वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

11 April 2026 5:30 PM IST

  • वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फिर दोहराया कि न तो वोट देने का अधिकार और न ही चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार है। ये दोनों अधिकार एक-दूसरे से अलग हैं और चुनाव लड़ने का अधिकार ज़्यादा सख़्त नियमों के अधीन है, जैसे कि योग्यता, अयोग्यता और संस्थागत ज़रूरतों के मामले में।

    जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने राजस्थान में ज़िला दुग्ध संघों से जुड़े एक चुनावी विवाद पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।

    जस्टिस महादेवन द्वारा लिखे गए फ़ैसले में यह कहा गया:

    "यह बात पूरी तरह से तय है कि न तो वोट देने का अधिकार और न ही चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार है। ज्योति बसु और अन्य बनाम देवी घोषाल और अन्य (AIR 1982 SC 983) और जावेद और अन्य बनाम हरियाणा राज्य और अन्य (2003) 8 SCC 369) मामलों में इस कोर्ट ने पूरी अधिकारिता के साथ यह फ़ैसला दिया कि ये अधिकार प्रकृति में पूरी तरह से वैधानिक हैं और केवल उसी हद तक मौजूद हैं, जिस हद तक क़ानून द्वारा दिए गए। जहां वोट देने का अधिकार किसी सदस्य को वैधानिक योजना के अनुसार अपने मताधिकार का प्रयोग करने में सक्षम बनाता है, वहीं चुनाव लड़ने या चुने जाने का अधिकार एक अलग और अतिरिक्त अधिकार है, जिसे वैध रूप से योग्यता, पात्रता की शर्तों और अयोग्यता के अधीन किया जा सकता है।"

    इस विषय पर न्यायिक मिसालों का हवाला देते हुए, जिसमें सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम बी.डी. कौशिक का मामला भी शामिल है, कोर्ट ने कहा:

    "एक साफ़ सैद्धांतिक अंतर उभरकर सामने आता है: वोट देने का अधिकार, मताधिकार का प्रयोग करके चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार है। चुनाव लड़ने का अधिकार एक अलग और अतिरिक्त अधिकार है, जो किसी व्यक्ति को किसी पद के लिए चुनाव लड़ने में सक्षम बनाता है। बाद वाला अधिकार स्वाभाविक रूप से ज़्यादा सख़्त नियमों के अधीन होता है, जिसमें योग्यता, अयोग्यता और संस्थागत ज़रूरतें शामिल हैं।"

    अनूप बरनवाल मामले में 2023 के संविधान पीठ के फ़ैसले में जस्टिस अजय रस्तोगी ने यह राय दी थी कि वोट देने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, जबकि बहुमत ने यह माना था कि यह केवल एक संवैधानिक अधिकार है।

    मामले की पृष्ठभूमि

    यह विवाद राजस्थान राज्य में विभिन्न ज़िला दुग्ध संघों की प्रबंधन समिति (निदेशक मंडल) के चुनावों से संबंधित था। विशेष रूप से, यह चुनौती जिला दुग्ध संघों द्वारा बनाए गए उप-नियम संख्या 20.1(2), 20.1(4), 20.2(7) और 20.2(9) के खिलाफ थी, जिनमें निदेशक मंडल के चुनावों में खड़े होने के लिए योग्यताएं निर्धारित की गईं।

    प्राथमिक समितियों के कुछ प्रतिनिधियों ने, जो जिला दुग्ध संघों के सदस्य हैं, हाईकोर्ट में रिट कार्यवाही के माध्यम से इन उप-नियमों को चुनौती दी। एक सिंगल जज ने इन उप-नियमों को अधिकार-बाह्य (Ultra Vires) घोषित किया। कोर्ट के भीतर की गई अपील में खंडपीठ ने सिंगल बेंच के निर्णय की पुष्टि की। इससे व्यथित होकर अपीलकर्ताओं ने—जो रिट कार्यवाही में पक्षकार नहीं थे—सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    कोर्ट की टिप्पणियां

    कोर्ट ने यह माना कि चुनावों में खड़े होने की पात्रता के विनियमन को मतदान के अधिकार पर लगाए गए प्रतिबंध के समान मानकर हाईकोर्ट ने दो अलग-अलग वैधानिक अधिकारों को आपस में मिला दिया।

