हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Shahadat

4 July 2026 8:00 PM IST

  • हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

    देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (29 जून, 2026 से 03 जुलाई, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

    NDPS Act के तहत 'भांग' को 'कैनाबिस (हेम्प)' की परिभाषा में शामिल नहीं किया गया: झारखंड हाईकोर्ट

    झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि भांग रखना NDPS Act, 1985 के तहत अपराध नहीं है, क्योंकि इसे एक्ट की धारा 2(iii) के तहत "कैनाबिस (हेम्प)" की कानूनी परिभाषा से बाहर रखा गया। NDPS Act के तहत अपील करने वाले व्यक्ति की सज़ा रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा कि जब फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) ने रिपोर्ट दी कि ज़ब्त किया गया पदार्थ भांग था, न कि गांजा, तो सज़ा को बरकरार नहीं रखा जा सकता।

    जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की सिंगल जज बेंच एक क्रिमिनल अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें NDPS Act की धारा 20(B), 22(B) और 11(B) के तहत अपील करने वाले व्यक्ति की सज़ा को चुनौती दी गई। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 17 अक्टूबर 2000 को पुलिस की एक पेट्रोलिंग पार्टी ने चाईबासा बस स्टैंड के पास अपील करने वाले व्यक्ति को रोका, क्योंकि पुलिस को देखकर वह भागने की कोशिश कर रहा था। गवाहों और एक राजपत्रित अधिकारी (गज़ेटेड ऑफिसर) की मौजूदगी में उसके पास मौजूद VIP ब्रीफ़केस की तलाशी लेने पर पुलिस ने दावा किया कि उन्हें 12 पॉलीथीन पैकेट मिले जिनमें लगभग 11 किलोग्राम गांजा था। इसके बाद अपील करने वाले व्यक्ति पर NDPS एक्ट के तहत मुकदमा चलाया गया।

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    अल्पसंख्यक सहायता प्राप्त स्कूलों में नियुक्ति पर DoE दखल नहीं दे सकता, केवल योग्यता तय कर सकता है: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि सहायता प्राप्त (Aided) अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की नियुक्ति का अधिकार संस्थान के प्रबंधन का अभिन्न हिस्सा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि शिक्षा निदेशालय (DoE) केवल नियुक्ति के लिए आवश्यक शैक्षणिक योग्यता और अनुभव निर्धारित कर सकता है, लेकिन इसके अलावा कोई अन्य शर्त या प्रतिबंध नहीं लगा सकता।

    जस्टिस जसमीत सिंह ने एक सहायता प्राप्त ईसाई अल्पसंख्यक विद्यालय की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अनुच्छेद 30(1) के तहत अल्पसंख्यक संस्थानों को अपने संस्थान का प्रबंधन करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, जिसमें शिक्षकों और कर्मचारियों की नियुक्ति भी शामिल है।

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    सिर्फ कुर्फ़ानामा काफी नहीं, बेदखली रोकने के लिए 1949 के कानून से पहले 12 वर्ष का कब्जा साबित करना होगा: झारखंड हाईकोर्ट

    झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति कुर्फ़ानामा के आधार पर जमीन पर अपना अधिकार जताकर बेदखली की कार्रवाई का विरोध करना चाहता है तो उसे यह साबित करना होगा कि संताल परगना काश्तकारी (पूरक उपबंध) अधिनियम, 1949 लागू होने से पहले उसका 12 वर्ष का वैध कब्जा था। अदालत ने यह भी कहा कि तस्दीक नियमावली की शर्तों को पूरा नहीं करने वाले कुर्फ़ानामा के आधार पर बेदखली की कार्रवाई को चुनौती नहीं दी जा सकती।

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    सरकारी नीतियों के विरोध पर नागरिक को शहर से बाहर नहीं किया जा सकता: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि सरकार की नीतियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन आयोजित करना या असहमति जताना किसी नागरिक को शहर से बाहर (Extern) करने का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि ऐसी कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ जीने के अधिकार का उल्लंघन है।

