सिर्फ कुर्फ़ानामा काफी नहीं, बेदखली रोकने के लिए 1949 के कानून से पहले 12 वर्ष का कब्जा साबित करना होगा: झारखंड हाईकोर्ट
Amir Ahmad
4 July 2026 3:10 PM IST

झारखंड हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति कुर्फ़ानामा के आधार पर जमीन पर अपना अधिकार जताकर बेदखली की कार्रवाई का विरोध करना चाहता है तो उसे यह साबित करना होगा कि संताल परगना काश्तकारी (पूरक उपबंध) अधिनियम, 1949 लागू होने से पहले उसका 12 वर्ष का वैध कब्जा था।
अदालत ने यह भी कहा कि तस्दीक नियमावली की शर्तों को पूरा नहीं करने वाले कुर्फ़ानामा के आधार पर बेदखली की कार्रवाई को चुनौती नहीं दी जा सकती।
जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की एकल पीठ उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें संताल परगना प्रमंडल, दुमका के आयुक्त के आदेश को चुनौती दी गई।
आयुक्त ने गोड्डा के उपायुक्त के अपीलीय आदेश को निरस्त करते हुए उपखंड पदाधिकारी द्वारा पारित बेदखली के आदेश को बहाल कर दिया था। यह कार्रवाई संताल परगना काश्तकारी (पूरक उपबंध) अधिनियम, 1949 की धारा 20 और 42 के तहत की गई थी।
याचिकाकर्ता का कहना था कि प्रतिवादी ने मौजा डुमरिया स्थित विवादित भूमि पर अतिक्रमण का आरोप लगाते हुए कार्रवाई शुरू कराई। प्रतिवादी ने दावा किया कि वह तेतरू झा का दत्तक पुत्र है और वर्ष 1965 में निष्पादित पंजीकृत दत्तक ग्रहण विलेख के आधार पर भूमि पर उसका अधिकार है।
वहीं, याचिकाकर्ता ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि उसके पिता को वर्ष 1941 में निष्पादित एक कुर्फ़ानामा के आधार पर विवादित भूमि का कब्जा मिला था। उसके अनुसार, उसके पिता जीवनभर उस भूमि पर काबिज रहे और उनके निधन के बाद वह स्वयं लगातार खेती करता रहा।
याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि बेदखली का आदेश पारित करते समय अधिकारियों ने कुर्फ़ानामा और लगान रसीदों पर विचार नहीं किया।
राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि आयुक्त ने अधिनियम की धारा 20 और 42 की सही व्याख्या की है।
राज्य का कहना था कि याचिकाकर्ता कानून के अनुसार आवश्यक अवधि का कब्जा साबित नहीं कर सका इसलिए बेदखली का आदेश पूरी तरह वैध है।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मुख्य प्रश्न यह तय किया कि क्या याचिकाकर्ता अधिनियम लागू होने के बाद आवश्यक 12 वर्ष का कब्जा साबित कर पाया है।
रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद अदालत ने कहा कि जिस कुर्फ़ानामा का याचिकाकर्ता सहारा ले रहा है, वह वर्ष 1941 का है, जबकि अधिनियम 1 नवंबर 1949 से लागू हुआ। अदालत ने पाया कि संबंधित अवधि के हिसाब से याचिकाकर्ता आवश्यक 12 वर्ष का कब्जा साबित नहीं कर सका, इसलिए उसे कानून का संरक्षण नहीं मिल सकता।
हाईकोर्ट ने कुर्फ़ानामा की वैधता पर भी विचार किया। अदालत ने कहा कि तस्दीक नियमावली के अनुसार किसी कुर्फ़ानामा को कानूनी मान्यता तभी मिल सकती है, जब वह पंजीकृत हो, या अपंजीकृत होने की स्थिति में किसी सक्षम अदालत द्वारा उस पर विचार किया गया हो अथवा उसे न्यायालय में साक्ष्य के रूप में प्रदर्शित किया गया हो।
अदालत ने पाया कि वर्तमान मामले में इनमें से कोई भी शर्त पूरी नहीं हुई।
पीठ ने यह भी कहा कि प्रस्तुत कुर्फ़ानामा प्रथम दृष्टया मिलीभगत का प्रतीत होता है और अधिनियम के तहत निर्धारित आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता।
याचिकाकर्ता की इस दलील को भी हाईकोर्ट ने स्वीकार नहीं किया कि केवल अपंजीकृत होने के कारण कुर्फ़ानामा अमान्य नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा कि अपंजीकृत दस्तावेज़ के लिए निर्धारित अन्य कानूनी शर्तें भी इस मामले में पूरी नहीं की गई।
अदालत ने संताल परगना क्षेत्र में दत्तक ग्रहण से जुड़े प्रचलित रीति-रिवाजों तथा सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें 1949 के अधिनियम के तहत रैयती भूमि के हस्तांतरण पर लगाए गए प्रतिबंधों के उद्देश्य को मान्यता दी गई।
इन सभी तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता न तो आवश्यक अवधि का कब्जा साबित कर सका और न ही कुर्फ़ानामा उसके पक्ष में कानूनी रूप से स्वीकार्य है। इसलिए आयुक्त के बेदखली संबंधी आदेश में कोई अवैधता नहीं है।
इसी के साथ हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की।


