धार्मिक पहचान छिपाकर शादी करने वाले पति की पत्नी को मिलेगा भरण-पोषण, अवैध विवाह बताकर दावा खारिज करना 'पीड़िता का दोबारा उत्पीड़न': मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Praveen Mishra
1 July 2026 10:53 AM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि किसी महिला ने पुरुष द्वारा धार्मिक पहचान छिपाकर की गई शादी के आधार पर वैवाहिक जीवन बिताया हो, तो केवल इस आधार पर कि विवाह कानूनी रूप से वैध नहीं था, उसे भरण-पोषण (मेंटेनेंस) से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना महिला का "दोबारा उत्पीड़न" (Further Victimisation) होगा।
जस्टिस गजेंद्र सिंह की एकलपीठ ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें महिला के भरण-पोषण के दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया था कि वह पति की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी नहीं है। हाईकोर्ट ने महिला को ₹10,000 प्रति माह तथा उसकी नाबालिग बेटी के लिए पहले से निर्धारित ₹2,000 प्रति माह की राशि बढ़ाकर ₹10,000 प्रति माह करने का आदेश दिया। दोनों को यह राशि आवेदन दायर करने की तारीख से देय होगी।
मामले के अनुसार, महिला और पुरुष ने 8 दिसंबर 2022 को हिंदू रीति-रिवाजों से विवाह किया था। महिला का आरोप था कि विवाह के समय पुरुष ने स्वयं को हिंदू बताकर अपनी वास्तविक धार्मिक पहचान छिपाई। विवाह के बाद दोनों की एक बेटी हुई। बाद में महिला को पति के आधार कार्ड से पता चला कि वह बोहरा समुदाय का अनुयायी है।
महिला ने आरोप लगाया कि सच्चाई सामने आने के बाद पति ने उस पर बोहरा धर्म अपनाने का दबाव बनाया। इनकार करने पर उसके साथ मारपीट की गई और उसे प्रताड़ित किया गया। उसने यह भी आरोप लगाया कि पति ने उसके माता-पिता को जान से मारने और आत्महत्या करने की धमकी दी। बाद में उसने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि शिव मंदिर जाने के दौरान पति ने उसका अपहरण करने का प्रयास किया और मंदिर के पुजारी के परिजनों को भी धमकाया।
हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि नोटिस के बावजूद पति न्यायालय में उपस्थित नहीं हुआ।
कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने यह माना था कि बच्ची प्रतिवादी की पुत्री है, लेकिन महिला को केवल विवाह की वैधता के आधार पर भरण-पोषण से वंचित कर दिया। हाईकोर्ट ने इसे कानून की दृष्टि से गलत ठहराते हुए कहा कि जब विवाह की रस्में पति द्वारा अपनी धार्मिक पहचान छिपाकर संपन्न कराई गईं और इस संबंध से एक बच्ची का जन्म हुआ, तब केवल विवाह को अवैध मानकर महिला का दावा खारिज करना न्यायसंगत नहीं है।
अदालत ने कहा कि फैमिली कोर्ट का ऐसा दृष्टिकोण पहले से पीड़ित महिला के साथ "आगे भी उत्पीड़न" करने जैसा है। इसलिए महिला को भी भरण-पोषण का अधिकार दिया जाना चाहिए।