    जस्टिस माधव जे. जामदार ने सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के सचिव सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी के खिलाफ जारी एक्सटर्नमेंट आदेश और उसके खिलाफ पारित अपीलीय आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता की गतिविधियों से लोगों में भय, खतरा या सार्वजनिक शांति भंग होने की स्थिति पैदा हुई।

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    पत्नी की मौत पर कमाने वाला पति भी मुआवजे का हकदार, पितृसत्तात्मक सोच से नहीं होगा निर्भरता का आकलन: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि सड़क दुर्घटना में पत्नी की मौत होने पर कमाने वाला पति भी आश्रितता के आधार पर मुआवजे का दावा कर सकता है। केवल इस आधार पर उसका दावा खारिज नहीं किया जा सकता कि वह स्वयं भी कमाता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मोटर दुर्घटना मुआवजे के मामलों का आकलन पितृसत्तात्मक सोच के नजरिए से नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस अनीश दयाल की एकलपीठ ने ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) द्वारा एक व्यक्ति को उसकी पत्नी की सड़क दुर्घटना में मौत के बाद दिए गए 57.5 लाख रुपये से अधिक के मुआवजे को चुनौती दी गई।

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    पालतू कुत्ते को श्रीकृष्ण का गेटअप देना अपराध नहीं, भक्ति की अभिव्यक्ति: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट

    पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महिला के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करते हुए कहा कि जन्माष्टमी के अवसर पर अपने पालतू कुत्ते को भगवान श्रीकृष्ण की वेशभूषा पहनाकर उसकी तस्वीर व्हाट्सऐप पर साझा करना भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 298 के तहत अपराध नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में धार्मिक भावनाएं आहत करने की मंशा साबित नहीं होती और कानून के तहत अपराध के आवश्यक तत्व भी मौजूद नहीं हैं।

    जस्टिस सुभाष मेहला की एकलपीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति की निजी आस्था और अनुभवों से प्रेरित अभिव्यक्ति को केवल इसलिए अपराध नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह कुछ लोगों की भावनाओं से मेल नहीं खाती।

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    21 वर्ष से कम उम्र में शादी पर भी जोड़े को सुरक्षा: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पुलिस को दिए संरक्षण के निर्देश

    उत्तराखंड हाईकोर्ट ने विवाहित जोड़े को सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया। अदालत ने यह आदेश उस आपत्ति के बावजूद दिया कि विवाह के समय युवक की उम्र 21 वर्ष से कम है। हाईकोर्ट ने कहा कि परामर्शदाता की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि युवती अपने माता-पिता के साथ जाने को तैयार नहीं है और वह अपने पति के साथ खुश है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर जोड़ा सुरक्षा का हकदार है।

    जस्टिस आलोक महरा उस याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें पुलिस को निजी पक्षकारों और उनके सहयोगियों से दोनों याचिकाकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश देने की मांग की गई।

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    'प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट' सिर्फ़ धार्मिक स्वरूप बदलने पर रोक लगाता है, जनहित में सरकारी अधिग्रहण पर कोई रोक नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि 'प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप (स्पेशल प्रोविज़न्स) एक्ट, 1991' के तहत किसी पूजा स्थल के धार्मिक स्वरूप को एक धार्मिक संप्रदाय से दूसरे धार्मिक संप्रदाय में बदलने पर ही रोक है, लेकिन यह कानून सरकार को 'धर्मनिरपेक्ष' और 'जनहित' के कामों के लिए ऐसी संपत्तियों का अधिग्रहण करने से नहीं रोकता।

    इसके साथ ही, जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस अरुण कुमार की बेंच ने वाराणसी के दालमंडी इलाके को चौड़ा करने और उसे सुंदर बनाने के काम को रोकने की मांग वाली रिट याचिका को खारिज कर दिया। यह प्रोजेक्ट यूपी सरकार के 'श्री काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर' विकास योजना का हिस्सा है।

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    बॉम्बे हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: 'नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है, विरोध करने पर केस दर्ज किए जाते हैं'