    आगे कहा गया,

    "विवादित उप-नियम केवल उम्मीदवारी और पद धारण करने के क्षेत्र में ही प्रभावी होते हैं, और वे मतदान के अधिकार पर कोई आघात नहीं करते। इसलिए हाईकोर्ट के तर्क का मूल आधार ही मौलिक रूप से त्रुटिपूर्ण है और कानून की दृष्टि से मान्य नहीं है।"

    कोर्ट ने आगे यह भी टिप्पणी की कि ये उप-नियम सदस्यों के मतदान के अधिकार को विनियमित नहीं करते।

    इस संबंध में कहा गया,

    "ये उप-नियम किसी प्राथमिक सहकारी समिति के अध्यक्ष या प्रतिनिधि की उस पात्रता पर केंद्रित हैं, जिसके आधार पर वह जिला दुग्ध संघों के निदेशक मंडल के चुनावों में खड़ा हो सकता है, अथवा उसके सदस्य के रूप में अपना कार्यकाल जारी रख सकता है।"

    कोर्ट ने "पात्रता" और "अपात्रता" (Disqualification) के बीच भी अंतर स्पष्ट किया और यह माना कि हाईकोर्ट द्वारा इन उप-नियमों को इस आधार पर अमान्य घोषित करना कि वे अपात्रताएं थोपते हैं, कानून की दृष्टि से मान्य नहीं था।

    कोर्ट ने आगे कहा,

    "ये (उप-नियम) इस बात को विनियमित करते हैं कि कौन व्यक्ति न्यूनतम कार्यात्मक और कार्य-निष्पादन संबंधी मानकों के आधार पर चुनावी मैदान में उतर सकता है अथवा अपने पद पर बना रह सकता है; इनका उद्देश्य धारा 28 के अंतर्गत सूचीबद्ध वैधानिक अपात्रताओं में कोई वृद्धि करना अथवा उनमें कोई परिवर्तन करना नहीं है। इन दो अलग-अलग अवधारणाओं को आपस में मिलाकर हाईकोर्ट ने कानून के मामले में स्वयं को भटका दिया और जांच-परख का एक गलत पैमाना अपना लिया।"

    कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस विचार को भी खारिज कर दिया कि उप-नियम चुनावी भागीदारी को नियंत्रित नहीं कर सकते। कोर्ट ने कहा कि हालांकि राजस्थान सहकारी समितियां अधिनियम, 2001 की धारा 128 राज्य सरकार को सदस्यता/मतदान के लिए योग्यताएं निर्धारित करने की अनुमति देती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सहकारी समितियों के पास उप-नियमों के ज़रिए सदस्यों की भागीदारी और प्रतिनिधित्व को नियंत्रित करने की शक्ति नहीं है।

    "अधिनियम, 2001 की धारा 32 स्पष्ट रूप से उप-नियमों को चुनावी ढांचे में शामिल करती है, जिससे सहकारी संस्था के भीतर प्रतिनिधित्व और शासन की संरचना तय करने में उनकी भूमिका को मान्यता मिलती है।"

    इसके अलावा, यह पाया गया कि हाईकोर्ट ने अपने रिट अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया, क्योंकि यह फैसला, जो सभी पर लागू होता था (in rem), सभी प्रभावित ज़िला दुग्ध संघों की बात सुने बिना ही सुना दिया गया।

    कहा गया,

    "इतने व्यापक दायरे वाला कोई भी फैसला सभी प्रभावित पक्षों की गैर-मौजूदगी में नहीं दिया जा सकता। कम-से-कम हाईकोर्ट को यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि उन समितियों को नोटिस जारी किया जाए और उन्हें अपनी बात रखने का मौका दिया जाए, जिनके अधिकार, शासन संरचनाएं और आंतरिक नियम सीधे तौर पर प्रभावित हो रहे थे। ऐसा न करना 'ऑडी ऑल्टरम पार्टम' (दूसरे पक्ष की बात सुनना) के सिद्धांत की जड़ पर ही प्रहार करता है, जो कि प्राकृतिक न्याय का एक बुनियादी सिद्धांत है।"

    इस पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट कोर्ट ने अपील स्वीकार की और हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।

    Case Title: RAM CHANDRA CHOUDHARY & ORS VERSUS ROOP NAGAR DUGDH UTPADAK SAHAKARI SAMITI LIMITED AND OTHERS, CIVIL APPEAL NO. 4352 OF 2026

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