सिखों को हेलमेट पहनने से छूट देना आर्टिकल 14 के तहत 'उचित वर्गीकरण', न कि धर्म पर आधारित: बॉम्बे हाईकोर्ट

Shahadat

2 July 2026 9:48 AM IST

  • सिखों को हेलमेट पहनने से छूट देना आर्टिकल 14 के तहत उचित वर्गीकरण, न कि धर्म पर आधारित: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि सिखों को हेलमेट पहनने से दी गई छूट धर्म या जाति पर आधारित नहीं है, बल्कि यह भारत के संविधान के आर्टिकल 14 के तहत 'उचित' वर्गीकरण है और इसलिए यह किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करता है। [2026 LiveLaw (Bom) 304]

    नागपुर बेंच में जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के और जस्टिस निवेदिता मेहता की डिवीजन बेंच ने लॉ स्टूडेंट की याचिका खारिज की। स्टूडेंट ने सिख समुदाय के लोगों को हेलमेट पहनने से मिली छूट को चुनौती दी थी, जबकि मोटर वाहन अधिनियम (MVA) की धारा 129 के तहत हर नागरिक के लिए हेलमेट पहनना अनिवार्य है।

    जजों ने 29 जून के आदेश में कहा,

    "सिखों को दी गई छूट जाति, पंथ या धर्म के आधार पर नहीं है। दोपहिया वाहनों से होने वाली दुर्घटनाओं और सिर की चोटों से होने वाली मौतों के आंकड़े दिन-ब-दिन बढ़ रहे हैं। ये प्रावधान समाज के हित में और लोगों की जान बचाने के लिए लागू किए गए हैं। समाज के हित में MV Act की धारा 129 ने दोपहिया मोटरसाइकिल के चालक और पीछे बैठने वाले (पिलियन राइडर) के लिए सुरक्षात्मक हेडगियर/हेलमेट का उपयोग अनिवार्य कर दिया।"

    बेंच ने याचिकाकर्ता की इस दलील पर ध्यान दिया कि सरकार कानूनों का समान संरक्षण न देकर और कुछ लोगों को अपराधी बनाकर 'वर्ग-आधारित कानून' (class legislation) बना रही है, जिसका समर्थन भारत के संविधान का कोई भी प्रावधान नहीं करता।

    याचिकाकर्ता ने तर्क दिया,

    "कानून के समक्ष समानता यह सुनिश्चित करती है कि किसी व्यक्ति या वर्ग को कोई विशेष विशेषाधिकार न मिले। जब भारत में सभी लोग कानून के शासन (Rule of Law) से शासित होते हैं और उन्हें कानून का समान संरक्षण प्राप्त है, तो ऐसा वर्गीकरण उचित नहीं है।"

    हालांकि, बेंच इन दलीलों से सहमत नहीं दिखी और कहा कि ये 'गलतफहमी पर आधारित' थीं। जजों ने बताया कि संविधान का आर्टिकल 14 'वर्ग-आधारित कानून' (class legislation) पर रोक लगाता है, न कि कानून बनाने के उद्देश्य से किए गए उचित वर्गीकरण पर। जजों ने कहा कि उक्त आर्टिकल कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है और अनुचित भेदभाव पर रोक लगाता है।

    जजों ने कहा,

    "हालांकि, यह 'उचित वर्गीकरण' की अनुमति देता है, जिसका अर्थ है कि सरकार अलग-अलग समूहों के लिए अलग-अलग वर्ग बना सकती है, बशर्ते इसके पीछे कोई ठोस और तार्किक आधार तथा जनहित का उद्देश्य हो। स्वीकार्य वर्गीकरण मुख्य रूप से दो शर्तों पर निर्भर करता है: (1) वर्गीकरण एक स्पष्ट अंतर पर आधारित होना चाहिए जो एक साथ रखे गए लोगों या चीजों को समूह से बाहर रखे गए लोगों या चीजों से अलग करता हो, और (ii) उस अंतर का उस कानून के उद्देश्य से तार्किक संबंध होना चाहिए जिसे लागू किया जा रहा है।"

    इन टिप्पणियों के साथ बेंच ने याचिका खारिज की।

    Case Title: Kirtesh Vikas Chaudhari vs Union of India (Criminal Writ Petition 416 of 2026)

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