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार (2 जुलाई) को कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि कोई नागरिक केंद्र सरकार के कुछ फ़ैसलों का विरोध कर रहा है और उसके ख़िलाफ़ नारे लगा रहा है, उसे किसी इलाके से बाहर निकालने (एक्सटर्नमेंट) का आधार नहीं बनाया जा सकता। [2026 LiveLaw (Bom) 305]

    सिंगल-जज जस्टिस माधव जामदार ने मुंबई पुलिस द्वारा सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी (49) के ख़िलाफ़ एक्सटर्नमेंट ऑर्डर जारी करने पर कड़ी नाराज़गी जताई। सईद 'सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया' (SDPI) के जनरल सेक्रेटरी हैं और केंद्र सरकार के कई फ़ैसलों—जिनमें नागरिकता कानून में संशोधन और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद शामिल हैं—के ख़िलाफ़ सक्रिय रूप से मोर्चे और धरने आयोजित कर रहे थे।

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    मृत्युपूर्व बयान के लिए मानसिक रूप से पूरी तरह सक्षम होने का अलग प्रमाणपत्र जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी मृत्युपूर्व बयान पर भरोसा करने के लिए डॉक्टर द्वारा यह अलग से प्रमाणित करना अनिवार्य नहीं है कि पीड़ित बयान देने के समय मानसिक रूप से पूरी तरह सक्षम था। यदि डॉक्टर ने यह प्रमाणित किया कि पीड़ित होश में था और बोलने की स्थिति में था तो यह पर्याप्त है।

    जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने कहा, "मृतक के बयान देने के लिए मानसिक रूप से सक्षम होने संबंधी डॉक्टर का अलग प्रमाणपत्र कानून की अनिवार्य शर्त नहीं, बल्कि केवल सावधानी का एक सिद्धांत है। वास्तविक कसौटी यह है कि मृत्युपूर्व बयान सत्य, स्वैच्छिक और किसी प्रकार के दबाव, सिखाए जाने या संदेहास्पद परिस्थितियों से मुक्त हो।"

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    सिखों को हेलमेट पहनने से छूट देना आर्टिकल 14 के तहत 'उचित वर्गीकरण', न कि धर्म पर आधारित: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि सिखों को हेलमेट पहनने से दी गई छूट धर्म या जाति पर आधारित नहीं है, बल्कि यह भारत के संविधान के आर्टिकल 14 के तहत 'उचित' वर्गीकरण है और इसलिए यह किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करता है। [2026 LiveLaw (Bom) 304]

    नागपुर बेंच में जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के और जस्टिस निवेदिता मेहता की डिवीजन बेंच ने लॉ स्टूडेंट की याचिका खारिज की। स्टूडेंट ने सिख समुदाय के लोगों को हेलमेट पहनने से मिली छूट को चुनौती दी थी, जबकि मोटर वाहन अधिनियम (MVA) की धारा 129 के तहत हर नागरिक के लिए हेलमेट पहनना अनिवार्य है।

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    अगर पहली शादी अभी भी कायम है तो महिला अपने दूसरे पति के परिवार के खिलाफ IPC की धारा 498A के तहत मामला दर्ज नहीं करा सकती: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में एक व्यक्ति के परिवार के सदस्यों और एक दोस्त के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला रद्द करते हुए कहा कि अगर किसी महिला की पहली शादी अभी भी कायम है, तो उसके दूसरे पति के परिवार के सदस्यों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत FIR कानूनी रूप से मान्य नहीं हो सकती। [2026 LiveLaw (Bom) 303]

    सिंगल-जज जस्टिस रंजीतसिंह भोंसले ने कहा कि दूसरे पति के परिवार के सदस्यों को IPC की धारा 498A में बताए गए 'रिश्तेदारों' की परिभाषा के दायरे में नहीं लाया जा सकता।

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    नेशनल स्टॉक एक्सचेंज RTI Act के तहत 'पब्लिक अथॉरिटी': दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को कहा कि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ़ इंडिया (NSE) राइट टू इन्फॉर्मेशन एक्ट, 2005 (RTI Act) की धारा 2(h) के तहत "पब्लिक अथॉरिटी" (सार्वजनिक प्राधिकरण) के दायरे में आता है। [2026 LiveLaw (Del) 603]

    जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की डिवीजन बेंच ने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की अपील खारिज की, जो उसने सिंगल जज के उस फैसले के खिलाफ दायर की थी, जिसमें कहा गया था कि एक्सचेंज RTI व्यवस्था के दायरे में आता है।

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    कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले के बाद बंगाल विधानसभा ने OBC आरक्षण कानून में संशोधन किया, 77 समुदायों को सूची से हटाया

    पश्चिम बंगाल विधानसभा ने सोमवार को राज्य की अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए दो संशोधन विधेयक पारित कर दिए। इन विधेयकों के तहत 2010 के बाद OBC सूची में शामिल किए गए 77 समुदायों को सूची से हटा दिया गया है और आरक्षण व्यवस्था को 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुरूप पुनर्गठित किया गया।

    इन संशोधनों के जरिए पश्चिम बंगाल बैकवर्ड क्लासेज (आरक्षण) अधिनियम और पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम, 1993 में बदलाव किए गए हैं। सरकार के अनुसार, अब केवल वे 66 समुदाय OBC सूची में बने रहेंगे, जिन्हें 2010 से पहले किए गए सर्वेक्षणों के आधार पर मान्यता दी गई थी।

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    सिर्फ मैरिज रजिस्ट्रेशन से हिंदू विवाह वैध नहीं होता, सप्तपदी समेत आवश्यक रस्में अनिवार्य: गुजरात हाईकोर्ट

    गुजरात हाईकोर्ट ने कहा है कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत केवल विवाह का रजिस्ट्रेशन हो जाने से शादी वैध नहीं हो जाती। अदालत ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह तभी कानूनी रूप से मान्य होगा, जब कानून के अनुसार आवश्यक वैवाहिक रस्में, विशेष रूप से जहां लागू हो वहां सप्तपदी (सात फेरे/सात कदम), विधिवत संपन्न की गई हों।

    जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आर.टी. वच्छानी की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए कथित विवाह को शुरुआत से ही शून्य (Null and Void Ab Initio) घोषित कर दिया।

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    धार्मिक पहचान छिपाकर शादी करने वाले पति की पत्नी को मिलेगा भरण-पोषण, अवैध विवाह बताकर दावा खारिज करना 'पीड़िता का दोबारा उत्पीड़न': मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी महिला ने पुरुष द्वारा धार्मिक पहचान छिपाकर की गई शादी के आधार पर वैवाहिक जीवन बिताया हो, तो केवल इस आधार पर कि विवाह कानूनी रूप से वैध नहीं था, उसे भरण-पोषण (मेंटेनेंस) से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना महिला का "दोबारा उत्पीड़न" (Further Victimisation) होगा।

    जस्टिस गजेंद्र सिंह की एकलपीठ ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें महिला के भरण-पोषण के दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया था कि वह पति की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी नहीं है। हाईकोर्ट ने महिला को ₹10,000 प्रति माह तथा उसकी नाबालिग बेटी के लिए पहले से निर्धारित ₹2,000 प्रति माह की राशि बढ़ाकर ₹10,000 प्रति माह करने का आदेश दिया। दोनों को यह राशि आवेदन दायर करने की तारीख से देय होगी।

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    कल्याणकारी योजना के तहत पत्नी को घर मिलने से वह CrPC की धारा 125 के तहत गुज़ारा-भत्ता मांगने के अधिकार से वंचित नहीं होती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि किसी कल्याणकारी योजना के तहत महिला को घर मिलना उसकी आजीविका का साधन नहीं माना जा सकता, जिससे वह अपने पति से CrPC की धारा 125 के तहत गुज़ारा-भत्ता मांगने के अधिकार से वंचित हो जाए।

    जस्टिस गरिमा प्रसाद की बेंच ने यह भी कहा कि पति केवल यह कहकर अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने की कानूनी ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकता कि वह बेरोज़गार है या बहुत कम कमाता है।

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