुरक्षा प्रदान करती है यदि दहेज देने की बात दहेज की मांग के खिलाफ शिकायत में स्वीकार की गई हो, अदालत ने कहा कि "पत्नी और उसके परिवार के सदस्यों द्वारा, जो पीड़ित पक्ष हैं, पति और उसके परिवार के खिलाफ दहेज 'लेने' के संबंध में दिए गए बयान, DP Act की धारा 3 के तहत 'दहेज देने' के अपराध के लिए पत्नी और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ मुकदमा चलाने का आधार नहीं बन सकते।"

    शुरुआत में पत्नी ने पति और उसके परिवार के खिलाफ FIR दर्ज कराई, जिसमें उसने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A और दहेज निषेध अधिनियम, 1961 की धारा 3 के तहत अपराधों का आरोप लगाया।

    इसके जवाब में पति ने पत्नी और उसके परिवार के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, जिसमें उसने दहेज देने के अपराध का आरोप लगाया। उसका आरोप था कि हालांकि उसने और उसके परिवार ने दहेज नहीं लिया था, लेकिन पत्नी और उसके परिवार के सदस्यों द्वारा दिए गए इस आशय के बयान कि उन्होंने दहेज दिया, DP Act की धारा 3 के तहत दहेज 'देने' के अपराध का गठन करते हैं। मजिस्ट्रेट ने उसकी शिकायत को खारिज कर दिया और FIR दर्ज करने का निर्देश देने से इनकार किया।

    धारा 7 की सुरक्षा कब लागू नहीं होगी? अधिनियम की धारा 7(3) इस प्रकार है - "किसी भी अन्य कानून में, जो उस समय लागू हो, कुछ भी लिखा होने के बावजूद, अपराध से पीड़ित व्यक्ति द्वारा दिया गया बयान, उस व्यक्ति को इस अधिनियम के तहत अभियोजन का पात्र नहीं बनाएगा।"

    अदालत ने स्पष्ट किया,

    "जहां दहेज 'देने' के संबंध में स्वतंत्र सबूत पेश किए गए थे और केवल शिकायत तथा पीड़ित व्यक्तियों - यानी पत्नी और उसके परिवार के सदस्यों - द्वारा दिए गए बयानों पर ही भरोसा नहीं किया गया, वहां DP Act की धारा 3 के तहत दहेज 'देने' के अपराध के लिए FIR दर्ज करना संभव होता; क्योंकि ऐसी स्थिति में DP Act की धारा 7(3) के तहत 'पीड़ित व्यक्तियों' को मिलने वाला संरक्षण उन्हें उपलब्ध नहीं होता।"

    हालांकि, मामले के तथ्यों को जोड़ते हुए अदालत ने कहा कि एक बार जब यह साबित हो जाता है कि दहेज देने का अपराध केवल महिला या उसके परिवार के सदस्यों द्वारा की गई शिकायत/बयानों के आधार पर ही बनता है तो ऐसे मामलों में दहेज देने वाला व्यक्ति अभियोजन से सुरक्षित रहता है।

    अदालत ने कहा,

    "यदि किसी मामले में DP Act की धारा 3 के तहत दहेज 'देने' के अपराध को साबित करने के लिए केवल पत्नी और उसके परिवार के सदस्यों द्वारा की गई शिकायत और/या बयानों को ही आधार बनाया जाता है तो इसका अनिवार्य रूप से यह अर्थ होगा कि वे - 'पीड़ित व्यक्ति' होने के नाते - DP Act की धारा 7(3) के तहत प्राप्त प्रतिरक्षा (Immunity) के कवच से पूरी तरह सुरक्षित होंगे और केवल उन बयानों के आधार पर उन पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकेगा।"

    तदनुसार, अपील खारिज कर दी गई। इस प्रकार, मजिस्ट्रेट द्वारा पारित वह आदेश बरकरार रखा गया, जिसमें अपीलकर्ता के CrPC की धारा 156(3) के तहत दिए गए आवेदन के आधार पर प्रतिवादी की पत्नी के खिलाफ FIR दर्ज करने से इनकार किया गया था।

    अदालत ने फैसला सुनाया,

    "...याचिकाकर्ता के मामले में कोई दम नहीं है, क्योंकि उसकी पत्नी... और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ उसका आरोप केवल पत्नी की शिकायत और CrPC की धारा 161 के तहत पत्नी तथा उसके परिवार के सदस्यों द्वारा दर्ज कराए गए बयानों पर आधारित था। इसलिए DP Act की धारा 7(3) के तहत मिलने वाला वैधानिक संरक्षण उन पर लागू होता था।"

    Cause Title: Rahul Gupta versus Station House Officer and others

    Next Story