पत्नी की मौत पर कमाने वाला पति भी मुआवजे का हकदार, पितृसत्तात्मक सोच से नहीं होगा निर्भरता का आकलन: दिल्ली हाईकोर्ट
Amir Ahmad
3 July 2026 3:30 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि सड़क दुर्घटना में पत्नी की मौत होने पर कमाने वाला पति भी आश्रितता के आधार पर मुआवजे का दावा कर सकता है। केवल इस आधार पर उसका दावा खारिज नहीं किया जा सकता कि वह स्वयं भी कमाता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि मोटर दुर्घटना मुआवजे के मामलों का आकलन पितृसत्तात्मक सोच के नजरिए से नहीं किया जा सकता।
जस्टिस अनीश दयाल की एकलपीठ ने ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) द्वारा एक व्यक्ति को उसकी पत्नी की सड़क दुर्घटना में मौत के बाद दिए गए 57.5 लाख रुपये से अधिक के मुआवजे को चुनौती दी गई।
अदालत ने कहा,
"कमाने वाला पति यह जरूरी नहीं कि मृत पत्नी की आय पर निर्भर न हो। जब परिवार का खर्च संयुक्त आय से चलता है तब जीवित जीवनसाथी की निर्भरता मृतक की आर्थिक और घरेलू दोनों तरह की भागीदारी से जुड़ी होती है।"
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि दुर्घटना में मृत व्यक्ति परिवार का कमाने वाला सदस्य था, चाहे वह पति हो या पत्नी, तो उसकी आय परिवार की कुल आय में योगदान मानी जाएगी। केवल इसलिए कि परिवार का दूसरा सदस्य भी कमाता है यह मान लेना कि मृतक का योगदान आवश्यक नहीं है, गलत आकलन होगा।
बीमा कंपनी का तर्क था कि पति स्वयं कमाने वाला है इसलिए उसे पत्नी पर आर्थिक रूप से आश्रित नहीं माना जा सकता और वह केवल संपत्ति के नुकसान के मद में ही मुआवजा पाने का हकदार है।
वहीं, पति की ओर से कहा गया कि उसकी पत्नी गृह ऋण की किस्तों और परिवार के अन्य खर्चों में महत्वपूर्ण आर्थिक योगदान देती थी। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2025 के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा गया कि पति भी पत्नी पर पूर्ण या आंशिक रूप से आर्थिक रूप से निर्भर हो सकता है।
हाईकोर्ट ने पति के तर्क से सहमति जताते हुए कहा कि बदलते सामाजिक ढांचे और वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है।
अदालत ने यह भी कहा कि बीमा कंपनी ने न तो MACT के समक्ष पति की निर्भरता पर कोई आपत्ति उठाई और न ही यह साबित करने के लिए कोई साक्ष्य पेश किया कि वह पत्नी पर निर्भर नहीं है। अपील के स्तर पर पहली बार यह मुद्दा उठाना स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि मृतक परिवार का कमाने वाला सदस्य नहीं भी है तब भी घर-परिवार के संचालन में उसकी नि:शुल्क घरेलू सेवाओं के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह सिद्धांत पति और पत्नी दोनों पर समान रूप से लागू होता है।
इन टिप्पणियों के साथ दिल्ली हाईकोर्ट ने MACT द्वारा पति के पक्ष में पारित मुआवजा आदेश बरकरार रखा।


